#NetNeutrality: जरा समझें आखिर क्‍यों मचा है बवाल


net-neutralityमोबाइल स्पेसिफिकेशंस से पनीर कोरमा तक और हिटलर से मुसोलिनी इंटरनेट ने हमें अकूत जानकारियों का भंडार दिया है. किताबों के दूर होने से पैदा हुए स्‍पेस को इंटरनेट ने काफी हद तक भरने की कोशि‍श की है. लेकिन अब यह इंटरनेट बदलने जा रहा है. जी हां, भारत में इंटरनेट पूरी तरह से बदलने जा रहा है. अब इंटरनेट फ्री में मिलने जा रहा है. टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां आपको ऐसे ऑफर देने जा रही हैं जिनमें आपको आजादी होगी कि आप कौन सी एप यूज करें और कौन सी एप यूज ना करें…जैसे कि अगर आप सिर्फ वॉट्सएप यूज करते हैं तो आप दस-बीस रुपये का प्लान खरीद कर पूरे महीने मजे से वॉट्सएप यूज करें. आपको क्या जरूरत है कि 3 सौ रुपये का 3जी डाटा पैक यूज करें. मैं यह मानकर चल रहा हुं कि ऊपर लिखे ऑफर आपको बहुत पसंद आ रहे होंगे. रीजनेवल भी लग रहे होंगे. लेकिन भारत में नेट न्यूट्रेलिटी का अंत मुगल साम्राज्य के अंत और ब्रिटिश राज के आरंभ की तरह ही साबित होने वाला है. नेट न्युट्रेलिटी समर्थकों और टेलिकॉम सर्विस ऑपरेटर्स की यह लड़ाई समझने के लिए सबसे जरूरी है कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी की एबीसीडी को समझ लें. वरना आप भी उन करोड़ों लोगों में शामिल हो जाएंगे जो प्लासी युद्ध के दौरान मैदान के बाहर खड़े होकर युद्ध परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे जब उनकी जिंदगी की सबसे जरूरी लड़ाई लड़ी जा रही थी. इससे पहले कि समय निकले, आपको यह जानना चाहिए कि आख‍िर यह लड़ाई क्यों लड़ी जा रही है और आप इस लड़ाई में कहां खड़े हैं.

क्या है नेट न्यूट्रेलिटी
हिंदी में नेट न्यूट्रेलि‍टी का शाब्दि‍क अर्थ है: इंटरनेट पर मौजूद सामग्री की रूप मुक्त, उद्देश्य मुक्त, स्त्रोत मुक्त उपलब्धता. फिलहाल इंटनेट पर आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह बाइट्स में मापा जाता है:
मतलब –
विकीपीडिया के 20 किलोबाइट के पेज का मूल्य = x रुपये

और फेसबुक के x किलोबाइट के पेज का मूल्य भी = x रुपये
यानी कंटेंट कुछ भी हो आपको पैसे बाइट्स के हिसाब से ही देने होंगे. अब जैसे-जैसे आपका यूसेज बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे आपका इंटरनेट खर्चा बढ़ता जाएगा. चाहें अपना 2 गीगा बाइट के डाटा पैक से पोर्न वीडियो देख लें या हिस्ट्री चैनल की डॉक्यूमेंट्री, आपको पैसे 2 गीगा बाइट के हिसाब से ही देने होंगे. यह कुछ-कुछ पंसारी की दुकान से आटा खरीदने जैसा है. जब आप आटा खरीदने जाते हैं तो क्या आपका पंसारी आपसे यह पूछता है कि आपको आटे से रोटी बनानी है या परांठे, रोटी बनानी हो तो ये वाला आटा ले जाओ और परांठे बनाने हों तो ये वाला आटा. नहीं ना! आप तो बस पंसारी को आटे के पैसे किलो के हिसाब से देते हैं ना कि उससे बनने वाले भोजन के हिसाब से.

क्या हैं वर्तमान व्यवस्था के फायदे
अगर आप इस व्यवस्था के फायदे जानना चाहते हैं तो आपको इंटरनेट की लाइफ साइकिल को समझना होगा. इंटरनेट दो लोगों को टेलिफोन के तारों से जोड़ने की व्यवस्था से जोड़ने का नाम है. इस प्रोसेस के तहत दो लोग अपने कंटेंट को आसानी से इंटरनेट के माध्यम से एक दूसरे के साथ शेयर कर सकते हैं. आप अपनी बात को, बिजनेस आइडिया को और व्यापार को दुनियाभर में मुक्त रूप से इंटरनेट यूज कर रहे लोगों तक पहुंचा सकते हैं. वर्तमान व्यवस्था आपको चुनाव का अधि‍कार देती है कि आप इंटरनेट को कैसे, कितना एवं कब यूज करें. इंटरनेट एक ताकत है जिसके माध्यम से आप अपने जीवन को बदल सकते हैं. अपने सपने पूरे कर सकते हैं. यह पूरी दुनिया में समानता का आाखि‍री मोहल्ला है जहां सब तकनीकी आधार पर सामान्य हैं. यहां सिर्फ कंटेंट बिकता है स्त्रोत या ब्रांड नहीं. net-neutrality-what-you-need-know-now-infographicरेगुलेटेड इंटरनेट – एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना

