Nitish vs Shahabuddin war of words and its possible impact on UP Elections

Nitish vs Shahabuddin war of words and its possible impact on UP Elections

In the war of words between Bihar CM Nitish Kumar and RJD’s Ex-MP Mohammad Shahabuddin, the latter seems to win. It’s because he – a leader with noted criminal history has a close proximity with RJD boss Lalu Yadav.

It goes back to 2005 when Nitish Kumar was gaining strength from his moral positioning. He was trying to make Bihar – a safer place to live. In order to do so, he put criminal-dons of Bihar like Shahbuddin, Prabhunath Singh & Surajbhan Singh behind bars. He ordered to set up trial courts in Siwan jail because Shahabuddin showed himself medically unfit to face trial in courts. He got multiple punishments ranging from one year, two years and ten years in different cases. Yet, he still has to face trial in 37 cases along with a CBI inquiry.

But time has changed. Now, Nitish is heading a coalition government with a support of Lalu Prasad Yadav’s RJD’s upper hand. Yet, he tried to contain Shahabuddeen like before by shifting him from Siwan jail to Bhagalpur Jail in the current government. But he couldn’t further stop his release, possibly due to pressure coming from Lalu Yadav.

And, as it’s openly predicted that Shahabuddin will not let it all go easily, Shahabuddin has started attacking the authority of Nitish Kumar.

Apparently, Nitish Kumar has risen in his political career but for ex-RJD MP, he is just another politician from Bihar who shouldn’t have challenge his authority at the first place. So, now when he is out and will do what he was doing from inside the jail, he is going to attack Nitish over and over again.

Will Nitish act tough against Shahabuddin?

It’s a question worth answering. Seeing the current political scenario, Nitish Kumar can’t do much. As per the news reports, Nitish has had a meeting with senior JDU leaders to discuss the possibility of imposing crime control against Shahabuddin. Reportedly, Nitish is angry with Lalu Prasad Yadav because he’s not stopping the criminal don.

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So, here comes the question – will Nitish impost CCA? The answer to this question is no.

Nitish will not do so by risking the longevity of his coalition government. He doesn’t anymore gain strength from his moral positioning among Bihari population. Many loyal Nitish Kumar fan voters showed displeasure over Nitish joining Lalu Camp before voting begun.

Apparently, RJD gained most from Mahagathbandhan while JDU didn’t perform well in comparison to previous elections.

So, now if in case Nitish breaks ties Lalu over this issue he has nothing to lose but he will lose more.

Can Shahabuddin Impact UP Elections?

It’s another question that’s not being asked now because it might be too early to predict anything for UP elections. But I personally think that this political development can impact UP Elections. This is how it can. If you are watching closely then you must have noticed political developments since 5th of September.

On 5th of September, Shivpal Yadav from Samajwadi Party announced that merger of Mukhtar Ansari’s Kaumi Ekta party with SP is inevitable and happen soon. And, issued the warning of possible riots in UP before elections.

(Mukhar Ansari known for his criminal history and hold in Muslim voters comes from Mau – a region with Muslim majority, fall close to UP-Bihar border.

On 7th of September, bail order of Shahabuddin comes and Bihar’s Deputy CM Tejaswi Yadav gives a statement that Nitish Kumar will be a better PM than PM Modi.

On 10th of September, Shahabuddin gets a grand welcome by RJD leaders and attacks Nitish Kumar.

On 11th of September, Nitish responded back – It doesn’t matter what one person says, I have got people’s mandate.

On 12th of September, Lalu responded on this development – Shahabuddin hasn’t said anything like this, He said Lalu is my leader and Nitish Kumar has no problem on this part.

Apparently, on the same day, JDU has issued a show cause notice to its MLA Girdhari Yadav who went to Bhagalpur Jail to attend Shahabuddin. So…thodi taklif to hai.

Coming back to the question – Will it impact UP elections? I think yes. Shahabuddin’s has influence over Muslim voters of a Bihar’s siwan district that falls adjacent to UP border.

