Hues of A Soul

Words That Couldn't Get Space Elsewhere

Film Review: ‘Masaan’ जिंदगी जैसी एक फ‍िल्म


Masaan film review

Masaan film review

मसान पर कुछ लिखने से पहले जरूरी है कि इस फिल्म को ठीक ढंग से समझा जाए, इसकी प्र‍कृति की विवेचना की जाए। यह बताया जाये कि आखिर यह फिल्म किन मायनों में खास है और किस तरह मसान फिल्म-दर-फिल्म बदलते भारतीय सिनेमा के बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरती है। भारत और खासकर बॉलीवुड में सिनेमा को सिद्धांतता: भारतीय जनमानस का अक्स दिखाने वाला आईना कहा जाता है। लेकिन बॉलीवुड की जमीन पर उगने वाली वाली बहुसंख्यक फिल्मों ने इसे एक ऐसे जादुई आईने में परिवर्तित कर दिया है जिसमें वह दिखाई पड़ता है जो हमारा जनमानस देखना चाहता है। इसमें चकाचौंध है, फुंके हुए सपने हैं, फार्मूले हैं और रेस भी। लेकिन इसके ठीक उलट साहित्य शब्दों के जरिए अपने पाठकों को उनकी जिंदगी का एक्सरे दिखाने का प्रयास करता नजर आता है। फिर बारी आती है कविता की तो यह एक इंजेक्शन की तरह पाठक को उस जगह पहुंचा देती हैं जहां उसमें थोड़ी बहुत संवेदना बची रह गई है।

अब बात करते हैं कि आखिर मसान है क्या। नीरज घ्यावन और वरुण ग्रोवर की फिल्म ‘मसान’ फिल्म, गद्य और काव्य विधाओं का एक ऐसा संगम है जो भारतीय सिनेमा के लिए किसी कुंभ से कम नहीं हैं। यह वह मोड़ है जहां से एक नया दौर शुरु होने की प्रबल संभावना दिखाई पड़ती है। फिल्म का पहला फ्रेम ‘बृज नारायण चकबस्त’ की नज्म “ज़िन्दगी क्या है, अनासिर में ज़हूर-ए-तरतीब, मौत क्या है, इनीं अज़ा का परेशाँ होना।” से शुरु होती है। दूसरे फ्रेम से ही फिल्म आपको उस जिंदगी में ले जाती है जहां एक सेल्फ डिपेंड लड़की पहली बार सैक्स का अनुभव ठीक से लेने के लिए कंप्यूटर पर ब्लूफिल्म देख रही है। ठीक! यहीं से आप फिल्म में उतर जाते हैं। कहीं जाति, न्याय और प्रशासन की चोट खाते इन युवाओं के टूटते चेहरों में आप खुद को देखते हैं। तो कहीं पहली बारिश की तरह ताजे इश्क में पड़ते हुए चेहरों को गुलाब होते हुए भी देखते हैं। असल बात यह है कि फिल्म में नायक नहीं है। फिल्म का परिवेश ही नायक है जो कि एक अक्स है हमारी आपकी जिंदगी का। कथानक की बात करें तो यह उस दौर की फिल्म है जब भारतीय युवा तकनीक के संमदर में गोते लगाता हुआ सामाजिक कुरितियों और बंधनों को तोड़कर एक स्वछंद पक्षी की तरह उड़ जाने को आतुर है। वह हर धारा, प्रवाह और उसके मूल को समझने की कोशि‍श में है। वह जानना चाहता है कि आखि‍र ऐसा है तो क्यों है और नहीं है तो क्यों नहीं। लेकिन कुछ पंख फड़फड़ाने पर ही वह जाति व्यवस्था, न्याय और प्रशासन के अदृश्य पिंजर में कैद हो जाता है। इससे उसकी मासूमियत तो मरती है लेकिन जिंदगी के प्रति उसका नजरिया वही रहता है।

अभिनय की बात करें तो दीपक चौधरी के रोल में विकी कौशल, देवी पाठक के रोल में रिचा चढ्ढा और शालू गुप्ता के रोल में श्वेता त्रिपाठी ने बिलकुल अपनी टीनऐज को एक बार फिर से जी डाला है। जिस तरह अपनी छत पर टहलते हुए शालू फोन पर अपने नए-नए बने दोस्त दीपक को सितारों को आंखों में महफूज रख लो… जैसे जाने पहचाने शेर सुनाती हैं वह सच्चाई के काफी करीब नजर आती हैं। यह दोस्ती शालू को वह स्पेस देती है जिसमें वह खुद को चाहने वाले शख्स से उस जुबां में बात कर सकती है जिसे वह पसंद करती हैं। वह शायरी कह सकती हैं और निदा फाजली एवं बशीर बद्र के प्रति अपने प्रेम का इजिहार कर सकती हैं। इसी तरह जब फोन पर दूसरी ओर शेर और नज्मों से दूर दूर तक नाता ना रखने वाले दीपक मुस्कुराकर बोलते हैं कि समझ नहीं आया, पर बहुत अच्छा था, अपनी दोस्त को अपनी बात पर यकीन दिलाने के लिए वह स्वाभाविक रूप से कहते हैं ‘कसम से बहुत ही अच्छा है।’ यह सीन देखकर सिनेमाहॉल में बैठे छोटे शहरों के मिडिल क्लास युवा जरूर मुस्कुरा देते हैं। वह दौर याद आ जाता है जब नोकिया 3315 पर एसएमएस में शायरी भेज भेजकर प्यार का इजहार होता था और लड़के-लड़कियां बाकायदगी के साथ इन शायरियों की डायरी मैंटेन करते थे। तब वो मोहब्बत भी शायरियों जितनी पाक होती थी। क्योंकि आशिक शायरी भेजने से पहले उसके असर और छुअन को टटोलने का प्रयास जरूर करते थे। संजय मिश्रा की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है क्योंकि उन्होने विद्याधर पाठक के रोल को जीवंत कर दिया है। विद्याधर पाठक की पात्र रचना अपने आप में एक बायोपिक सी जान पड़ती है उस संस्कृत प्रोफेसर के बारे में जो हालातों की मार से प्रोफेसरी छोड़, कर्मकांड और जूआ तक खेल अपने सभी मूल्यों को गंगा में बहाने को मजबूर दिखाई पड़ता है। इंस्पेक्टर के बारे में इतनी सी बात है कि इंस्पेक्टर की बेटी को फिल्म में देखते ही दर्शक के मन में सहज अपेक्षा पैदा होती है कि अब कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे अपनी बेटी के किसी कांड में फंसने पर फिल्म के एकमात्र विलेन को उसके किये का अहसास हो जाएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं क्योंकि आम जिंदगी में भी ऐसा नहीं होता। फिल्म में वह ही दिखता है जो एक सामान्य व्यक्‍त‍ि अपनी सामान्य सी शक्तियों से देख सकता है। फिल्म ईश्वरीय न्याय की प्रामाणिकता स्थापित करने की जगह यर्थाथ दिखाती है।

फिर फिल्म में एक दौर आता है जब अपने हाथों से सबकुछ बिखरता हुआ दिखने लगता है। फिल्म के पात्रों के साथ-साथ सीटों से चिपके हुए दर्शकों की आंखें भी जर्रा-जर्रा आंसुओं में बहती दिखाई देती हैं। यह वह क्षण हैं जब फिल्म साहित्य में घुसकर कविता हो जाती है। कुछ दृश्य इतने पॉवरफुल हैं कि सीट पर बैठे मजबूत से मजबूत आदमी को रोने को मजबूर कर दे। पर्दे पर दर्द से कराहते पात्रों को देखने से आप अंदर तक हिल जाते हैं। फिल्म की यूएसपी यह है कि यह जिंदगी को जस का तस दिखा देती है और फिल्म खत्म होते होते पर्दे से आपके भीतर उतर जाती है।

Hey Little Sparrow! Stop coming to my dreams


Hues of a Soul Love Story Once upon a time, there was a writer in south town of London. Living in utter solitude, he was trying to figure out his relationship with a little sparrow bird that comes every morning to land up on his writing table. Every night he thought about people who goes through lost love trauma. He thinks why people go after love, knowing that it’s the thing that leave everyone emotionally robbed and wounded but every morning when he goes to write, the little bird comes over. He kind of started liking her spurious presence. One day, the bird turns into a beautiful girl and started coming over for morning coffee. The writer somehow could not gauge the abstract creation of the girl. He just started spending great time with the girl. They go together for buying groceries, have morning coffee and say goodbye to eachother as the sun sets. Now every morning, when the writer goes on writing his study on lost love, he instead writes about the beauty of love. And one day, the beautiful girl turned into a bird again without saying goodbye to the writer whom she loved. Now, the writer dreams of saving her girl from goons, buying groceries together and in morning he wakes up screaming at the little sparrow, ‘Hey Little Sparrow, stop coming to my dreams’. The little sparrow smiles as ever before…

Ohh! CM Promised? But who cares your land is so valuable


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What do we call ‘development’ in cities like Kanpur; a newly constructed road, freshly painted divider or a mega sized road over bridge? I believe a road over bridge will fit the bill considering the necessity of infrastructural development in the city. But I am aghast to see that how the construction of an ROB can force someone to leave one’s house when that didn’t come under range of houses that needs to be demolished.