इंटरनेट को रेगुलेट करके दरअसल एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना करने की साजिश की जा रही है जिसमें महंगा पैक खरीदने वाले काफी तेज इंटरनेट यूज कर पाएंगे और कम पैसे खर्च करने वालों को स्लो इंटरनेट यूज करना होगा. देखें इमेज net-neutrality-1-620x400 लेकिन कंपनियों को हो रहा है नुकसान अब आपने एक पक्ष सुन लिया है तो इस महामुकाबले का दूसरा पक्ष भी सुन लें. दरअसल इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स का तर्क है कि जैसे जैसे भारत में स्मार्टफोन यूजर्स बढ़ रहे हैं, इंटरनेट के भार को संभालना मुश्कि‍ल हो रहा है. ऐसे में उनके लिए इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर मैंटेन करना संभव नही है. इसलिए वह इंटरनेट को सेक्शन में बांटना चाहते हैं जिससे डाटा को सही तरीके से डिस्ट्रीब्यूट किया जा सके. लेकिन असल बात यह है कि ओवर द टॉप प्लेयर्स यानी वॉट्सएप, इंस्टाग्राम, वाइबर, स्काइप आदि‍ आदि की इन्नोवेटिव सेवाओं के चलते लोगों ने टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स की कॉल एवं एसएमएस सुविधाओं को यूज करना बंद कर दिया है.

नोकिया फोन पर चुटीली-मजेदार बातों का दौर
अगर किसी को याद हो तो जरा उस दौर में जाएं जब एयरटेल, हच और अन्य जीएसएम कंपनियों ने सिम सर्विसेज के नाम पर ज्योतिष, ट्रेवल और चुटीली बातों की सर्विसेज शुरु की थीं. इन सर्विसेज के दौर में लोगों के पास फ्लोरोसेंट लाइट वाले नोकिया 3315 और 1100 फोन आते थे. ऐसी किसी सर्विस को यूज करते ही लोगों के मेन बैलेंस से 100 से 150 रुपये कट जाया करते थे. शुरुआती फोन यूजर्स के बीच पांच अंकों के एसएमएस नंबर आतंक के रूप में व्याप्त हो गए थे. गलत प्रस्तुतिकरण और ग्राहकों की दोहन मानसिकता से इन सर्विसेज का अंत हो गया. लेकिन इसके बाद स्मार्टफोन एप्स का दौर आया. इन एप्स ने बिना पैसे लिए आपको बेहतर तरीके से जानकारी उपलब्ध कराई. हालांकि एप्स ने अपने भर का खर्चा निकालने के लिए एड्स का सहारा लिया. बेहतर जानकारी उपलब्ध कराकर इन एप्स ने एड के सहारे वह पैसा कमाना शुरु कर दिया जिसे इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां अपना मान रही थीं. यह प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नमक पर कर लगाने जैसा है. कि ब्रिटि‍श राज के समुद्री क्षेत्र रूपी टेलिफोन लाइनों से जो भी रेत रूपी डाटा उपलब्ध हो रहा है उस पर प्रथम अधि‍कार राज का है.

इसके विपरीत अगर आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो प्रति तीन महीनों में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियों के डाटा शुल्क और खपत में बेतरतीब बढ़त देखी गई है. ऐसे में कंपनियों को जो नुकसान एसएमएस और कॉलिंग सर्विसेज के खत्म होने के नुकसान से उठाना पड़ रहा है उससे कहीं ज्यादा वे इंटरनेट प्रोवाइडिंग सर्विस से कमा रही हैं. देखें इमेज. airtel-data-table-q3-fy13-495x284 फर्ज किजिए कि ट्राई ने भारतीय टेलिकॉम ऑपरेटर्स की शर्ते मानकर इंटरनेट को इन कंपनियों के अधीन कर दिया तो इस कंडीशन में आपको हर सर्विस यूज करने के लिए एक नया पैक खरीदना पड़ेगा. इसके अलावा नई एप कंपनियों के लिए आप तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाएगा. नई जानकारियों का आप तक पहुंचना नामुमकिन होगा क्योंकि आप तक वही जानकारी पहुंच पाएगी जो आप तक पहुंचने के लिए आपके टेलिकॉम ऑपरेटर को शुल्क अदा कर पाएंगे और आप वही जानकारी प्राप्त कर पाएंगे जिसके लिए आप पैसे दे पाएंगे. इसलिए आज ही अगर मुक्त इंटरनेट चाहिए हो तो Change.org पर अपनी पेटिशन दाखि‍ल करें और ट्राई को मेल करें कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी के पक्ष में हैं क्योंकि अब नहीं चेते तो अगला मौका बहुत देर में आएगा…