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Siwan is close to UP’s constituencies that have Muslim majorities like Deoria, Balia, Gorakhpur, and Mau.

Now, come back to what Shivpal Yadav has warned of. Riots. He has played the same card that SP has been playing since long to bring in Muslim – Frighten Muslim voters with Riots and get their votes.

So, now just think for a moment if it happens then who will benefit the most. It’s BJP and SP. Because if the polarization of votes happens, a big part of UP’s 19.3 Muslim vote share will fall in SP’s account and a majority of Hindu votes will go to BJP. And, figures like Shahabuddin and Mukhtar Ansari will be really helpful for SP for re-establish its ages old Muslim-Yadav vote bank political equation for upcoming elections.

So, if this’s not just a coincidence then Nitish has fallen in the great game and great game is terrifying. 

शहाबुद्दीन की रिहाई के साथ ‘चंदू-जेएनयू’ युग का अंत


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मुझे अपनी छवि बदलने की जरूरत नहीं, जनता ने 26 से मुझे उसी रूप में स्वीकार किया है जैसा मैं हूं, लालू प्रसाद यादव मेरे नेता हैं और नीतीश कुमार परिस्थितियों की वजह से बिहार के सीएम हैं.

ये शब्द थे 11 सालों बाद जेल से रिहा होकर 1300 गाड़ियों के काफिले में सवार होते पूर्व आरजेडी सांसद शहाबुद्दीन के.

बिहार के बाहूबली नेता शहाबुद्दीन पर राजीव शर्मा हत्याकांड समेत पूर्व जेएनयू अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद और उनके साथी श्याम नारायण यादव की हत्या का भी आरोप है.

अक्सर एक ही समय पर दो अलग-अलग स्थानों पर दो घटनाएं घट रही होती हैं जिनका एक-दूसरे से कोई सीधा संबंध नहीं होता. लेकिन अगर समय की पर्तों को खोलकर देखें तो ये पता चलता है कि दोनों घटनाएं किस तरह एक दूसरे से जुड़ी होती हैं.

इन दोनों घटनाओं में यही संबंध है. ये दो घटनाएं हैं – जेएनयू छात्रसंघ चुनाव 2016 और चंदू के हत्यारे शहाबुद्दीन की रिहाई.

जेएनयू स्टूडेंट्स में कॉमरेड चंदू के नाम से चर्चित चंद्रशेखर प्रसाद ने अपनी स्पीच में कहा था – 

हमारी आने वाली पीढ़ियां सवाल करेंगी, वे हमसे पूछेंगी कि जब नई सामाजिक ताकतें उभर रही थीं तो आप कहां थे, वे पूछेंगी कि जब लोग जो हर दिन जीते मरते हैं, अपने हकों के लिए संघर्ष कर रहे थे, आप कहां थे जब दबे-कुचले लोग अपनी आवाज उठा रहे थे, वे हम सबसे सवाल करेंगीं.

 

ये स्पीच एंटी-बुलिज्म, एंटी-पेसिविज्म और अवेकनिंग है. आप जेएनयू को जानते हों या न जानते हों, वहां की हवा में तैरते वाद-विवाद और नारों से आपका ताल्लुक हो या न हो लेकिन अगर आपने जिंदगी में कभी भी बुलिज्म को बर्दाश्त किया है तो आप इस जेएनयू के विचार से सहमत हुए बिना नहीं रह सकते.

जेएनयू सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं बल्कि एक आइडिया है…आइडिया एक ऐसे शिक्षण संस्थान को रचने का जहां से निकले छात्र देशभर में सुनने, संवाद करने और समस्याओं के क्रिएटिव सॉल्यूशन निकालने में विश्वास रखें.

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इस स्पीच के हर शब्द को हम क्लियरली सुन सके क्योंकि कॉमरेड चंदू के दौर का जेएनयू कहने-सुनने में यकीन रखता था. संवाद के जरिए दूसरे पक्ष को खुद से सहमत करने में यकीन में रखता था.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में खुद चंद्रशेखर की बनाई पार्टी अॉल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन ने तमाम विरोधों के बावजूद खुद के वजूद को बचाने के लिए सीपीआई (एमएल) से जुड़ी पार्टी स्टूडेंट फेडरेशन अॉफ इंडिया के साथ गठबंधन कर लिया. तर्क दिया गया कि ये गठबंधन जेएनयू की फासिस्ट ताकतों से रक्षा के लिए किया गया है.