This is the story of an under construction road over bridge in Kanpur. It will replace the existing 45 years old bridge that connects South Kanpur to North Kanpur. South zone of Kanpur pumps blood in North Kanpur as New Bombay does to Nariman Point. People from all economic classes travel about 30 minutes to get to the heart of the city to work as accountants, managers, parking boys, tea vendors, and child labors. The large amount of vehicles that passes through this over bridge cause regular traffic jams. At times, the jam goes on for 6 hours because the existing bridge is designed, considering the traffic needs of 1970. The population has increased from 1,275,242 in 1971 census to 4,581,268 in 2011 census. And now 92% of total households posses basic means of mobility like two wheeler and cars. Despite such great necessity, this road over bridge was long delayed because there is a slum beneath this old and fragile bridge. There has been a great show of protest, local politics and failure of government machinery collectively. But, this time government acted so fast that the slum dwellers couldn’t get the chance to protest and end up packing their stuffs. The state government has considerably given one room flat as compensation to families whose houses were demolished and compensation to those who didn’t accept the flats.

But here comes a great deal of mismanagement. The government given flats are based out of the city. Women who are working as house maids, baby sitters or clean utensils in nearby colonies will have to travel about two hours to get to their jobs from their new homes. The same goes for men and students who study in make shift schools and government funded colleges. They will have to walk on foot for 5 kilometers to get the bus to enter in the city than it will take some about 45 minutes to reach their workplaces. In morning hours, it is okay to walk for such a long distance but evening hours will cause great security risks to women.

The other depressing features of this compensation scheme is lack of compassion in awarding flats and fishy distribution of cash compensations. There does not seem a visible mechanism of how cash compensations are being distributed. Some slum house owners have got three colonies against one house and some have got single colony. The highest compensation amount rupees 88 lakh goes to a house owner, who in real is a rich businessmen, owns luxury cars and sells premium furniture at a showroom in a market place. Some people has got 18 lakh rupees as compensation for demolition of their one foot long balcony.

While working on this report, I met a 50 year old lady who lost her husband few days after demolition of her home. This old lady can’t take stairs due to backache problem. The lady told me that UP CM Akhilesh Yadav promised her individually that she will get a ground floor flat but now she is being denied. There is another lady who is a mother to married sons. Her three story home was enough for 13 family members but now she is compulsive to accommodate her big family in government-provided 7*10 feet flat. She got a colony because her house was going to be demolished but later it didn’t. The houses that were less than 10 feet close to the pillars were destined to be demolished. This lady’s house were certainly not 10 feet close so his sons refused to leave the house. But here came the local police who thrashed him up for not leaving his home. They brought him to nearest police station for threatening. The word ‘thana’ threatens these guys.

So, sanctioning this road over bridge is indeed a service to the people of this city. But the big question still looms high that why some people has to suffer for the comfort of others.

Book Review: Nusrat Fateh Ali Khan – The Musical Alchemy


Nusrat Fateh ALi Khan Biography

We know musicians with their music and Nusrat Fateh Ali Khan is no exception to this basic rule. But when we read the biographies of such artists, it enriches our understanding with art and artists. Pierre Alain Baud’s paean to the legend of Qawwali is one such interesting read. The writer has travelled and spent a great deal of time with the legend Qawwal and it reflects in tiny details of NFAK’s life. It fosters my belief in the thought that creating music is like doing alchemy. You add lots of efforts to get a right tune out of your vocal chords and percussion instruments and only a few shot to fame the way NFAK has done. I still remember when I came across the soulful music of Nusrat. It was my exam’s day and Nusrat’s song was being played loud in the auto I was taking to college. On being distracted, I asked the auto driver to slow down or just stop the music and he did. But till then Nusrat’s music was all over my head. Exam went well but I was still humming the tone. It irritated me and pushed to listen the whole song. In those days, Google required a keyword to give any results so I tried hard to recall any word from the tone. But I got only Gorakh Dhandha and after 20 minutes of extensive research, I could find “Tum Ek Gorakh Dhandha Ho”. Since then I am in love with NFAKs music.

Pierre Alain Baud has painstakingly researched and soulfully written on the great Qawwal’s life. He has brought the details about the art form and resourceful information on the evolution of Qawwali. He has talked about the Qawwali in detail. As the date goes back to eight century when Sufi saints first came to south Asia as Muslim missionaries from Iran, Afghanistan and Syria to propagate Prophet Mohammad’s message. This was the group of secular wanderers, who took the esoteric path to reveal the batin; the thing behind the Zahir. They believed in worshipping god with their excellence of music and spread Prophet Mohammad’s message through humanitarian verses and poetries. It dots the time of famous poets Rumi, Sufi Saint Bulle Shah, Baba Faird and Nizamuddin Aulia etcetera. In Sufi culture, there is a tradition of music & Qawwali. The kids get their initiation from Pir then they go on learning and practising the art for years before going live.

Inclusion of instruments – specific to Qawwali is really appreciating. It fills the half empty glass. The book says that before 18th century, Qawwali sessions were adorned with indigenous percussion instruments like Sarangi, Dholak and Shahnai. These big sized instruments were a pain for musicians as they took time for readjustment to the changing pitches of vocalists. Right then a Bengali instrument maker Dwarkanath Ghosh transformed an English harmonium into a hand-held instrument. It set the stage for Qawwals like Fateh Ali Khan and Mubarak Ali Khan brothers and later for Nusrat’s journey to planetary fame.

The first half of the book talks about art, Chistiya brotherhood, Nusrat’s lineages and some less known tombs like Alauddin Sabir Kaliyar in Rurkee, Uttarakhand (closely associated with Nusrat’s family). The narration covers nine generations of NFAKs genealogy. The close associations with Qawwal bachha Gharana, which was founded by Sufi saint Nizamuddin Aulia and political allegiances of Nusrat’s forefathers. It includes political allegiance of Fateh Ali Khan and Mubaraq Ali Khan brothers as they propagated two-nation theory with poet Iqbal’s verses. Unlike his guardians, NFAK adopted Bulle Shah, Baba Farid and Rumi’s verses, which talks about the god and his beloved. Such verses were beyond any communal allegiance and thus earned love from all corners of the divided India & Pakistan. Including this, Nusrat sang shabad of Punjabi tradition and Saanvre tore bin of Hindu tradition. It shows him a bit secular but the book doesn’t tell about Nusrat’s stand on Hindu-Muslim conflicts. It doesn’t say if he was secular or adjust himself with changing political tides of south East Asia.

Everyone expects some sort of miraculous stories from the biographies of legends. It holds many. The one is about a dream when NFAK still a child sees his late father who brought Nusrat to Ajmer Sharif and asked to sing. In real, Nusrat instantly recognized the place and set to sing when he first visited Ajmer Sharif. It also opens up thing that shows legends are normal human being. They just try little hard for what they believe in. Nusrat used to have a habit of listening TV shows and advertisements whenever he goes on his foreign tours. It lets him understand the music of foreign soil before his concerts. And when he applies the local music notes in his performances, it got him huge success in places like Japan and Sudan.
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Pierre Alain Baud’s work is in French and English Translation has done by Renuka Ghosh. Ghosh’s translation is not devoid of the personal touch that should be felt in Baud’s personal account. Though, I strongly believe that the verses, written in Urdu, English and roman hindi. The latter should be written in devnagri lipi to add the life to verses of Baba Bulleshah. These are beautifully embedded like a special notes of NFAK. Freancis Vernhet has carved the book cover out of gold sand and have scattered all over the book cover. On the jacket, there are prints of NFAK audio tapes. On the second cover, there are news clips that echoes with larger than life stature of Nusrat Fateh Ali Khan, who has is living immortally with his soothing voice.

Book Review: No Direction Rome By Kaushik Barua


No Direction Rome book reviewWhat if in a war between evil and good, evil wins? He then will go on executing all the good people at mass gathering spots of his newly owned capital. Like Lord Ned Stark got executed at Kingslanding in front of thousands of people; this includes her daughter, some infants and his ardent followers. After all the executions done. He – the evil will start passing strict laws to strike down all the hidden enemies to his newly formed state. It will set more stages of public executions. People will cheer on seeing perpetrators’ head rolling on ground. They will fill the sky with religious slogans. Then the peace will fall. Years will start passing on. He will make sensible rules to prolong his rule on land he won. He won’t let some war mongers create war like situations out of nothing. Instead he will setup a group of analysts and spies who will get him sane advices to run the state where everyone can feel that they belong to the state and the land which has just been won belongs to them. So the land can become the motherland for their kids and to the kids of kids. So someday they can go on waging wars for their motherland, which was, a war ago, motherland to some other kind of people. The kids will hear glorious war stories that how their forefathers won that important war over good people. The meaning of good in that state will be bad. So they will cheer being called bad. Then who was bad and who was good. You get directionless and that’s Kaushik Barua’s latest book is all about.

Written in unconventional style, ‘No Direction Rome’ seems like a 189 pages long Eminem song. You see angst, aggression, hopelessness and a frenzy race in present towards future. But that so called future doesn’t seem coming and protagonist keep running till their lungs lasts.  No Direction Rome’s protagonist Krantik is living in Rome and leading a life full of hopelessness. He works in a multinational company where he doesn’t find solace. Having a dead-end relationship with a daughter of an MP, he is trying to figure out where his life is leading him. On her fiancée request, he visits to Amsterdam where his fiancée Pooja tries to commit suicide. She then flies back to her family in India and here begins the unending rant that only ends in the final pages of the book. He goes on travelling alone, interacts with strangers, goes on stalking and talking to a girl standing alone in a corner then visits a place he has not prior intention of.