इस विषय पर ज्यादा पढ़ने के लिए कृप्या इस लिंक को खोलें:
http://www.medianama.com
https://docs.google.com/document/d/1DNXgJRKUMk4Tqefzybab7HzsV6EeYmnciPqMQG91EN0/edit

मीडियानामा और अन्य सभी साथि‍यों को इस बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सधन्यवाद. पिक्चर्स गूगल से ली गई हैं एवं बिना किसी छेड़़छाड़ के पब्लिश की गई हैं. किसी को क्रेडिट दिया जाना जरूरी हो तो कृप्या बताएं.

Tagged , , , , , , , , , , , , , ,

जरा कश्‍मीर के कुछ खाली घरों में झांकें…


Protests-Demonstrations-62कश्‍मीरी पंडितों के दर्द, विछोह और भयाक्रांतता को समझने के लिए आपको कश्‍मीर जाने या कोई किताब पढ़ने की जरूरत नहीं है। सरल मानवीय स्पन्दन और संवेदना इस दर्द के एक अंश को समझा जा सकता है। ऐसे दर्द और अन्‍याय के प्रति दबे हुए गुस्‍से के अहसास सालों बीतने के बाद भी ऐसे जीवंत रहते हैँ जैसे सुई या कांटा चुभने से होने वाला दर्द। आप कितने भी बड़े हो जाएं सुई चुभने पर होने वाली शारीरिक अनुभति को चाहकर भी नहीं बदल पाएंगे। इस प्राकृत सचेतना की तरह ही पैतृक जमीं से बिछुड़ने के दर्द को भी कितनी ही सफलताओं से कम नहीं किया जा सकता। जब भी कोई आपको सुई के दर्द से बचाने की राजनीति करता दिखाई पड़ता है तो आप मन ही मन तिलमिला उठते हैं। सुई चुभोए जाने वाले सभी पुराने संस्मरण आँखों के सामने फ़िल्म की मानिंद तैर उठते हैं। उस वक़्त आप मन ही मन कह उठते हैं की अब बस भी करें।

जहाँ घर हमारा था वो जमीं धस गई।
लंबे देवदार के पेड़ अब सब फर्नीचर चौखट हो गए,
वो घर के पास वाली झील अब पहले सी नहीं रही,
जहां घर हमारा था वो जमीं धस गई।

अगर आप अब भी इस दर्द को महसूस ना कर पाए हों तो स्वयं को इस कहानी का पात्र बना कर देखिए। फ़र्ज़ कीजिये की आप एक एमएनसी में काम करते हैं और इस नौकरी को आपने अथक मेहनत के बाद हासिल की है। इससे जुड़े पदलाभ आपकी ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए अत्यंत जरूरी हों। फिर एक दिन आपको पता चलता है की आपकी कंपनी में आपके देश के लोग धीरे धीरे कहीं और नौकरी खोज रहे हैं। लेकिन आप पहले की तरह सब सामान्य मानकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने men लगे रहते हैं। फिर एक दिन आप रोज की तरह दफ्तर पहुंचते हैं और आपको सुनने को मिलता है कि कुछ लोग पीठ पीछे आपको नौकरी से निकालने की साजिश रच रहे हैं। ऐसी खबरों को अफवाह मानकर आप अपना काम फिर शुरु कर देते हैं, लेकिन पाते हैं कि कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो हो रहा है जो डरावना है। इन डरों के बावजूद आप नौकरी बचाए रखने के लिए साथियों से पहले की तरह व्‍यवहार करते रहते हैं। दोस्तों पे भरोसा करते हैं की दुसरे मुल्क के सही लेकिन हैं तो ये आपके दोस्त ही।  कुछ दिनों बाद आप पाते हैं कि ऑफिस की महिलाकर्मियों ने आपसे बात करना बंद कर दिया है। और ऑफिस लन्च के दौरान बातचीत की भाषा अंग्रेजी की जगह विदेशी हो गयी है। अनौपचारिक संवाद अनजानी भाषा में होने लगे।  इसके बाद भी आप सभी से ऐसे बात करने की कोशिश करें कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

कुछ दिन बाद आपके कुछ दोस्‍त आपके प्रति चिंता जताते हुए दूसरी नौकरी ढूढ़ने का सुझाव देने लगें। और फिर एक दिन आपके साथ लंच शेयर करने वाले, सिगरेट के कश लगाने वाले, लिफ्ट लेने-देने वाले दोस्‍त आपको कॉलर से उठा कर अनर्गल आरोपों और लात घूंसों से सुशोभित करते हुए ऑफिस से बाहर कर दें।