लेकिन चंद्रशेखर प्रसाद ने खुद कहा है कि जहां तक हमारे जैसे लोगों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बात है तो वो ये है कि हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी जिसको डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं और इसीलिए अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की होगी न कि जेएनयूएसयू चुनाव में गांठ जोड़कर जीतने या हारने की महत्वाकांक्षा होगी

आज से 20 साल बाद अगर आप आज के जेएनयू की प्रेसीडेंशियल डिबेट्स को यूट्यूब पर सुनने की कोशिश करेंगे तो आपको हाईडेफिनेशन स्पीच वाले वीडियो मिलेंगे लेकिन अनफॉर्चूनेटली आप आज की स्पीचों के एक शब्द को ठीक से नहीं सुन पाएंगे.

आप सुन पाएंगे उन खोखली आवाजों को जो चंदू की सोच के विपरीत जेएनयूएसयू चुनाव जीतने के लिए गठबंधन करके चुनावी विरोधी एवीबीपी के खिलाफ बोलती नजर आएंगी. आवाजें जो गैर-सामाजिक विचारों के खिलाफ नहीं चंद संस्थाओं और नेताओं के खिलाफ बोलती नजर आएंगी. क्योंकि शहाबुद्दीन की रिहाई के साथ जेएनयू-चंदू युग का भी अंत हो गया है.

 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बताते हैं गोरक्षकों की मनस्थिति


hazariधार्मिक अतार्किकता से भरे जिस तथ्यविहीन देश काल में हम जी रहे हैं उसमें दो बातें अहम हैं – पहली स्वयं के इतिहास और भविष्य के संबंध में पूर्ण अरुचि, दूसरा भौतिक उपभोग का उत्तरोत्तर महिमामंडन. यहां मैंने अतार्किकता से पहले धार्मिक और देशकाल से पहले तथ्यविहीन विशेषण का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि धर्म को छोड़ दें तो हमारे समाज का एक बड़ा तबका तर्क और तथ्य आधारित हर विधान और वस्तु को सहर्ष स्वीकृति देता है.

इसमें 70 के दशक के बाद से पश्चिमी देशों में विकसित घरेलू उपयोग के साधनों से लेकर मौसम, युद्ध और आपसी संवाद से जुड़े फेसबुक जैसे माध्यम शामिल हैं. इसके बावजूद इसी समाज का आधुनिक युवा गो मांस, पवित्र ग्रंथों के अपमान, मस्जिद और मंदिरों में भौंपू और मांस के टुकड़ें फेंके जाने के बाद बर्बर जातियों की माफिक सैकड़ों की जमात में असहायों को मौत के घाट उतारने में जरा भी नहीं झिझकता.

ऐसे में प्रश्न उठता है कि कैसे इस जमाने का युवा तार्किकता से भरे समाज में जीते हुए भी बनिस्बत अपने पापों पर शर्मिंदा होने के बजाए स्वयं को भगत सिंह से प्रेरित बताता है और भारत माता के चरणों में समर्पित बताता है. क्यों एक हिंदू ह्रदय सम्राट को गोरक्षकों की निंदा करने पर अगले चुनाव में अंजाम भुगतने की धमकी मिलती है. ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध घर जोड़ने की माया में दिए हैं.