I doubt if dead-end relationship has anything to do with the psychologically upheaval lifestyle of the protagonist. He goes on dating a girl, he doesn’t familiar with and talks of crony capitalism on his first unannounced date. The real good thing about Kaushik Barua’s second book is its vivid descriptions. But I am reading him for the first time so I felt overwhelmed with the pace and bombarding of psychological rant. In one paragraph, he talks about having joint at his colleagues’ apartment and in second line he goes on telling that Rome is filled with crazy people. He says that the city is a big mental asylum where crazy people have been kept. Since relative of the inmates haven’t come to receive them so they have been let loose on streets like animals. And, to keep the streets safe they have been again locked up in their shiny offices. Then after few words he goes on saying he had three joints with his friends. He took orange juice and his friends got gin and tonics. In his long rants, he beautifully creates a window to interact with his readers to keep them engaged. While talking about the asylum rant, he says they had this asylum on the outskirts on the city, and then they had to shut it down, fiscal tightening etcetera (I like writing etcetera, it’s so much classier than abbreviation).  With his small comment as an author, he reconnects with the readers. But what I seriously felt that this seems good as long as you have got good stuff to throw on your readers because in some pages the pace goes extremely slow and boring.

The cover has been designed by a London based independent book cover page designer Arati devasher. Arati has used small caps font for the book & author’s name on the background of a whirlpool of dust and smoke. And, sides are adorned with symbolic Colosseum building which is upside down like a scene in Christopher Nolen’s movie Inception. The whole design of the cover collectively creates directionlessness mood of the book.

Collectively, it’s like a record of human life where everything is being recorded. The spoken and unspoken words, private thoughts and privates acts, conscious thoughts and unconscious thoughts, dreams and inner dreams too. It’s like a Spiderman prose where writer jumps from this scene to that scene within words and five to six word long sentences. You can miss an important event if reading casually.

Chopra opens the Flood Gates With a Scrapbook of Memories


ashok-chopra-book-scrapbook-memoriesHow do we get to know the real self of our favorite authors? How do they think, write and go on publishing their notes, scribbled sometimes on matchboxes, paper napkins or on the back covers of their favorite books. Sometimes a single paragraph or even a line of wisdom can turn a reader loyal to the author. We then go on churning internet for hours to know the publishing process of the works we love, the hardships that our author has gone through with and about the hidden inspirations. This is the next degree of being a loyal reader. We often notice such loyalty in movie buffs; they know the names of directors, actors, writers, lyricists and even production team members before even entering in the movie hall. But seeking all such details is pretty tough in case of books. On googling author’s name or the book, you get numerous links leading you to buy the book or a fine 300 word piece written by PR people for marketing of the title. The Ace publisher Ashok Chopra has opened the flood gates by publishing ‘The Scrapebook of Memories’. Now, others publishers can follow. The beauty of this book is like a good movie. You can not put it down after start reading even opening pages randomly. Each page is written with such a simple and lucid tone that you keep on reading the book. Curiosity goes on and on with each passing paragraph. Though, the hard cover edition makes it difficult to carry this 383 pages long book. It encompasses Chopra’s frequent interactions with publishing legends like Khushwant Singh, M. F. Husain, Dev Anand, J. N. Dixit, Shobha De, Dilip Kumar, Zail Singh and Satish Gujral. In the second part of the book, Chopra has shared his memoirs with cities like Shimla, the Gaiety Theater, and about historical novels. In one chapter, the publisher talks about Gita Mehta’s Raj and Salman Rushdi’s Midnight Children. He marks the evolution of Indian non-fiction and historical fiction genres with Khushwant Singh’s Train to Pakistan and Rushdi’s Midnight Children’s. In a country like India, where people generally don’t talk about books, authors and long form writing, this book tells you before print stories about famous books like Khushwant Singh’s autobiography. While writing about Khushwant Singh and Dileep Kumar, the author recalls his memorable liaisons with legends. He shares a private incident when 99 year old Khushwant Singh asks Chopra if he had any lover in his life. On getting the negative response, Khushwant goes on asking him to have one by reciting a Persian couplet. It shows what Khushwant was at the age 99; the person who at the age of 99 can take care of his associates as a good old grand pa while being as friendly as classmates. He shares one incident when Bollywood legend Dilip Kumar tenderly asks him to visit him often as his visits gets solace to him. Now after a career of 40 years, Ashok Chopra has written about all such memories that usually don’t come in public space. Indian publishing professional don’t talk about such things public and we don’t get to know what happens before publishing of books.

Book Review: From Home to House – Writings from Exiled Kashmiri Pandits


kashmiri pandits“From Home to House: Writings of Kashmiri Pandits in Exile” is a beautiful collection of heart wrenching short stories. The book hold excerpts from celebrated books like The Garden of Solitude, Blood on Forehead and Refugee in My Own Country. It carries stories of a fanatic friend, an aging old man, encounter with militants, and with non-fiction essays all by exiled Kashmiri Pandits. Some are translated from Kashmiri and Hindi to English. Stories like Addition, Subtraction and division, Under the shadow of Militancy and Garden of Solitude stands out of crowd.

While writing this piece, I was constantly thinking about how many people actually read the preface of any anthology. This book’s preface made me learn that preface works like the holy symbols imprinted on front doors. They tell a lot about house owner like religious leanings of house owners. In case of such books, we get to know how book publishers think about the issue. The preface leads us to the fateful night of 19th January 1990 exactly when exodus begun. But it tells a different story and contradicts with Rahul Pandita’s book especially on part of Kashmiri Muslims. In RP’s memoir, we have learned that Kashmiri Muslims played the role of a catalyst in the crisis. They got overpowered with greed and religious extremism. This book describes helplessness on part of Kashmiri Muslims. Yet it gives a new perspective. As the book carries personal experiences and echoes the voice of KP groups so it must be read widely.

Stories I loved: 

The Garden of Solitude: Excerpted from Siddharth Gigoo’s famous book The Garden of Solitude is a great read. I am quoting one line from the story: “Everyday I live the life of a centipede, I crawl. I lick. I hide. I sting. I wake up to the fumes o f kerosine in the Morning.” Siddharth Gigoo has shown the refugee camps in such a way that while reading you begin feeling the pain of exiled KPs.

Addition, Subtraction and division: It shows the discomfort of an exiled KP in other caste marriages. The pain of losing ages family tradition reflects beautifully. But as survival demands a big price so Kashmiriyat is the price for exiled KPs.

50 Words Verdict
It is an easy read for people who are interested in reading stories from varied people. Multiple accounts on one specific topic helps the reader in understanding the problem and pain of affected community collectively. Hence It’s a good book to read.

देखो! कानपुर में ऐसे आती है एंबुलैंस…


samajwadi-ambulance-53f822bअपनी कंट्री में जनता की भरपूर मात्रा देखते हुए पूरे ब्रह्मांड की कंपनियों ने अपने अपने घौसले बना लिए हैं। पिज्‍जा से लेकर कंडोम तक सब फोन पर मिलेगा।  कस्‍सम से कभी ट्राई तो कीजिए अपनी दिल्‍ली में बहुतेरी ऐसी कंपनियां भी हैं जो आधी रात में सुट्टा तक बेच रही हैं. और तो और घर आके दे रही हैं. लेकिन सरकारी एंबुलेंस के केस में ऐसा नहीं है दोस्‍त। अभी कुछ दिन हुए ऑ‍फिस से पूरा दिन टाइपिंग करके बाहर निकला ही था कि तभी एक चौराहे पर दो-तीन लोगों को गुंडे फिल्‍म के रणवीर ओर अर्जुन कपूर की तरह लड़ते देखा। गाड़ी चलाते-चलाते ऐसा लगा कि साला एक ना एक तो जाएगा। फिर भी गाड़ी की स्‍पीड स्‍लो करके आगे बढ़ा जा रहा था और नजरें लड़ाई पे थीं। कानपुर में लड़ाई किसी की हो देखता पूरा मोहल्‍ला है, मोहल्‍ला तो मोहल्‍ला, रिश्‍तेदार भी पूरे मामले को चटाके लगा के सुनते हैं। फिर देखते-देखते एक सिरकिटी सा बांस जैसी कदकाठी वाला बंदा जमीन चाट गया। गालियों वाला गुस्‍सा पूरे उफान पर था। आने-जाने वाले लोग भी फ्री का सिनेमा देख रहे थे। किसी को मार खाता देख बदन में एक अजीब सनसनाहट होती है। उसी सनसनाहट का अनुभव करते हुए लोगों का मजमा लगना शुरु हो गया था। लेकिन मेरी नजर जमीन पर पड़े उस बंदे पे थी जो नाक में घूंसा खाने के बाद बेहोश हो गया था। नाक से झल-झल खून बह रहा था। मुझे लगा कि कहीं मर ना जाए बेचारा। एक बार लगा कि साला हीरो की तरह उतरकर इसे हॉस्पिटल पहुंचाया जाए, फिर याद आया कि ऐसे केसेज में अक्‍सर बचाने वाला फंस जाता है। नया-नया पत्रकार हुआ था और पुलिस कचहरी से अभी भी डर ही लगता था। एक बार गाड़ी किनारे लगाई भी फिर सोचा अगर बंदा मर गया होगा तो फालतू की लेथन होगी और कल फिर दफ्तर पहुंचना है। साला ऑफिस से कोई सही गवाही देने भी नहीं आएगा। ऑफिस किंग्‍सलैंडिंग जैसा लगता है। लेकिन बंदे को तो बचाना था ही तो किनारे खड़े होकर एंबुलेंस को फोन मिला दिए। अब आगे देखिए कि यूपी में मरीज तक कैसे पहुंचती है एंबुलेंस।

अनंत प्रकाश – हैलो, मैं मरियमपुर चौराहे, कानपुर से बोल रहा हुं, यहां एक बंदा जमीन पे पड़ा हुआ है, नाक से खून बह रहा है। जितना जल्दी हो सकें पहुचें एंबुलेंस भेजा।

एंबुलेंस कंट्रोल रूम – जी, कहां हुआ है एक्सीडेंट?