अगले दिन चोटों को बैंडेज के पीछे और शर्म को पलकों के नीचे छुपाकर आप ऑफिस आ जाते हैं। लेकिन आपको पता चलता है कि ऑफिस के बाद आपको जान से मारने की साजिश की जा रही है। इसके बाद शाम को आपका सबसे जिगरी यार ऑफिस छूटने पर कुछ अंजान लोगों के साथ आपको जान से मारने की धमकी देता है। धमकी को असली प्रभाव देने के लिए आपको कुछ घाव भी देकर जाए। इसके बाद आप उसी रात अपनी बची हुई सेलेरी और ऑफिस ड्रॉअर में बीबी-बच्‍चों की तस्‍वीरें छोड़कर जान बचाने के लिए उस शहर से बहुत दूर भाग जाते हैं।

Kashmiri government employees scuffle with police during a prote
यह बात सोचने में थोड़ी डरावनी लग सकती है लेकिन अगर आपने इस दुखदाई कल्‍पना में खुद के असम्‍मान और डर के भाव को महसूस किया है तो आपको उन दो से तीन लाख कश्‍मीरियों के दर्द को समझने में मदद मिल सकती है जो सर्द रातों में जान बचाने के लिए अंतिम सांस तक भागे थे।

इस दर्द को महसूस करने के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य की उन पार्टियों के बयानों पर नजर डालिए जो कहते हैं कि अगर कश्‍मीरी पंडितों को घाटी में वापस आना है तो जैसे बुला रहे हैं वैसे ही आना होगा। 1989 से पहले की तरह कश्‍मीरी मुस्लिमों के साथ मिल-जुलकर रहना होगा। ये ऐसा होगा कि आपसे कहा जाए कि जाइए उसी दोस्‍त के जूनियर बनकर काम करिए जो आपको लात मारकर बॉस बना हो।

हद तो तब होती है जब आपको बिना पूर्व सूचना के कम्पनी छोड़ने के लिए माफ़ी मांगने को कहा जाये।

Tagged , , , , , , ,

Book Review: Banaras Talkies By Satya Vyas


banaras-talkiesकॉलेज लाइफ को जिंदगी का गोल्डन फेज कहा जाता है। कहने वाले ने हॉस्टल लाइफ पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अगर की होती तो शायद इसकी तुलना डायमंड या उससे भी ज्यादा बहुमूल्य चीज से की जाती। हॉस्टल की जिंदगी से भी ज्यादा रोचक होती हैं इसकी कहानियां, जिनको सुनाने वाले अपनी आपबीती बयां करते-करते पुरानी यादों में ऐसे खो जाते हैं जैसे कोई शहर के सबसे एलीट रेस्‍टोरेंट में अपनी गर्लफ्रेंड को प्रपोज करने के बाद हॉस्टल का रास्ता भूल जाता है। कुछ ऐसी होती हैं हॉस्‍टल की कहानियां।

इसलिए अक्‍सर लोगों को कॉलेज और कोर्स से ज्‍यादा हॉस्‍टल के लिए परेशान होते देखा जाता है। कई बार लोग हॉस्‍टल के लिए सब्‍जेक्‍ट से भी कंप्रोमाइज कर जाते हैं। लेकिन कमबख्त हॉस्टल में भी ना एकॉमोडेशन सीमित होता है। कई नए-नए हॉस्टलर्स की तो सरकार से अपेक्षा रहती है कि हॉस्टल को यूनिवर्सिटी परिसर से भी बड़ा बनाया जाए। और हां फ्री वाईफाई और अच्छे खाने की डिमांड मौ‍लिक अधि‍कारों की तरह की जाती है। धीरे-धीरे हॉस्टलर्स अपनी नई जिंदगी और दोस्तों में मशगूल हो जाते हैं। फिर खाने और वाई-फाई का भी ध्यान नहीं रह जाता।

लेकिन हॉस्टल लाइफ सबके हिस्से में नहीं आती जैसे स्‍कॉलरशिप नहीं आती। कुछ स्टूडेंट्स को अच्छी रैंक मिलने के बावजूद हॉस्टल नहीं मिल पाता तो वहीं कुछ के लिए यह दूर की कौड़ी की तरह होती है। चार सेमेस्‍टरों की फीस के साथ हॉस्टल की एकमुश्त फीस कई बार घरवालों के बस से बाहर हो जाती है। अब हर महीने रूम रेंट की तरह लिया जाए तो कुछ बच्चे मैनेज भी कर लें। लेकिन एकमुश्त इंस्‍टॉलमेंट बात बिगड़ जाती है। सामान्य आर्थि‍क हालातों वाले घरों में हॉस्टल वाली पढ़ाई की मांग करना ऐसे होता है जैसे लव मैरिज की मांग करना। घर वालों से लेकर रिश्‍तेदार तक बच्चों को हॉस्टल के चक्कर में ना पड़़ने के लिए ठीक उसी तरह समझाते हैं जैसे लड़के ने दूसरी कास्ट की लड़की से शादी करने की जिद पकड़ ली हो। हॉस्टल ना जाने के विरोध में जारी दलीलों के बीच कॉलेज कैंपस ऐसे दिखाई पड़ता है जैसे लव मैरिज करने को तैयार लड़के को कुछ ऐसे ही इमोशनल अत्याचार के दौरान अपनी लवर दिखाई पड़ती है। कानों में सबकी दलीलें सुनाई पड़ती हैं लेकिन आंखों को सिर्फ वही नजर आ रही होती है। हां धीरे-धीरे जैसे-जैसे ब्रेनवॉश होने लगता है तो लवर की आंखो की तरह कॉलेज कैंपस भी धुंधला होता जाता है।