पढ़िए क्या कहते हैं द्विवेदी जी –

वह कौन सी वस्तु है जो अनुयायियों को अपने गुरु के उपदेशों के प्रतिकूल चलने को बाध्य करती है? यह कहना अनुचित है कि अनुयायी जानबूझकर अपने धर्मगुरु के वचनों की अवमानना करते हैं, वस्तुत: अनुयायी धर्मगुरु की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ही बहुधा गलत मार्ग ग्रहण करने लगते हैं. जो लक्ष्य के साथ मेल खाते और बहुधा उसके विरोधी होते हैं. हजरत, ईसा मसीह अहिंसा मार्ग के प्रवर्तक थे; परंतु उनकी महिमा संसार में प्रतिष्ठित करने के लिए सौ-सौ वर्षों तक रक्त की नदियां बहती रही हैं. हमें इतिहास को ठंडे दिमाग से समझना चाहिए. सच्चाई का सामना करना चाहिए.

जब किसी महापुरुष के नाम पर कोई संप्रदाय चल पड़ता है तो आगे चलकर उसके सभी अनुयायी कम बुद्धिमान ही होते हैं, ऐसी बात नहीं है. कभी-कभी शिष्य परंपरा में ऐसी भी शिष्य निकल आते हैं जो मूल संप्रदाय प्रवर्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं. फिर भी संप्रदाय स्थापना का अभिशाप ये है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिंतन कम हो जाता है. संप्रदाय की प्रतिष्ठा ही जब सबसे बड़ा लक्ष्य हो जाता है तो सत्य पर से दृष्टि हट जाती है. प्रत्येक बड़े यथार्थ को संप्रदाय के अनुकूल लगाने की चिंता ही बड़ी हो जाती है इसका परिणाम यह होता है कि साधन की शुद्धि की परवाह नहीं की जाती. परंतु यह भी ऊपरी बात है. साधन की शुद्धि की परवाह न करना भी असली कारण नहीं है. वह भी कार्य है; क्योंकि साधन की अशुचिता को सत्य भ्रष्ट होने का कारण मान लेने पर भी यह प्रश्न बना ही रह जाता है कि विद्वान और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी साधन की अशुचिता के शिकार क्यों बन जाते हैं? कोई ऐसा बड़ा कारण होना चाहिए जो बुद्धिमानों की अक्ल पर आसानी से पर्दा डाल देता है. जहां तक कबीरदास का संबंध है उन्होंने अपनी ओर से इस कारण की ओर इशारा किया है.

घर जोड़ने की अभिलाषा ही इस प्रवृत्ति का मूल कारण है. लोग केवल सत्य को पाने के लिए ज्यादा देर तक टिके नहीं रह सकते. उन्हें धन चाहिए, मान चाहिए, यश चाहिए, कीर्ति चाहिए. ये प्रलोभन सत्य कही जाने वाली वस्तु से अधिक बलवान साबित हुए हैं. कबीर दास ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जो उनके मार्ग पर चलना चाहता हो वो अपना घर पहले फूंक दे.

कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना सो चलै हमारे साथ

घर फूंकने का अर्थ है धन और मान का मोह त्याग देना, भूत और भविष्य की चिंता छोड़ देना और सत्य के सामने जो कुछ भी खड़ा हो उसे निर्ममतापूर्वक ध्वंस कर देना. पर सत्यों का सत्य यह है कि लोग कबीरदास के साथ चलने की प्रतिज्ञा करने के बाद भी घर नहीं फूंक सके. मठ बने, मंदिर बने, प्रचार के साधनों के आविष्कार किए गए और उनकी महिमा बताने के लिए अनेक पोथियां रची गईं. इस बात का बराबर प्रयत्न होता रहा और अपने इर्द-गिर्द के समाज में कोई यह न कह सके कि इनका अमुक कार्य सामाजिक दृष्टि से अनुचित है; अथार्त विद्रोही बनने की प्रतिज्ञा भूली गई; आगे चलकर गुरु-पद पाने के लिए हाईकोर्ट की भी शरण ली गई. यह कह देना कि यह सब गलत हुआ, कुछ विशेष काम की बात नहीं हुई. क्यों यह गलती हुई? माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए. यह सत्य है. कबीर पंथ का नाम तो यहां इसलिए आ गया क्योंकि ये सारी बातें कबीरपंथी साहित्य पढ़ते हुए मेरे मन में आईं हैं.नहीं तो सभी महापुरुषों के प्रवर्तित मार्ग की यही कहानी है. माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं. यह इतिहास की चिरोद्घोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है.