अनंत प्रकाश – जी मैं मरियमपुर चौराहे से बोल रहा हुं, यहां एक मेडिकल स्टोर है और लड़का जमीन पर पड़ा हुआ है। प्लीज आइए!
एंबुलेंस कंट्रोल रूम – जी, प्लीज बताएं कि आप कानपुर नगर या देहात किस जिले से बोल रहे है?
अनंत प्रकाश – मुझे नहीं पता है कि ये जगह कौन जिले में आती है लेकिन आप प्लीज किसी नजदीकी अस्पताल से एंबुलेंस भेजिए।
कंट्रोल रूम – देखि‍ए! आसपास खड़े लोगों से पता करो कि आप कहां खड़े हो, किस जिले में हुई है। इसके बाद दुबारा कॉल करो। यह कहकर फोन काट दिया गया। इसके बाद मैने आसपास खड़े लोगों से जानकारी इकठ्ठी करके दुबारा फोन लगाया।
अनंत प्रकाश – हैलो, मरियमपुर चौराहा कानपुर नगर में आता है और अब प्लीज एंबुलेंस भेजो। (मन से तो कसम से गालियां निकल रही थीं)
कंट्रोल रूम – धन्यवाद महोदय, लेकिन कृप्या बताएं कि घटनास्थल के सबसे नजदीक में कौन सा अस्पताल है-
अनंत प्रकाश – जी, मरियमपुर अस्पताल- (मैने पूरे आत्‍मविश्‍वास से कहा)
कंट्रोल रूम – (लगभग चिल्लाते हुए अंदाज में) कृप्या सरकारी अस्पताल बताएं। (ऐसे बोला जैसे उसने गलत एड्रेस पे एंबुलेंस भेज दी हो-)
अनंत प्रकाश – जी, हैलट- लाला लाजपत राय…
कंट्रोल रूम– यह घटनास्थल से कितना दूर है?
अनंत प्रकाश – जी, कुछ तीन किलोमीटर-
कंट्रोल रूम – होल्ड पर रहो, हम आपकी बात एंबुलेंस वाले से करा रहे हैं।
अनंत प्रकाश – (सरप्राइज्ड होते हुए) जी, जरूर,
कंट्रोल रूम – हैलो, हैलट एंबुलेंस कर्मी सपोर्ट स्टाफ, मरियमपुर के पास एक मरीज है जरा बात करो।
हैलट एंबुलेंस कर्मी – जी, बताएं,
अनंत प्रकाश –जी, मरियमपुर चौराहे, कानपुर से बोल रहा हुं, यहां एक बंदा जमीन पे पड़ा हुआ है, नाक से बहुत जोर खून बह रहा है। जित्ता जल्दी हो सकें पहुचो। (अब मैं पूरी तरह से गुस्‍से में बोल रहा था क्‍योंकि एंबुलेंस भेजने की जगह ड्रामे कर रहा था कंट्रोल रूम वाला-)
हैलट एंबुलेंस कर्मी – (चिल्लाते हुए) तुम्हे पता नहीं है कि मरियमपुर चौराहे के बगल में फजलगंज सरकारी अस्पताल है। हमें काहे काल करवा रहे हो।
अनंत प्रकाश – अब एंबुलेंस भेजोगे या‍ बस बात करोगे।
कंट्रोल रूम (शुद्ध हिंदी में थोड़ा कड़क आवाज में) – महोदय आप थोड़ा पेशेंस रखें फजलगंज से आपकी बात करा रहे हैं।
कंट्रोल रूम– हैलो, फजलगंज एंबुलेंस कर्मी सपोर्ट स्टाफ, मरियमपुर में एक मरीज है जरा बात कीजिए।
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी– जी, बताइए-
अनंत प्रकाश – जी, मरियमपुर चौराहे, कानपुर से बोल रहा हुं, यहां एक बंदा जमीन पे पड़ा है, नाक से खून बह रहा है। बहुत खून बह रहा है- प्लीज जितना जल्दी हो सकें, आ जाइए- (इस बार में शायद चौथी बार एक ही बात कह रहा था लेकिन एंबुलेंस का नामौनिशान नहीं था-)
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी- जी, आप वहीं रुकिए, एंबुलेंस पहुंच रही है।
अनंत प्रकाश – पर मेरा, यहां रहना क्‍यों जरूरी है- मुझे ऑफिस पहुंचना है। (मैनें चौंकते हुए पूछा-)
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी – जी, आप इतना महान काम कर रहे हो, थोड़ा रुक जाओ, पूरा कर लो- जिससे एंबुलेंस पहुंच सके।
अनंत प्रकाश – समझो ना यार- ऑफिस ना पहुंचा तो नौकरी जाती रहेगी-
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी – जी, ऐसे में एंबुलेंस नहीं पहुंच पाएगी क्योंकि घटनास्थल पर इनफॉर्मर को अवेलेबल रहना जरूरी है।

फोन कट…

In a Free State by VS Naipaul (Hindi) – A Tasteless Translation


in a free stateकिसी भी अनुवादित किताब की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितने सरल अंदाज और परिचित शब्‍दों के साथ मूल किताब के तत्‍व को अपने रीडर्स तक पहुंचाती है। एक मीनिंगफुल ट्रांसलेशन अपने रीडर्स से एक अदृश्य गाइड की तरह जुड़ता है। यह कुछ ऐसे है कि आपको गांव की संस्कृति में रचे-बसे एक ग्रामीण को गांव से बाहर निकाले बिना फ्रांस की यात्रा करानी हो। लेकिन इस यात्रा की सार्थकता इस बात में है कि ग्रामीण आपकी बात सुनते-सुनते फ्रांस की गलि‍यों में नंगे पैर चलते हुए पत्‍थरों की छुअन को महसूस कर सके। एफिल टावर के गगनचुंबी शि‍खर पर खड़े होकर पेरिस शहर की भव्‍यता को अपनी आंखों से देखने का अनुभव प्राप्‍त कर सके। पेरिस के कॉफी कैफे में बैठे लोगों के बीच फ्रेंच भाषा में जारी बातचीत को सुनकर पैदा होने वाली उत्सुकता महसूस कर सके। और कभी मौका मिलने पर फ्रांस पहुंचे तो ऐसे अनुभव करे जैसे वह उन सभी जगहों को दूसरी बार देख रहा हो। लेकि‍न यह एक कठिन काम है। ऐसा करने के लिए आपको डिक्शनरी को किनारे रखना पड़ता है और जिंदा लोगों के बीच उतरना होता है। उन शब्दों, संज्ञाओं और परिचयों की खोज करनी पड़ती है जिनसे आम जनमानस का रोज साबका पड़ता है। कोल्ड-ड्रिंक के जिक्र के लिए ठंडा पेय की जगह ‘ठंडा’ शब्द ढूढ़ना पड़ता है। कारिंदों की जगह मजदूर या वर्कर्स शब्द की तलाश करनी पड़ती है और पोशाक को ड्रेस या पहनावा कहना पड़ता है।

ऐसा ना करते हुए हम डिक्शनरी की सहायता से ट्रांसलेशन को तो ठीक करते जाते हैं। लेकिन शब्द दर शब्द रीडर्स से दूर होते जाते हैं। वीएस नॉयपॉल की किताब ‘इन ए फ्री स्टेट’ के ट्रांसलेशन को पढ़ते समय मुझे कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ. ऐसे लगा जैसे कोई कोर्स की किताब पढ़ रहा हुं। जैसे सुगर होने पर बिना चीनी की चाय पीनी पड़ रही हो। बिना तेल मसाले वाली लौकी और तौरई की सब्जि‍यां खानी पड़ रही हों। किताब के ट्रांसलेशन के बारे में कोई भी राय बनाने से पहले मैंने ट्रांसलेशन के समय पर नजर डाली तो पता चला कि किताब को साल 2013 में ही ट्रांसलेट किया गया है। ऐसे में ट्रांसलेशन को कालांतर में शब्‍दों के चलन में आने वाले बदलाव का फायदा नहीं मिल सकता है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि समय के साथ आम बोलचाल की भाषा के शब्दों उलटफेर होता रहता है। ट्रांसलेशन को इन चुनौतियों से होकर गुजरना होता है। लेकिन कथानक में भाव की प्रमुखता अहम है।

जरा किताब में झाकें –  
“सबसे बुरा होना तो अभी बाकि‍ है। हमें लड़के के मां-बाप के साथ भोजन पाना है। जो कुछ हुआ उससे वे बेखबर हैं। और हम दोनों, मुझे और मेरे भाई को नीचे बैठकर जीमना है। और लाश घर में है,  एक संदूक में। और भोजन उसी घर में। ठीक वेसे ही जैसे कि रोप फ़िल्म में था। ऐसा शुरू-शुरू में है, ऐसा सदा के लिए है, और बाकि हर चीज किसी बिडम्बना की भांति। पर हम खाते हैं। मेरा भाई काँप रहा है; वह एक अच्छा अभिनेता नहीं है। जिन लोगों के साथ हम खाना खा रहे हैं, मैं उनके चेहरे नहीं देख सकता, मुझे नहीं पता कि वे कैसे दिखते हैं।”

50 Words Verdict
अगर आप किताब के दिए अंश को देखकर इस अनुवाद को पढ़ने में सहजता महसूस करते हैं तो आप इस किताब को पढ़ सकते हैं. लेकिन यदि आप नॉयपॉल सर की अंग्रेजी की किताब पढ़ सकते हैं तो जरूर अंग्रेजी की किताब को पढ़ें.