hostelब्रेनवॉश मिशन के शि‍कार लड़के अचानक से यूजीसी से लेकर सिक्कि‍म मनीपाल तक हर डिस्टेंस लर्निंग कोर्स की तरफदारी करना शुरु कर देते हैं। लेकिन दोस्तों का क्या किया जाए वो तो हॉस्टल जाएंगे ही। और जब जाएंगे तो हॉस्टल की कहानियां भी साथ लेकर आएंगे। अब ना तो दोस्तों से किनारा किया जा सकता है ना वो दिल को छूने वाली कहानियों से। अगर आप भी ऐसी ही कहानियों को सुनकर मन ही मन कह उठते हैं काश साला, हम भी हॉस्टल वाली पढाई करते तो जिदंगी कुछ और ही होती। कुछ कहानियां और अच्छी यादें हमारे पास भी होती तो आप सत्यव्यास की किताब बनारस टॉकीज को हॉस्टल की मानिद मिस ना करें।

यह कहानी है बनारस हिंदु यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल भगवानदास में रहने वाले तीन दोस्तों सूरज उर्फ बाबा, अनुराग डे उर्फ दादा और जयबर्धन शर्मा के हॉस्टल में बिताए उन खास दिनों की जब वह रॉलिंग स्टोन से माउंटेन बन गए।

अच्छा दादा, एक बात बताओ तुम कभी किसी लड़की को प्रपोज किए हो?” मैने दादा के हाथ से चाय लेते हुए कहा।

“B।Com में एगो को बोले थे, I Love You” दादा ने कहा।

“फिर?”, मैने पूछा।

“फिर लड़की बोली OK। साला! हमको आज तक समझ नहीं आया कि I Love You का जवाब OK कैसे हुआ। यस नो, कुत्ता, कमीना, जानू, पागल कुछ भी बोलती; आइने में शक्ल या पांव का चप्पल दिखाती; लेकिन OK का क्या मतलब?” दादा ने चाय पीते हुए कहा।

“अबे हंसाओ मत, मर जाएंगे।“ चाय मेरे नाक तक चली गई थी।

“हां। हंस लो साले। अभी तुम्हारा फंसा है ना। अब हम हंसेंगे। पूरा भगवानदास हंसेगा।“ दादा ने चास का कुल्हड़ फेंकते हुए कहा।“

यह किस्सा बीएचयू के भगवानदास हॉस्टल लाइफ में दिन रात चलने वाले इश्क, रोमांच और जीवन बदलने वाले अनुभव की एक बानगी भर है। बनारस टॉकीज आपको ऐसे-ऐसे मोड़़ों से लेकर गुजरेगी जहां पर आप कभी खुद को खुल कर हंसने से रोक नहीं पाएंगे तो कहीं पर बाबा और दादा के तनाव का हिस्सा बनते नजर आएंगे। कहीं सुना था कि किताबें भी ट्रेन की तरह होती हैं जो आपको आपकी मंजिल के बींच आने वाले हर मोड़ से रुबरू कराते हुए आगे बढ़ती हैं। बनारस टॉकीज भी एक जीवंत ट्रेन की तरह है जो आपको हंसाती है रुलाती है और कभी-कभी आंखे नम भी कर देती है। तो पढ़ें क्‍यों‍कि पढ़ना जरूरी है।।।

अंत में अश्वि‍नी भाई को अनन्‍य धन्‍यवाद क्‍योंकि उन्‍होंने ही मुझे भगवानदास हॉस्‍टल की यात्रा करने की सलाह दी।