कारण साफ और सामने है. जब लोगों को एक तस्वीर दिखा दी जाती है कि अमुक धर्म औऱ संस्कृति संकट में है. पुराने जंग लगे हथियारों को निकालने का वक्त आ गया है तो लोग सोचना छोड़कर उनसे जो कहा जाता है वो करने पर उतारू हो जाते है. उन्हें स्वत: लगता है कि भारत माता, धर्म-संस्कृति और गो माता की रक्षा के लिए अगर किसी की हत्या भी की जाए तो उनके लिए वो हत्या नहीं वध है. शत्रुओं का नाश है.

धर्म और संस्कृति की रक्षा के मार्ग पर बुद्धि किनारे हट जाती है. सर पर एक धुन सवार होती है पंथ बचाने की. ऐसे में आपके विश्वास के प्रतिकूल या उससे जरा सी हटकर उठने वाली हर आावाज आपका खून खौला देती है. इस आवाज को दबाने के लिए सोशल मीडिया से लेकर व्यक्तिगत जीवन में भी आप एक जानवर की भांति रक्षात्मक मुद्रा में प्रहार करने को प्रेरित होते हैं. आपकी ये मुद्रा सोचने की शक्ति छीन कर आपको एक रौ में बहाने लगती है जैसे बरसाती नदियां बहती हैं. रास्ते में आने वाली हर चीज को नष्ट करती हुईं. ऐसे में अगर आपका धार्मिक गुरु या नेता जिसने आपको इस स्थिति में पहुंचाया है, मार्ग परिवर्तन के लिए अगर आपको रुकने का आदेश देगा तो आप उस आदेश की अवहेलना करके उसे कुचलते हुए आगे बढ़ जाएंगे क्योंकि आप सिर्फ भाग रहे हैं कहीं के लिए नहीं बल्कि कहीं से.कहीं पहुंचने के लिए. लेकिन कहां ये आपको पता नहीं क्योंकि आपने कंधों पर घर जोड़ने की जिम्मेदारी ले रखी है. और, इसमें साधन की शुचिता को आप आड़े नहीं आने दे सकते.

आप राजनेता हैं केजरीवाल जी, सेल्समैन न बनिए!


Arvind Kejriwalप्रिय मुख्यमंत्री जी,

आज आपको ये खुला पत्र इस भरोसे के साथ लिख रहा हूं कि आप नहीं तो आपके समर्थक जरूर इस पत्र में जाहिर की गई चिंताओं को समझेंगे. आपके दफ्तर पर कथित सीबीआई रेड के बाद से आप आक्रामक मुद्रा में हैं. आपने पहले प्रधानमंत्री को डरपोक बताया. फिर टीवी पर उन्हें और सीबीआई को उल्टा-सीधा कहा.

किसको कहा डजंट मैटर

खैर, मैं, किसको कहा के मुद्दे से कतई विचलित नहीं हूं. इससे पहले जनता रोबोट से लेकर रबर स्टांप तक न जाने क्या-क्या कह और सुन चुकी है. आपने तो अभी तक सिर्फ डरपोक ही कहा है. और डरपोक होना कोई बुरी बात भी नहीं.

लेकिन, मुद्दे की बात ये है कि आपने ऐसा क्यों कहा. वो भी टीवी पर. कुछेक कार्यकर्ताओं के सामने गुस्सा फूट पड़ना अलग बात है. लेकिन, नेशनल मीडिया के सामने क्यों? ऐसी बयानबाजी चीख-चीखकर कहती है कि आप जानबूझ कर वो भाषा बोल रहे हैं जो आपके वोटबैंक को ये बताए कि आप उनके लिए फैजल खान हुए जा रहे हैं. और, एक-एक करके उनके साथ हुए अन्यायों का बदला लेंगे.