Book Review: Pluto by Gulzar – The mastery in brevity


If it bleeds, It is but a wound,
Otherwise every hurt is a poem…

pluto

Pluto is a collection of Short Poems, created out of small little moments and emotions like the planet itself. Gulzar sahib has crafted these little poems in such a serene manner that you end up expecting living more into the immensely beautiful world of these short poems. With each poem, you feel like seeing new short worlds through the poems.

Penned by Gulzar sahib and translated by Nirupama Dutt, the book doesn’t seem unfamiliar to Gulzar lovers. Each poem is translated in such a beautiful manner that you feel as if Gulzar sahib’s grave voice is landing on your ear drums. The certain feel and warmth known to only Gulzar sahib verses echo from the translated poems too. Though, translation misses nuances. But it’s treat to poetry lovers who lacks knowledge of Urdu. For example, there is a poem:

If I had not left her she would have left me,
Union and parting are unavoidable in love,
but there is also the magnet of the ego,
After all how many nights can one pass with your back towards the person you love.

मैं अगर छोड़ ना देता तो मुझे छोड़ दिया होता उसने,
इश्‍क में लाजमी में हिज्रे-ए-विसाल मगर
,
इक अना भी तो है चुभ जाती है पहलू बदलने में कभी
,
अब रात भर पीठ लगाकर भी तो सोया नहीं जाता
,
मैं अगर छोड़ ना देता तो मुझे छोड़ दिया होता उसने।

In the hindi verse, the word ana and hizre-a-visaal may not be a cup of tea for everyone. Thus, the translated version turns into a treat for people. See this poem:

I Looked at You…

I looked at you like everyone else did
But then it so transpired
On my way back
The memory of your face lit up my eyes.

Shaken by a gust of breeze, a flame fell.
Momentary Darkness – and then
A blaze which turned into a forest fire.

The first sight of love has been so beautifully crafted here. The first line keeps you unattended whereas second line immediately takes you to the sight of magical eyes you love. Third and fourth line shows the happiness that comes up on your face when you think of your lover. Let’s see one more poem:

Why are your hands…

Why are your hands so silent?
Neither do the reach out to m
when you sit at the edge of the bed,
Nor do they call out softly
from across the windowpane.
They don’t rise to rebuke me, either.

Forever still
I see them always, like a flame lit,
Invoking God.

What have the doctors told you?

In this poem, Gulzar sahib has talked about the parting stage of any relationship. When one feel being bereft due to cold relationships. First lines are about the unmoving gestures of loved person. He expects his love to show love, hate or even anger but frustrates because she is still like a flame.

The next thing, I truly like is the design of the book. On the cover, Gulzar Sahib’s name is in top font with italics touch that gives a poetic feel to the cover. The descending of fonts continues with book name ‘Pluto’ then translator’s name in smallest font. When you get inside, you find all the poems placed in the bottom left corner of each page with whole page left blank. It makes them look small. The thing that breaths life in these pages is Gulzar sahib sketches. Each poem is adorned with beautifully drawn sketches like the groom wears the flowery headdress (Sehra) on his wedding day. We have seen such experiment with a recent Hindi book “Ishq main Shahar Hona” by Journalist Ravish Kumar. In that book, sketches have been drawn for short stories like a lyricist writes song to a movie. It helps the reader in developing imagery when it comes to telling short shorts or poems.

50 Words Verdict:

If you love poetry then it is a must have book for you because the way Gulzar Sahib has captured beauty and ugliness of life no one else has done. He talks about first sight of love with same freshness & simplicity as he does to the demise of his lover.

#NetNeutrality: जरा समझें आखिर क्‍यों मचा है बवाल


net-neutralityमोबाइल स्पेसिफिकेशंस से पनीर कोरमा तक और हिटलर से मुसोलिनी इंटरनेट ने हमें अकूत जानकारियों का भंडार दिया है. किताबों के दूर होने से पैदा हुए स्‍पेस को इंटरनेट ने काफी हद तक भरने की कोशि‍श की है. लेकिन अब यह इंटरनेट बदलने जा रहा है. जी हां, भारत में इंटरनेट पूरी तरह से बदलने जा रहा है. अब इंटरनेट फ्री में मिलने जा रहा है. टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां आपको ऐसे ऑफर देने जा रही हैं जिनमें आपको आजादी होगी कि आप कौन सी एप यूज करें और कौन सी एप यूज ना करें…जैसे कि अगर आप सिर्फ वॉट्सएप यूज करते हैं तो आप दस-बीस रुपये का प्लान खरीद कर पूरे महीने मजे से वॉट्सएप यूज करें. आपको क्या जरूरत है कि 3 सौ रुपये का 3जी डाटा पैक यूज करें. मैं यह मानकर चल रहा हुं कि ऊपर लिखे ऑफर आपको बहुत पसंद आ रहे होंगे. रीजनेवल भी लग रहे होंगे. लेकिन भारत में नेट न्यूट्रेलिटी का अंत मुगल साम्राज्य के अंत और ब्रिटिश राज के आरंभ की तरह ही साबित होने वाला है. नेट न्युट्रेलिटी समर्थकों और टेलिकॉम सर्विस ऑपरेटर्स की यह लड़ाई समझने के लिए सबसे जरूरी है कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी की एबीसीडी को समझ लें. वरना आप भी उन करोड़ों लोगों में शामिल हो जाएंगे जो प्लासी युद्ध के दौरान मैदान के बाहर खड़े होकर युद्ध परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे जब उनकी जिंदगी की सबसे जरूरी लड़ाई लड़ी जा रही थी. इससे पहले कि समय निकले, आपको यह जानना चाहिए कि आख‍िर यह लड़ाई क्यों लड़ी जा रही है और आप इस लड़ाई में कहां खड़े हैं.

क्या है नेट न्यूट्रेलिटी
हिंदी में नेट न्यूट्रेलि‍टी का शाब्दि‍क अर्थ है: इंटरनेट पर मौजूद सामग्री की रूप मुक्त, उद्देश्य मुक्त, स्त्रोत मुक्त उपलब्धता. फिलहाल इंटनेट पर आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह बाइट्स में मापा जाता है:
मतलब –
विकीपीडिया के 20 किलोबाइट के पेज का मूल्य = x रुपये

और फेसबुक के x किलोबाइट के पेज का मूल्य भी = x रुपये
यानी कंटेंट कुछ भी हो आपको पैसे बाइट्स के हिसाब से ही देने होंगे. अब जैसे-जैसे आपका यूसेज बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे आपका इंटरनेट खर्चा बढ़ता जाएगा. चाहें अपना 2 गीगा बाइट के डाटा पैक से पोर्न वीडियो देख लें या हिस्ट्री चैनल की डॉक्यूमेंट्री, आपको पैसे 2 गीगा बाइट के हिसाब से ही देने होंगे. यह कुछ-कुछ पंसारी की दुकान से आटा खरीदने जैसा है. जब आप आटा खरीदने जाते हैं तो क्या आपका पंसारी आपसे यह पूछता है कि आपको आटे से रोटी बनानी है या परांठे, रोटी बनानी हो तो ये वाला आटा ले जाओ और परांठे बनाने हों तो ये वाला आटा. नहीं ना! आप तो बस पंसारी को आटे के पैसे किलो के हिसाब से देते हैं ना कि उससे बनने वाले भोजन के हिसाब से.

क्या हैं वर्तमान व्यवस्था के फायदे
अगर आप इस व्यवस्था के फायदे जानना चाहते हैं तो आपको इंटरनेट की लाइफ साइकिल को समझना होगा. इंटरनेट दो लोगों को टेलिफोन के तारों से जोड़ने की व्यवस्था से जोड़ने का नाम है. इस प्रोसेस के तहत दो लोग अपने कंटेंट को आसानी से इंटरनेट के माध्यम से एक दूसरे के साथ शेयर कर सकते हैं. आप अपनी बात को, बिजनेस आइडिया को और व्यापार को दुनियाभर में मुक्त रूप से इंटरनेट यूज कर रहे लोगों तक पहुंचा सकते हैं. वर्तमान व्यवस्था आपको चुनाव का अधि‍कार देती है कि आप इंटरनेट को कैसे, कितना एवं कब यूज करें. इंटरनेट एक ताकत है जिसके माध्यम से आप अपने जीवन को बदल सकते हैं. अपने सपने पूरे कर सकते हैं. यह पूरी दुनिया में समानता का आाखि‍री मोहल्ला है जहां सब तकनीकी आधार पर सामान्य हैं. यहां सिर्फ कंटेंट बिकता है स्त्रोत या ब्रांड नहीं. net-neutrality-what-you-need-know-now-infographicरेगुलेटेड इंटरनेट – एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना

इंटरनेट को रेगुलेट करके दरअसल एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना करने की साजिश की जा रही है जिसमें महंगा पैक खरीदने वाले काफी तेज इंटरनेट यूज कर पाएंगे और कम पैसे खर्च करने वालों को स्लो इंटरनेट यूज करना होगा. देखें इमेज net-neutrality-1-620x400 लेकिन कंपनियों को हो रहा है नुकसान अब आपने एक पक्ष सुन लिया है तो इस महामुकाबले का दूसरा पक्ष भी सुन लें. दरअसल इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स का तर्क है कि जैसे जैसे भारत में स्मार्टफोन यूजर्स बढ़ रहे हैं, इंटरनेट के भार को संभालना मुश्कि‍ल हो रहा है. ऐसे में उनके लिए इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर मैंटेन करना संभव नही है. इसलिए वह इंटरनेट को सेक्शन में बांटना चाहते हैं जिससे डाटा को सही तरीके से डिस्ट्रीब्यूट किया जा सके. लेकिन असल बात यह है कि ओवर द टॉप प्लेयर्स यानी वॉट्सएप, इंस्टाग्राम, वाइबर, स्काइप आदि‍ आदि की इन्नोवेटिव सेवाओं के चलते लोगों ने टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स की कॉल एवं एसएमएस सुविधाओं को यूज करना बंद कर दिया है.