Tagged , , , , , , ,

दुधवा नेशनल पार्क: खुद को खोकर पाने की यात्रा


DUDHWAवो गुरुवार का दिन था जब सुबह-सुबह संडे गार्जियन में छपे एक एंटरव्यू को पढते-पढ़़ते सोचा कि चलो ना कहीं घूम कर आया जाया। संडे गार्जियन की टीम ने एक एडवेंचर लवर और सोलो बाइक राइडर का इंटरव्यू लिया था. यह बंदा अपनी बाइक पर पूरे इंडिया का चक्कर लगा रहा था और साथ ही साथ अपनी इस यात्रा के अनुभवों को अपने ब्लॉग क्लूलैस राइडर पर पब्लिश करता जा रहा था. इस बंदे ने अपनी ट्रिप को रोमेंटिसाइज किए बिना जितनी इमानदारी से अपनी ट्रिप के बारे में बताया तो इंटरव्यू पढ़ते-पढ़़ते ही सोच लिया कि काश मैं भी ऐसी किसी ट्रिप पर जा पाऊं जहां जाने से पहले वहां जाने में कोई मकसद ना छूपा हो. इसके साथ ही सोचा कि अगर अब‍की बार किसी ट्रिप पर गया तो खुद को खोकर पाने की कोशि‍श करूंगा. जैसे किसी अंजान रोड पर चलते जाना और उस रोड पर बने घरों और किनारे बने पार्को की जालियों को पहली बार देखने का अनुभव प्राप्त करना. पिछली बार जब जिमकॉर्बेट पार्क घूमने गया था तो पूरा टाइम फेसबुक के लिए पिक्चर्स खींचने और सेल्फी खींचने में ही चला गया था. नदी के बलुआ पत्थरों पर ठीक से बैठना तो दूर एक बार ढंग से छू भी नहीं पाया था. इसलिए इस बार पहले से ही सोच लिया था कि कुछ भी हो जाए इस ट्रिप पर फेसबुक को हाथ नहीं लगाऊंगा. यह सोचते-सोचते मैने अपने ऑफिस के दोस्तों वाले वॉट्सअप ग्रुप पर अपने ‘काश’ वाले ट्रिप आइडिया को शेयर कर दिया. मैने अंग्रेजी में पूछा ‘हाऊ अबाउट अ बाइक ट्रिप टू समवेअर विफोर राहुल भाई मैरिज, इट विल बी अ वेरी लिबरेटिंग जर्नी’. वहां से राहुल भाई का ही जवाब आया ‘वेरी नाइस, हम कर सकते हैं.’ इस मैसेज को सेंड करते टाइम मैंने सोचा भी नहीं था कि ग्रुप के सभी लोग ऐसी किसी ट्रिप का कितनी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. लेकिन मैसेज में लिबरेटिंग जर्नी वाली बात मैने अपने लिए ही लिखी थी. पिछले कई महीनों से कहीं घूम कर आने के बारे में सोच रहा था जहां मैं मैं ना रहुं और उस जगह का एक हिस्सा हो जाऊं. लेकिन अखबार की नौकरी में छुटि्टयों मांगना जैसे अपराध माना जाता है वो भी तब जब आप डेस्क पर काम कर रहे हों. इसलिए क्लूलैस राइडर जैसी किसी ट्रिप पर जाने की सोच को भी कई महीनों तक सोच के कमरे में ही बंद रहना पड़ता है. लेकिन मुंआ ये गूगल भी बिहेबियर टारगेटेड एडवरटाइजिंग से मेरी कंप्यूटर स्क्रीन पर पिछले कई दिनों से टूरिज्म वेबसाइट्स के एड ऐसे रन कर रहा था जैसे कोई आइसक्रीम वाला किसी ‘बच्चों वाले घर’ के सामने से गुजरते हुए जोर से अपनी घंटी बजाता है जिससे घर के अंदर के बच्चे आइसक्रीम वाले की घंटी की आवाज सुनकर बाहर आ जाएं और उसकी आइसक्रीम खरीद लें. कंप्यूटर स्क्रीन पर बरबस शुरू हो जाने वाले इन विज्ञापनों को देखकर घूमने जाने को आतुर मन ऐसे छटपटाता है जैसे किसी सात साल की बच्ची को कमरे में बंद कर दिया जाए हो और वह दरवाजे की सांस से आईसक्रीम बेचने वाले को निराश आंखों से देख रही हो. इसलिए ऐसेी किसी जगह पर जाने के बारे में सोचना ही काफी लिब्रेटिंग थॉट था.