पॉलिटिकल कंज्यूमेरिज्म उर्फ राजनैतिक उपभोक्तावाद

ये राजनैतिक उपभोक्तावाद की अगली कड़ी का विकास है. पहले नेता उत्पादक था और जनता ग्राहक. नेता किसी न किसी विचारधारा में अपने नारे भिगोकर जनता को बेचते थे. और, जनता बाल में लगाने वाले रंगबिरंगे रिबनों जैसे नारों को खरीद लेती थी. लेकिन, अब ऐसा नहीं है. नई कड़ी में नेता उत्पादक न होकर सेल्समैन है. ये नेता विचारधारा की पूंजी में यकीन नहीं रखते. और, रखें भी क्यों? जब हद्द लगे न फिटकरी रंग चोखो आए तो काहे विचार और धारा का सहारा लिया जाए. ऐसे में जनता जैसी भाषा चाहती है नेता वैसी भाषा बोलता है.

तमाम तनावों के तले दबी जनता को बस परफॉर्मर्स चाहिए. न्यूज चैनल पे एंकर जबरदस्त मजा दे, कॉमेडी शो में ‘शर्मा जी’ और पॉलिटिक्स में नेता जी. सो, आप मोदी जी को बादलों का ताऊ बताते रहो. लेकिन, इस नूरा-कुश्ती में आप अपना ही बड़ा नुकसान कर रहे हैं. इट्ज लीडर्स जॉब टू लीड. आपके इस अंदाज से आपकी ही पार्टी के नेताओं में कैसे गुण पैदा होंगे.

किसी भी पेशे में सर्वांगीण उत्कर्ष का रास्ता शिखर की ओर देखने और पूरी श्रद्धा से उसके कदमों का अनुपालन करने से होकर जाता है. ऐसे में आपके पास तो जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी की थाती है.

इन नेताओं ने घोर मतभेद होने के बाद भी कभी अपने विरोधियों के प्रति ऐसी अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं किया. मैं यहां अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की उनकी सरकार के प्रति टीका-टिप्पणी पर दिए गए भाषण को कोट कर रहा हूं. पढ़िए, अगर पढ़ सकें तो.

अटल बिहारी वाजपेयी कहते हैं –

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Book Review: Wanderers, All by Janhavi Achrekar is a good journey but with a bit of sluggishness


Book Review Janhavi achrekarWhile reading ‘Wanderers, All’, there was a constant thought in my mind if this book leaves its readers empowered with knowledge & understanding at the turn of final pages of the book. Or if the readers will highlight quotations and twist corners of important pages; but I reached to a conclusion, as I finished the book, that even pearls go unnoticed when they are in abundance. The author has beautifully recreated the old Bombay city of 1900s era when it was infected with plague and communal riots. Retelling the stories of her ancestors, she has talked about her great-great grandfathers and grandmothers with a bit of realism that is really appreciable. It was the time when females were not given enough respect but Achrekar’s female characters are embodied with sense of self-respect & self-dependency. She has even shown that despite progressive thinking and educated mindsets, the women of that era were cursed with social evils like difference between girl & boy child. With respect to these attributes, it’s a rare book that talks about the Mumbai metropolis of 1900. The author has painstakingly researched & shown us the lives of people that lived in this certain era. The characters are developed like real human beings, affected with real like emotions and challenges to Indian lifestyle in British Raj. The book encapsulates the beginning of freedom movement in the region of Maharashtra.

However, the problem lies with the length of the book. It’s a part memoir & part narrative of new age wanderers, stretched to 420 pages with dedicated chapters on Marathi plays and references to songs & poems. The first seven chapters introduce ‘Kinara’ – that’s possibly writer playing herself. She is young independent unmarried girl of 35, who wanders around the world. In these chapters, you travel along with Kinara and literally feel the weather of Goan beaches. She shares her philosophy about love, home, traveling and cosmopolitan lives. She is up to tread on the paths that her ancestors have once treaded. After brief intro to Kinara, the book goes on telling about three brothers, who were the top heads of Khedekar clan which she too belong. In these pages, readers feel the bit of adventure as it’s about nobleman and three sculptor brothers, who successfully made their fortune by impressing a king.