नोकिया फोन पर चुटीली-मजेदार बातों का दौर
अगर किसी को याद हो तो जरा उस दौर में जाएं जब एयरटेल, हच और अन्य जीएसएम कंपनियों ने सिम सर्विसेज के नाम पर ज्योतिष, ट्रेवल और चुटीली बातों की सर्विसेज शुरु की थीं. इन सर्विसेज के दौर में लोगों के पास फ्लोरोसेंट लाइट वाले नोकिया 3315 और 1100 फोन आते थे. ऐसी किसी सर्विस को यूज करते ही लोगों के मेन बैलेंस से 100 से 150 रुपये कट जाया करते थे. शुरुआती फोन यूजर्स के बीच पांच अंकों के एसएमएस नंबर आतंक के रूप में व्याप्त हो गए थे. गलत प्रस्तुतिकरण और ग्राहकों की दोहन मानसिकता से इन सर्विसेज का अंत हो गया. लेकिन इसके बाद स्मार्टफोन एप्स का दौर आया. इन एप्स ने बिना पैसे लिए आपको बेहतर तरीके से जानकारी उपलब्ध कराई. हालांकि एप्स ने अपने भर का खर्चा निकालने के लिए एड्स का सहारा लिया. बेहतर जानकारी उपलब्ध कराकर इन एप्स ने एड के सहारे वह पैसा कमाना शुरु कर दिया जिसे इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां अपना मान रही थीं. यह प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नमक पर कर लगाने जैसा है. कि ब्रिटि‍श राज के समुद्री क्षेत्र रूपी टेलिफोन लाइनों से जो भी रेत रूपी डाटा उपलब्ध हो रहा है उस पर प्रथम अधि‍कार राज का है.

इसके विपरीत अगर आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो प्रति तीन महीनों में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियों के डाटा शुल्क और खपत में बेतरतीब बढ़त देखी गई है. ऐसे में कंपनियों को जो नुकसान एसएमएस और कॉलिंग सर्विसेज के खत्म होने के नुकसान से उठाना पड़ रहा है उससे कहीं ज्यादा वे इंटरनेट प्रोवाइडिंग सर्विस से कमा रही हैं. देखें इमेज. airtel-data-table-q3-fy13-495x284 फर्ज किजिए कि ट्राई ने भारतीय टेलिकॉम ऑपरेटर्स की शर्ते मानकर इंटरनेट को इन कंपनियों के अधीन कर दिया तो इस कंडीशन में आपको हर सर्विस यूज करने के लिए एक नया पैक खरीदना पड़ेगा. इसके अलावा नई एप कंपनियों के लिए आप तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाएगा. नई जानकारियों का आप तक पहुंचना नामुमकिन होगा क्योंकि आप तक वही जानकारी पहुंच पाएगी जो आप तक पहुंचने के लिए आपके टेलिकॉम ऑपरेटर को शुल्क अदा कर पाएंगे और आप वही जानकारी प्राप्त कर पाएंगे जिसके लिए आप पैसे दे पाएंगे. इसलिए आज ही अगर मुक्त इंटरनेट चाहिए हो तो Change.org पर अपनी पेटिशन दाखि‍ल करें और ट्राई को मेल करें कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी के पक्ष में हैं क्योंकि अब नहीं चेते तो अगला मौका बहुत देर में आएगा…

इस विषय पर ज्यादा पढ़ने के लिए कृप्या इस लिंक को खोलें:
http://www.medianama.com
https://docs.google.com/document/d/1DNXgJRKUMk4Tqefzybab7HzsV6EeYmnciPqMQG91EN0/edit

मीडियानामा और अन्य सभी साथि‍यों को इस बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सधन्यवाद. पिक्चर्स गूगल से ली गई हैं एवं बिना किसी छेड़़छाड़ के पब्लिश की गई हैं. किसी को क्रेडिट दिया जाना जरूरी हो तो कृप्या बताएं.

जरा कश्‍मीर के कुछ खाली घरों में झांकें…


Protests-Demonstrations-62कश्‍मीरी पंडितों के दर्द, विछोह और भयाक्रांतता को समझने के लिए आपको कश्‍मीर जाने या कोई किताब पढ़ने की जरूरत नहीं है। सरल मानवीय स्पन्दन और संवेदना इस दर्द के एक अंश को समझा जा सकता है। ऐसे दर्द और अन्‍याय के प्रति दबे हुए गुस्‍से के अहसास सालों बीतने के बाद भी ऐसे जीवंत रहते हैँ जैसे सुई या कांटा चुभने से होने वाला दर्द। आप कितने भी बड़े हो जाएं सुई चुभने पर होने वाली शारीरिक अनुभति को चाहकर भी नहीं बदल पाएंगे। इस प्राकृत सचेतना की तरह ही पैतृक जमीं से बिछुड़ने के दर्द को भी कितनी ही सफलताओं से कम नहीं किया जा सकता। जब भी कोई आपको सुई के दर्द से बचाने की राजनीति करता दिखाई पड़ता है तो आप मन ही मन तिलमिला उठते हैं। सुई चुभोए जाने वाले सभी पुराने संस्मरण आँखों के सामने फ़िल्म की मानिंद तैर उठते हैं। उस वक़्त आप मन ही मन कह उठते हैं की अब बस भी करें।

जहाँ घर हमारा था वो जमीं धस गई।
लंबे देवदार के पेड़ अब सब फर्नीचर चौखट हो गए,
वो घर के पास वाली झील अब पहले सी नहीं रही,
जहां घर हमारा था वो जमीं धस गई।

अगर आप अब भी इस दर्द को महसूस ना कर पाए हों तो स्वयं को इस कहानी का पात्र बना कर देखिए। फ़र्ज़ कीजिये की आप एक एमएनसी में काम करते हैं और इस नौकरी को आपने अथक मेहनत के बाद हासिल की है। इससे जुड़े पदलाभ आपकी ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए अत्यंत जरूरी हों। फिर एक दिन आपको पता चलता है की आपकी कंपनी में आपके देश के लोग धीरे धीरे कहीं और नौकरी खोज रहे हैं। लेकिन आप पहले की तरह सब सामान्य मानकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने men लगे रहते हैं। फिर एक दिन आप रोज की तरह दफ्तर पहुंचते हैं और आपको सुनने को मिलता है कि कुछ लोग पीठ पीछे आपको नौकरी से निकालने की साजिश रच रहे हैं। ऐसी खबरों को अफवाह मानकर आप अपना काम फिर शुरु कर देते हैं, लेकिन पाते हैं कि कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो हो रहा है जो डरावना है। इन डरों के बावजूद आप नौकरी बचाए रखने के लिए साथियों से पहले की तरह व्‍यवहार करते रहते हैं। दोस्तों पे भरोसा करते हैं की दुसरे मुल्क के सही लेकिन हैं तो ये आपके दोस्त ही।  कुछ दिनों बाद आप पाते हैं कि ऑफिस की महिलाकर्मियों ने आपसे बात करना बंद कर दिया है। और ऑफिस लन्च के दौरान बातचीत की भाषा अंग्रेजी की जगह विदेशी हो गयी है। अनौपचारिक संवाद अनजानी भाषा में होने लगे।  इसके बाद भी आप सभी से ऐसे बात करने की कोशिश करें कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

कुछ दिन बाद आपके कुछ दोस्‍त आपके प्रति चिंता जताते हुए दूसरी नौकरी ढूढ़ने का सुझाव देने लगें। और फिर एक दिन आपके साथ लंच शेयर करने वाले, सिगरेट के कश लगाने वाले, लिफ्ट लेने-देने वाले दोस्‍त आपको कॉलर से उठा कर अनर्गल आरोपों और लात घूंसों से सुशोभित करते हुए ऑफिस से बाहर कर दें।

अगले दिन चोटों को बैंडेज के पीछे और शर्म को पलकों के नीचे छुपाकर आप ऑफिस आ जाते हैं। लेकिन आपको पता चलता है कि ऑफिस के बाद आपको जान से मारने की साजिश की जा रही है। इसके बाद शाम को आपका सबसे जिगरी यार ऑफिस छूटने पर कुछ अंजान लोगों के साथ आपको जान से मारने की धमकी देता है। धमकी को असली प्रभाव देने के लिए आपको कुछ घाव भी देकर जाए। इसके बाद आप उसी रात अपनी बची हुई सेलेरी और ऑफिस ड्रॉअर में बीबी-बच्‍चों की तस्‍वीरें छोड़कर जान बचाने के लिए उस शहर से बहुत दूर भाग जाते हैं।