वॉट्सअप ग्रुप पर ट्रिप के बारे में बोलकर मैं ग्रुप से लगभग गायब हो गया था क्योंकि राहुल भाई और अरुन भाई ने शुरूआती दौर में ही हामी भर दी थी. लेकिन मुझे फिर भी लग रहा था कि हो ना हो यह ट्रिप पॉसिबल नहीं है क्योंकि राहुल भाई की शादी को सिर्फ दस दिन ही बचे थे. ऐसे में उनके लिए ऐसी किसी ट्रिप पर जाना संभव नहीं लग रहा था. लेकिन वॉट्सएप पर ट्रिप के बारे में बातचीत शुरू हो चुकी थी. लेकिन मैंने किसी भी कनर्वेजेशन में पार्टिसिपेट नहीं किया क्योंकि मैं मन बनाकर तोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए मैं आखि‍र तक कहता रहा कि मैं नही चल पाऊंगा क्योंकि मुझे एग्जाम देने जाना है, पैसे नहीं है आदि आदि. परंतु जब मैने देखा कि अरुण और राहुल भाई लोग ट्रिप को लेकर सीरियस हैं तो मैने भी हां कह दी. हालांकि मन में डर था कि कहीं यह ट्रिप भी पिछली कई ट्रिप्स की तरह फेसबुक और इंस्टाग्राम की शि‍कार ना हो जाएं. लेकिन मैंने रिस्क लिया और तय किया कि जो भी हो जाए पर इस ट्रिप पर खुद से इस वर्चुअल दुनिया का शि‍कार नहीं बनूंगा. मन ही मन डर तो लग रहा था कि कहीं छुट्टियां खराब ना हो जाएं लेकिन रिस्क लेने का भी अपना मजा होता था. इसलिए पूरे दिल से रिस्क लेने को तैयार को हो गया. फिर वो दिन भी आ गया जब हमें सुबह-सुबह दुधवा नेशनल पार्क के लिए निकलना था. दुधवा जाने के लिए हमने 26 जनवरी की छुट्टियों पर निकलने का प्रोग्राम बनाया था. हमने ट्रिप के लिए बैट बॉल और पतंगबाजी जैसे इंतजाम भी किए थे. इन इंतजामों के साथ हम सब निकल पड़े.

जानना चाहेंगे इस खास ट्रिप पर आगे क्या हुआ तो थोड़ा इंतजार करिए. वैसे बता दुं कि ट्रिप के शुरू होते ही हैंगओवर मूवी टाइप एक किस्सा हुआ था. अब अगले अंक में.

Thanks housing.com for giving me the opportunity to tell about about a journey which renewed my understanding of life and its virtues. I got the power of hope and positivity and calmness.

Tagged , , , , , , , , , , , ,

Author Interview: Shreya Prabhu answers tough questions on Urban Relationships


shreya-prabhu-jindalIn metro cities, life runs faster than metro trains. People infused with multipronged ambitions work day and night to make things work. In all this, relationships face the worst part of such rollercoaster lifestyle. People begin hating people whom they loved months ago. Our author Shreya Prabhu Jindal has encompassed urban relationships with its all kookiness in her Book Simply Complicated. In this interview, she has answered tough questions relating to urban relations.


Anant: How do you come to write about the complicated relationships of young professionals living in metro cities?

Shreya: I write what I know, what I see and observe around me. I have always lived in big metro cities and my friends are young professionals- as am I. So it made sense to write about the complications that exist for that age group.

Anant: There are similarities in you and your characters like the alma mater and professions. Did you see these characters as real people in your life?

Shreya: Yes, many of them are based on people I know and come from a similar background to myself and my friends. The professions are very typical ones for young working people, and so are the kind of problems they are faced with. But beyond that, they are all fictional characters.

Anant: Do you really think two couples can live happily despite the bitterness and regular fights?

Shreya: I think it depends on the couple. How much are they willing to try and make it work? I think that if the couple is happy on more days than they are fighting, it’s worth it. It depends on the kind of people they are.

Anant: Do you think it will be easy for a girl to behave with someone as a friend for whom she had got real feelings? Can such feelings be curbed for the sake of anything even friendship?

Shreya: This happens all the time, everyday. Everyone has crushes which aren’t returned, and people struggle to get over their exes and remain friends with them. Behaving normally with an old friend, even if you have developed feelings for them, isn’t that hard!

Anant: Which character was closest to you and why? I believe she was Astha!

Shreya: Yes, Aastha, because I am always playing the role of the single friend who’s giving relationship advice to others. But that’s where the similarity ends. She can be very judgmental and irritating- something which I hope I’m not.

Anant: Did you intentionally give Rahul’s character a gray shade to make him relatable and real?

Shreya: Rahul was initially supposed to be a complete “douchebag” with no redeeming qualities, but when I started writing from his perspective I had to change my portrayal of him. He is as human as any of the other characters. They all have their flaws and problems- none of them are perfect.

Anant: What have you just finished reading and what are you reading now days?

Shreya: I am reading fanfiction based on Harry Potter and the popular TV show, Sherlock. I don’t have too much time for reading, so I end up reading fanfiction in my spare time, since I prefer that.

Anant: Please tell what qualities of a book makes you read and reread with one example please?

Shreya: A good book should have strong characters, memorable dialogues, and a conflict or crisis that the characters have to work to fix. This is a formula which works for every genre- from The Fault in Our Stars to Harry Potter!

Anant: Please share this book’s journey from an idea to a paperback. Hope it will help young writers.