In case of books with parallel narratives, the risk of losing readers’ attention lies with author’s capacity of keeping both narratives attention-grabbing. Ashwin Sanghi has beautifully used this pattern in ‘The Krishna Key’ and Paulo Coelho did this in ‘Eleven Minutes’ (though, it goes with a main plot and sub plot of the story). Ashwin Sanghi has beautifully kept both narrations interesting and of page turner quality. At one side, he was narrating the quest of an ultimate weapon in modern time and secondary narration was about the Mahabharata war. The length of each chapter was equal. If it is not then chapters of secondary narrative were shorter than primary ones. So, the reader keeps on reading on and on, anticipating what is going to happen next. In ‘Wanderers, All’, the first few chapters are set in modern age and then the book goes on retelling the lives of author’s ancestors, lived in the 19th century. There is a certain part of the novel where it loses its readers like when there is a sole chapter on a Marathi play and two page long poems. The reader can still be carried forward if the story set in modern time hooks on.

Still, it can be said that this is a rare book and the readers should be patient enough to know all the intricate details about the people lived in the 19th century. Some books are like journeys, they bring you to distant places, make you meet new people while keeping you at the comfort of your home. So, it’s a good book but it could have been better if concluded in fewer pages than it is.

Correction: The reviewer pays sincere thanks to the author for reading this review and posting comment about the mistakes that earlier version of this review carried.

What if! Peter Mukarjea played Littlefinger


peter-indrani-mukherjea-lWell, the title of this post struck to me when I saw Peter Mukarajee, constantly changing his stand on Indrani Mukarjea’s arrest across the day. His first ever comment went like this, ‘The police will not make up a case and they would arrest a person only after they have something against her. They told us that she is being taken to a police station in connection with a case. There was nothing amiss in my wife’s conduct and the two share a very normal relationship like any other siblings.’ He gave this statement to Indian Express at about 12:30. As this story was developing constantly, he comes to know about Mikhail Bora’s interview and commented that he has been kept in dark and didn’t aware with any missing person FIR and Raigad farmhouse that Indrani’s family owns. It was little surprising that he couldn’t gauge the relationship between Indrani Mukarajee – his wife and Sheena Bora – passed off as Indrani’s cousin, given his lifelong career as a trader.

This all was happening while Indrani was being grilled by Mumbai police commissioner Rakesh Maria. In a matter of few minutes, social media got hit with the breaking news of Indrani accepting Sheena as her daughter from previous marriage. So at 1:00 PM, he talked to CNN-IBN to improvise his stand and dropped the bomb shell of intimate relationship between step-sibling Sheena and his elder son Rahul. He told the media that he was informed that Sheena left the country for America. Thus, he asked his devastated son Rahul to move on. This was something really disturbing and raises serious questions (that will probably go unanswered). The question is why he asked his son to move on if he wasn’t aware with the actual fate of Sheena. He said that Sheena’s contact number begun going switched off for ‘obvious reasons’. These ‘obvious reasons’ should be defined well because in today’s era youngsters don’t just shut up at the switched off dial tone of their lovers’ contact numbers. They go on searching them on virtual media and get suspicious when they don’t get them there too. So, this theory doesn’t seem working that he didn’t know anything remotely about Sheena’s murder. The more believable tale can go like this – he told his son about the murder of Sheena and asked to move on and his son indeed obeyed his father because he has not any other way out in such a condition.

Later on, he added to CNN-IBN reporter that Indrani didn’t approve Sheena’s affair with his son Rahul. It is an immature effort of framing Indrani as the murderer mother because Sheena and Rahul were not siblings with blood. They were indeed connected with the marriages of their parents. Rahul wasn’t the blood son of Indrani and so he could be an ‘OKAY GUY’ for Sheena if Indrani & Peter have not married. It cannot certainly be the case of honor killing because Indrani herself has married thrice and couldn’t possibly fuss over so called step-sibling love affair between Sheena & Rahul. Later on, it is being reported that police team is officially quizzing Peter Mukarajee.

The Twitter Factor

Like every other popular murder mystery in India, people start speaking (on Twitter & sometimes on TV) and media run their gibberish as credible inputs relevant to the reporting of the murder mystery. So, in this case too. People started tweeting and releasing personal histories related to Indrani & Sheena. Some tweeted with overt sense of pride that they studied together in some high school of Guwahati. While some came forward to say that this is the case of honor killing for scandalizing the matter in Lalit Modi way. The moment tweets started hitting with honor killing word, it alarmed newsrooms in Delhi to Mumbai. Everyone (reporters & social media reporters) started speculating and following the people close to the matter for more details. Soon after this, the news broke out that Indrani has accepted Sheena as her daughter. This was the moment when tweets of incest started coming in. It simply served what it should do to make Indrani look like Nupur Talwar in Aarushi Murder Case. But later on things started going amiss because honor killing trend died its natural death and Indrani started trending as a desperate social climber while the official execution is still on the go.

The LittleFinger Factor

It’s important that I remain true to what I have written in the title of this piece. It’s about seeing Peter in the shoes of LittleFinger (People who are not aware with LittleFinger aka Lord Baelish should google his name to know how he killed King Joffrey and put the blame on Tyrion Lannister and returned back to Kingslanding). Now, I like to add Avirook Sen’s comment where he has mentioned that Indrani was the half power at NewsX and she was inclined to increase her stake in the company. Moreover, her behaviour has been problematic and dominating for Peter Mukarjea. This was a possible reason to see Peter Mukarajee as suspicious because Sheena’s serious relations with his son can emerge as a problem of property dispute so he simply removed both from his path. It is a kind of saying that goes like this if you want to remove big people then purpose won’t be solved just by toppling them from power, you need to steal their right to speak as well.

Post Script: My post is not intended to see Peter as the accused like we are seeing Indrani as one. Instead of this, we must keep patience for the official press releases of official interrogators. Hope this will serve the purpose of this post.

Sorry Guys! this Airtel 4G TVC doesn’t go well


Dear Readers,

This morning, I got an email from Indiblogger.com. The email came as a source of happiness to me because it gave me the opportunity to talk to you guys by writing about ‘Airtel 4G internet challenge’ advert. I bet my entire Indian readership has already watched this Airtel television campaign. I feel like calling it television campaign instead of TVC that my advertising colleagues do. Because I think writers do and think differently so I try to think differently only to pretend myself that I am steadily becoming a big writer that I am not now at least. So, without distracting from my subject, I like to tell you that this post is about the advertisement film that is being used by Airtel for creating buzz for its 4G internet service product.

Today, internet is something we cannot live without today. It is powering thousands of creative agencies & web ventures across the world and now it is also powering up some of the top trending news sites. I have personally experienced that one day of internet unavailability brings the productivity of these news sites to bottom. They are kind of depended on Internet and I find that absurd.

Airtel 4G TVC
We have seen that Internet has the power to enable politicians to get hold of nation’s top post. We have lot to show what high speed internet can do for this nation and its youth but unfortunately we are being tagged as consumerists. I like to ask everyone if we all use internet to watch latest Honey Singh video, I believe we do not. The film tells we use internet to check top five management collages and watching coke studio, download movies and honey Singh videos. But the question looms at large that do we only do this with internet? Aren’t we building businesses out of internet and creating fortunes using the freedom internet has given us? I would have been happier if this TVC would have added a bit of video blogging or something that brings empowerment to us – the consumers of internet. I would have been very happy if this advertising film includes emerging video jockeys, stand-up comedians and our beloved ‘AIB’ sort of YouTube channels.

Now, there is less time left for 4G services to come in our hands and we are ready to enjoy the power of fast speed internet. I wish this time it comes for real.

Love Always
Anant

Post Script: I like to say that the solution of creating appropriate advertisement film that includes every section of Indian youth, lies in between (Read: moderation). The film created by Idea cellular company was way too exaggerated. Obviously, we can’t make robot by reading Wikipedia pages, can we? Please write back to me what you guys think about this.