Kashmiri government employees scuffle with police during a prote
यह बात सोचने में थोड़ी डरावनी लग सकती है लेकिन अगर आपने इस दुखदाई कल्‍पना में खुद के असम्‍मान और डर के भाव को महसूस किया है तो आपको उन दो से तीन लाख कश्‍मीरियों के दर्द को समझने में मदद मिल सकती है जो सर्द रातों में जान बचाने के लिए अंतिम सांस तक भागे थे।

इस दर्द को महसूस करने के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य की उन पार्टियों के बयानों पर नजर डालिए जो कहते हैं कि अगर कश्‍मीरी पंडितों को घाटी में वापस आना है तो जैसे बुला रहे हैं वैसे ही आना होगा। 1989 से पहले की तरह कश्‍मीरी मुस्लिमों के साथ मिल-जुलकर रहना होगा। ये ऐसा होगा कि आपसे कहा जाए कि जाइए उसी दोस्‍त के जूनियर बनकर काम करिए जो आपको लात मारकर बॉस बना हो।

हद तो तब होती है जब आपको बिना पूर्व सूचना के कम्पनी छोड़ने के लिए माफ़ी मांगने को कहा जाये।

Book Review: Banaras Talkies By Satya Vyas


banaras-talkiesकॉलेज लाइफ को जिंदगी का गोल्डन फेज कहा जाता है। कहने वाले ने हॉस्टल लाइफ पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अगर की होती तो शायद इसकी तुलना डायमंड या उससे भी ज्यादा बहुमूल्य चीज से की जाती। हॉस्टल की जिंदगी से भी ज्यादा रोचक होती हैं इसकी कहानियां, जिनको सुनाने वाले अपनी आपबीती बयां करते-करते पुरानी यादों में ऐसे खो जाते हैं जैसे कोई शहर के सबसे एलीट रेस्‍टोरेंट में अपनी गर्लफ्रेंड को प्रपोज करने के बाद हॉस्टल का रास्ता भूल जाता है। कुछ ऐसी होती हैं हॉस्‍टल की कहानियां।

इसलिए अक्‍सर लोगों को कॉलेज और कोर्स से ज्‍यादा हॉस्‍टल के लिए परेशान होते देखा जाता है। कई बार लोग हॉस्‍टल के लिए सब्‍जेक्‍ट से भी कंप्रोमाइज कर जाते हैं। लेकिन कमबख्त हॉस्टल में भी ना एकॉमोडेशन सीमित होता है। कई नए-नए हॉस्टलर्स की तो सरकार से अपेक्षा रहती है कि हॉस्टल को यूनिवर्सिटी परिसर से भी बड़ा बनाया जाए। और हां फ्री वाईफाई और अच्छे खाने की डिमांड मौ‍लिक अधि‍कारों की तरह की जाती है। धीरे-धीरे हॉस्टलर्स अपनी नई जिंदगी और दोस्तों में मशगूल हो जाते हैं। फिर खाने और वाई-फाई का भी ध्यान नहीं रह जाता।

लेकिन हॉस्टल लाइफ सबके हिस्से में नहीं आती जैसे स्‍कॉलरशिप नहीं आती। कुछ स्टूडेंट्स को अच्छी रैंक मिलने के बावजूद हॉस्टल नहीं मिल पाता तो वहीं कुछ के लिए यह दूर की कौड़ी की तरह होती है। चार सेमेस्‍टरों की फीस के साथ हॉस्टल की एकमुश्त फीस कई बार घरवालों के बस से बाहर हो जाती है। अब हर महीने रूम रेंट की तरह लिया जाए तो कुछ बच्चे मैनेज भी कर लें। लेकिन एकमुश्त इंस्‍टॉलमेंट बात बिगड़ जाती है। सामान्य आर्थि‍क हालातों वाले घरों में हॉस्टल वाली पढ़ाई की मांग करना ऐसे होता है जैसे लव मैरिज की मांग करना। घर वालों से लेकर रिश्‍तेदार तक बच्चों को हॉस्टल के चक्कर में ना पड़़ने के लिए ठीक उसी तरह समझाते हैं जैसे लड़के ने दूसरी कास्ट की लड़की से शादी करने की जिद पकड़ ली हो। हॉस्टल ना जाने के विरोध में जारी दलीलों के बीच कॉलेज कैंपस ऐसे दिखाई पड़ता है जैसे लव मैरिज करने को तैयार लड़के को कुछ ऐसे ही इमोशनल अत्याचार के दौरान अपनी लवर दिखाई पड़ती है। कानों में सबकी दलीलें सुनाई पड़ती हैं लेकिन आंखों को सिर्फ वही नजर आ रही होती है। हां धीरे-धीरे जैसे-जैसे ब्रेनवॉश होने लगता है तो लवर की आंखो की तरह कॉलेज कैंपस भी धुंधला होता जाता है।

hostelब्रेनवॉश मिशन के शि‍कार लड़के अचानक से यूजीसी से लेकर सिक्कि‍म मनीपाल तक हर डिस्टेंस लर्निंग कोर्स की तरफदारी करना शुरु कर देते हैं। लेकिन दोस्तों का क्या किया जाए वो तो हॉस्टल जाएंगे ही। और जब जाएंगे तो हॉस्टल की कहानियां भी साथ लेकर आएंगे। अब ना तो दोस्तों से किनारा किया जा सकता है ना वो दिल को छूने वाली कहानियों से। अगर आप भी ऐसी ही कहानियों को सुनकर मन ही मन कह उठते हैं काश साला, हम भी हॉस्टल वाली पढाई करते तो जिदंगी कुछ और ही होती। कुछ कहानियां और अच्छी यादें हमारे पास भी होती तो आप सत्यव्यास की किताब बनारस टॉकीज को हॉस्टल की मानिद मिस ना करें।

यह कहानी है बनारस हिंदु यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल भगवानदास में रहने वाले तीन दोस्तों सूरज उर्फ बाबा, अनुराग डे उर्फ दादा और जयबर्धन शर्मा के हॉस्टल में बिताए उन खास दिनों की जब वह रॉलिंग स्टोन से माउंटेन बन गए।

अच्छा दादा, एक बात बताओ तुम कभी किसी लड़की को प्रपोज किए हो?” मैने दादा के हाथ से चाय लेते हुए कहा।

“B।Com में एगो को बोले थे, I Love You” दादा ने कहा।

“फिर?”, मैने पूछा।

“फिर लड़की बोली OK। साला! हमको आज तक समझ नहीं आया कि I Love You का जवाब OK कैसे हुआ। यस नो, कुत्ता, कमीना, जानू, पागल कुछ भी बोलती; आइने में शक्ल या पांव का चप्पल दिखाती; लेकिन OK का क्या मतलब?” दादा ने चाय पीते हुए कहा।

“अबे हंसाओ मत, मर जाएंगे।“ चाय मेरे नाक तक चली गई थी।

“हां। हंस लो साले। अभी तुम्हारा फंसा है ना। अब हम हंसेंगे। पूरा भगवानदास हंसेगा।“ दादा ने चास का कुल्हड़ फेंकते हुए कहा।“

यह किस्सा बीएचयू के भगवानदास हॉस्टल लाइफ में दिन रात चलने वाले इश्क, रोमांच और जीवन बदलने वाले अनुभव की एक बानगी भर है। बनारस टॉकीज आपको ऐसे-ऐसे मोड़़ों से लेकर गुजरेगी जहां पर आप कभी खुद को खुल कर हंसने से रोक नहीं पाएंगे तो कहीं पर बाबा और दादा के तनाव का हिस्सा बनते नजर आएंगे। कहीं सुना था कि किताबें भी ट्रेन की तरह होती हैं जो आपको आपकी मंजिल के बींच आने वाले हर मोड़ से रुबरू कराते हुए आगे बढ़ती हैं। बनारस टॉकीज भी एक जीवंत ट्रेन की तरह है जो आपको हंसाती है रुलाती है और कभी-कभी आंखे नम भी कर देती है। तो पढ़ें क्‍यों‍कि पढ़ना जरूरी है।।।

अंत में अश्वि‍नी भाई को अनन्‍य धन्‍यवाद क्‍योंकि उन्‍होंने ही मुझे भगवानदास हॉस्‍टल की यात्रा करने की सलाह दी।

दुधवा नेशनल पार्क: खुद को खोकर पाने की यात्रा


DUDHWAवो गुरुवार का दिन था जब सुबह-सुबह संडे गार्जियन में छपे एक एंटरव्यू को पढते-पढ़़ते सोचा कि चलो ना कहीं घूम कर आया जाया। संडे गार्जियन की टीम ने एक एडवेंचर लवर और सोलो बाइक राइडर का इंटरव्यू लिया था. यह बंदा अपनी बाइक पर पूरे इंडिया का चक्कर लगा रहा था और साथ ही साथ अपनी इस यात्रा के अनुभवों को अपने ब्लॉग क्लूलैस राइडर पर पब्लिश करता जा रहा था. इस बंदे ने अपनी ट्रिप को रोमेंटिसाइज किए बिना जितनी इमानदारी से अपनी ट्रिप के बारे में बताया तो इंटरव्यू पढ़ते-पढ़़ते ही सोच लिया कि काश मैं भी ऐसी किसी ट्रिप पर जा पाऊं जहां जाने से पहले वहां जाने में कोई मकसद ना छूपा हो. इसके साथ ही सोचा कि अगर अब‍की बार किसी ट्रिप पर गया तो खुद को खोकर पाने की कोशि‍श करूंगा. जैसे किसी अंजान रोड पर चलते जाना और उस रोड पर बने घरों और किनारे बने पार्को की जालियों को पहली बार देखने का अनुभव प्राप्त करना. पिछली बार जब जिमकॉर्बेट पार्क घूमने गया था तो पूरा टाइम फेसबुक के लिए पिक्चर्स खींचने और सेल्फी खींचने में ही चला गया था. नदी के बलुआ पत्थरों पर ठीक से बैठना तो दूर एक बार ढंग से छू भी नहीं पाया था. इसलिए इस बार पहले से ही सोच लिया था कि कुछ भी हो जाए इस ट्रिप पर फेसबुक को हाथ नहीं लगाऊंगा. यह सोचते-सोचते मैने अपने ऑफिस के दोस्तों वाले वॉट्सअप ग्रुप पर अपने ‘काश’ वाले ट्रिप आइडिया को शेयर कर दिया. मैने अंग्रेजी में पूछा ‘हाऊ अबाउट अ बाइक ट्रिप टू समवेअर विफोर राहुल भाई मैरिज, इट विल बी अ वेरी लिबरेटिंग जर्नी’. वहां से राहुल भाई का ही जवाब आया ‘वेरी नाइस, हम कर सकते हैं.’ इस मैसेज को सेंड करते टाइम मैंने सोचा भी नहीं था कि ग्रुप के सभी लोग ऐसी किसी ट्रिप का कितनी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. लेकिन मैसेज में लिबरेटिंग जर्नी वाली बात मैने अपने लिए ही लिखी थी. पिछले कई महीनों से कहीं घूम कर आने के बारे में सोच रहा था जहां मैं मैं ना रहुं और उस जगह का एक हिस्सा हो जाऊं. लेकिन अखबार की नौकरी में छुटि्टयों मांगना जैसे अपराध माना जाता है वो भी तब जब आप डेस्क पर काम कर रहे हों. इसलिए क्लूलैस राइडर जैसी किसी ट्रिप पर जाने की सोच को भी कई महीनों तक सोच के कमरे में ही बंद रहना पड़ता है. लेकिन मुंआ ये गूगल भी बिहेबियर टारगेटेड एडवरटाइजिंग से मेरी कंप्यूटर स्क्रीन पर पिछले कई दिनों से टूरिज्म वेबसाइट्स के एड ऐसे रन कर रहा था जैसे कोई आइसक्रीम वाला किसी ‘बच्चों वाले घर’ के सामने से गुजरते हुए जोर से अपनी घंटी बजाता है जिससे घर के अंदर के बच्चे आइसक्रीम वाले की घंटी की आवाज सुनकर बाहर आ जाएं और उसकी आइसक्रीम खरीद लें. कंप्यूटर स्क्रीन पर बरबस शुरू हो जाने वाले इन विज्ञापनों को देखकर घूमने जाने को आतुर मन ऐसे छटपटाता है जैसे किसी सात साल की बच्ची को कमरे में बंद कर दिया जाए हो और वह दरवाजे की सांस से आईसक्रीम बेचने वाले को निराश आंखों से देख रही हो. इसलिए ऐसेी किसी जगह पर जाने के बारे में सोचना ही काफी लिब्रेटिंग थॉट था.

वॉट्सअप ग्रुप पर ट्रिप के बारे में बोलकर मैं ग्रुप से लगभग गायब हो गया था क्योंकि राहुल भाई और अरुन भाई ने शुरूआती दौर में ही हामी भर दी थी. लेकिन मुझे फिर भी लग रहा था कि हो ना हो यह ट्रिप पॉसिबल नहीं है क्योंकि राहुल भाई की शादी को सिर्फ दस दिन ही बचे थे. ऐसे में उनके लिए ऐसी किसी ट्रिप पर जाना संभव नहीं लग रहा था. लेकिन वॉट्सएप पर ट्रिप के बारे में बातचीत शुरू हो चुकी थी. लेकिन मैंने किसी भी कनर्वेजेशन में पार्टिसिपेट नहीं किया क्योंकि मैं मन बनाकर तोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए मैं आखि‍र तक कहता रहा कि मैं नही चल पाऊंगा क्योंकि मुझे एग्जाम देने जाना है, पैसे नहीं है आदि आदि. परंतु जब मैने देखा कि अरुण और राहुल भाई लोग ट्रिप को लेकर सीरियस हैं तो मैने भी हां कह दी. हालांकि मन में डर था कि कहीं यह ट्रिप भी पिछली कई ट्रिप्स की तरह फेसबुक और इंस्टाग्राम की शि‍कार ना हो जाएं. लेकिन मैंने रिस्क लिया और तय किया कि जो भी हो जाए पर इस ट्रिप पर खुद से इस वर्चुअल दुनिया का शि‍कार नहीं बनूंगा. मन ही मन डर तो लग रहा था कि कहीं छुट्टियां खराब ना हो जाएं लेकिन रिस्क लेने का भी अपना मजा होता था. इसलिए पूरे दिल से रिस्क लेने को तैयार को हो गया. फिर वो दिन भी आ गया जब हमें सुबह-सुबह दुधवा नेशनल पार्क के लिए निकलना था. दुधवा जाने के लिए हमने 26 जनवरी की छुट्टियों पर निकलने का प्रोग्राम बनाया था. हमने ट्रिप के लिए बैट बॉल और पतंगबाजी जैसे इंतजाम भी किए थे. इन इंतजामों के साथ हम सब निकल पड़े.

जानना चाहेंगे इस खास ट्रिप पर आगे क्या हुआ तो थोड़ा इंतजार करिए. वैसे बता दुं कि ट्रिप के शुरू होते ही हैंगओवर मूवी टाइप एक किस्सा हुआ था. अब अगले अंक में.

Thanks housing.com for giving me the opportunity to tell about about a journey which renewed my understanding of life and its virtues. I got the power of hope and positivity and calmness.

Author Interview: Shreya Prabhu answers tough questions on Urban Relationships


shreya-prabhu-jindalIn metro cities, life runs faster than metro trains. People infused with multipronged ambitions work day and night to make things work. In all this, relationships face the worst part of such rollercoaster lifestyle. People begin hating people whom they loved months ago. Our author Shreya Prabhu Jindal has encompassed urban relationships with its all kookiness in her Book Simply Complicated. In this interview, she has answered tough questions relating to urban relations.


Anant: How do you come to write about the complicated relationships of young professionals living in metro cities?

Shreya: I write what I know, what I see and observe around me. I have always lived in big metro cities and my friends are young professionals- as am I. So it made sense to write about the complications that exist for that age group.

Anant: There are similarities in you and your characters like the alma mater and professions. Did you see these characters as real people in your life?

Shreya: Yes, many of them are based on people I know and come from a similar background to myself and my friends. The professions are very typical ones for young working people, and so are the kind of problems they are faced with. But beyond that, they are all fictional characters.

Anant: Do you really think two couples can live happily despite the bitterness and regular fights?

Shreya: I think it depends on the couple. How much are they willing to try and make it work? I think that if the couple is happy on more days than they are fighting, it’s worth it. It depends on the kind of people they are.

Anant: Do you think it will be easy for a girl to behave with someone as a friend for whom she had got real feelings? Can such feelings be curbed for the sake of anything even friendship?

Shreya: This happens all the time, everyday. Everyone has crushes which aren’t returned, and people struggle to get over their exes and remain friends with them. Behaving normally with an old friend, even if you have developed feelings for them, isn’t that hard!

Anant: Which character was closest to you and why? I believe she was Astha!

Shreya: Yes, Aastha, because I am always playing the role of the single friend who’s giving relationship advice to others. But that’s where the similarity ends. She can be very judgmental and irritating- something which I hope I’m not.

Anant: Did you intentionally give Rahul’s character a gray shade to make him relatable and real?

Shreya: Rahul was initially supposed to be a complete “douchebag” with no redeeming qualities, but when I started writing from his perspective I had to change my portrayal of him. He is as human as any of the other characters. They all have their flaws and problems- none of them are perfect.

Anant: What have you just finished reading and what are you reading now days?

Shreya: I am reading fanfiction based on Harry Potter and the popular TV show, Sherlock. I don’t have too much time for reading, so I end up reading fanfiction in my spare time, since I prefer that.

Anant: Please tell what qualities of a book makes you read and reread with one example please?

Shreya: A good book should have strong characters, memorable dialogues, and a conflict or crisis that the characters have to work to fix. This is a formula which works for every genre- from The Fault in Our Stars to Harry Potter!

Anant: Please share this book’s journey from an idea to a paperback. Hope it will help young writers.

Shreya: It takes a lot of work to write a book. Getting the ideas in place is the easiest part. After that you have to force yourself to keep writing at least 300-400 words on days when you might be feeling very tired or uninspired. You can only succeed as a writer if you’re able to keep writing regularly.

Anant: Please share how was this interview round? You can pinpoint which question is good and which is boring.

Shreya: The advice to young authors and the questions on what inspired me and the journey of writing the book were great, but you shouldn’t be too specific about characters and situations in the books which people reading the book might not have read. Otherwise, it was a good interview.

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