Shreya: It takes a lot of work to write a book. Getting the ideas in place is the easiest part. After that you have to force yourself to keep writing at least 300-400 words on days when you might be feeling very tired or uninspired. You can only succeed as a writer if you’re able to keep writing regularly.

Anant: Please share how was this interview round? You can pinpoint which question is good and which is boring.

Shreya: The advice to young authors and the questions on what inspired me and the journey of writing the book were great, but you shouldn’t be too specific about characters and situations in the books which people reading the book might not have read. Otherwise, it was a good interview.

Click here for more Author interviews and follow the blog.
Continue reading

Tagged , , , , , , , , ,

An Evening at Painter’s Universe


google

Some days back, I was with a girl, whose name I wish to be coined with mine. It was a calm and normal day. Everything was settling at a normal pace. I woke up early and tried understanding one of my dream. In my dream, I saw a painter splashing colors at his canvas. Such vivid dreams were not new to me. I have even seen people discussing concepts of horror and sex in my dreams. But this painter’s dream was little more engrossing as he was splashing colors at his canvas hysterically. The whole room was being splattered with different shades of prussian blue, crimson red and mustered yellow. But I could not gauge the abstract creation of ‘the painter’. After spending about an hour in search of the meaning of this dream over web, I ended up feeling frustrated. The mystery of the ‘creation in process’ remain unsolved. But I somehow managed to transport myself back into the real life where I was to go the office.

This day, I was to meet the girl I liked. But that was a very small section of the day. The meeting was about to happen at 7 o’ clock in evening and 10 hours long working day was ahead of me. The painter’s dream was perturbing me hard. I again spent about thirty minutes in office to find the meaning of the dream. But nothing happened. Restlessness was growing with each failed effort. Somehow I managed to complete the day’s work without any blunder. And left my workplace at 6:30 evening to meet my girl.

Clad in creamy white cardigan with pink flowers, she looked like the goddess of pink color. Every time I saw her such analogies came to my mind. She’s waiting for me at the check-in counter. We weren’t in love but we liked eachother’s company. We were fellow travelers. It was the first time we were into a movie hall. Opportunity makes people greedy for things that they can’t avail. But they also give the courage people to stand and show their guts by fighting hard for someone you love. In the movie hall, we were able to see each other to our heart contents. But we were watching the movie. Each fight scene was being consumed with bigger amount of popcorn. I sipped from her soft-drink after quickly finishing mine. We were sharing cold-drink in a manner as if we were together for years. Such familiarity and comfort in sharing glasses were seemed magical to me. But we didn’t say a word. The search for popcorn was making our fingers crash unknowingly. Heart was pounding so hard that I felt like being in a dream again. Her presence looked dreamy as we didn’t talk. But the moment was so overwhelming that I couldn’t tell her if I liked the movie or not. I was so speechless and stunned that I could only experiencing the presence of my girl in a sacred way. I didn’t touch her because she touched me with her overwhelming presence. Each time, my fingers crashed with hers she went more silent. This unknown touch was bringing emotional thunderstorms for her. It brought me more close to her for support. But she was not looking for support. She was herself an ocean of happiness. This day, she opened her ocean of love for me. In this ocean I will have to sail using my own Skills. After the movie, the painter’s dream was not anymore a mystery. The ‘creation in process’ was nothing but my growing love for the girl of my life.

Thanks housing.com for giving us the opportunity to write about a memorable even though signifying positivity and optimism of love.

Tagged , ,

This women’s Day express your love to the women of your life


At times, we get the opportunity to tell someone how much we love them. To make them know that our world will doom in their absence. But at many times we dont get such opportunities. SafetyKart’ Women’s Day Writing Competition is one such opportunity. On this international Women’s Day, you can tell the women of your life how much you respect them in their efforts of creating this world a beautiful place.

Contest Details are given below…

Contest entries are now open
The contest is divided in the following 3 categories:
Drawing/Painting/Sketching for age group 6 – 10 years

Writing Contest – Type 1 for age group 10 – 18 years

Writing Contest – Type 2 for age group 18 years and above

The contest entries will be judged by a panel of eminent personalities including names like Shruti Kapoor, Sanya Seth, Suman Nathwani, Mriganka & Nitin Saluja.
These judges will select top three candidates from the 10 candidates selected for each category by a preliminary jury. The last date for submitting an entry is March 7, 2015 by 11:59 PM.
The winners of the contest will be awarded with cash prizes amounting up to Rs. 50,000 and several gift vouchers. Besides this, top 10 winners in each category will receive SafetyKart vouchers worth Rs. 500 each.

Details are up. So what I tell you my readers don’t write for the prize but for the opportunity to tell the women around you that how wonderful they are. These women can be your colleague, your loved one,  your female friend, your cook and in whatever form the woman touches your life.

Write because it will make you a better person.

Tagged , , , , , , , ,
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 1,386 other followers

%d bloggers like this: