भारत – लाला जी की दुकान से ई-कॉमर्स स्टोर तक का सफर


आज से बहुत साल पहले दिल्ली में एक किराने की दुकान हुआ करती थी जिसमें एक लालाजी अपने मुनीम के साथ बैठा करते थे. कई बार लालाजी विदेशयात्राओं पर जाते तो लालाजी का मुनीम पूरी जिम्मेदारी से सुबह तड़के सात बजे दुकान खोल देता और शाम में लालटेन जलने तक ग्रा‍हकों को सामान बेचता रहता. इस दौर में बिजली सहज उपलब्ध नहीं होती थी. इसलिए अंधेरा बढ़़ने पर दुकान बढ़़ानी पड़ती थी. यह दुकान कहने को तो एक किराने की दुकान भर थी लेकिन आम इंसानी जरूरत की हर चीज यहां उपलब्ध होती थी. मसलन अगर आपको पेरासिटामोल से लेकर चाय-चीनी और स्कूली किताबों से लेकर लेबोरेटरी का सामान भी चाहिए तो आपको यह सब लालाजी की दुकान पर आसानी से मिल जाते थे. इसलिए अमीर और गरीब जाति के बंधन से मुक्त होकर इस दुकान पर अपनी हैसियत के हिसाब से सामान खरीद सकते थे. इन दिनों में मंदिरों में तो प्रवेश जाति के आधार पर मिलता था लेकिन लालाजी के काउंटर पर सब बराबर थे. सभी को लाइन लगाकर खड़ा होना पड़ता था. लेकिन जैसे हर चीज के अच्छे और बुरे पहलू होते हैं. लालाजी की दुकान के भी ऐसे कुछ पहलू थे जिनसे इस आदर्श की कलई खुलती दिखाई पड़ती थी.

लालाजी की इस दुकान के सबसे बुरे पहलुओं में लालाजी सबसे खास पहलु थे क्योंकि उन्हें अपनी सम्पन्नता भी इसी दुकान से बढ़़ानी थी. लालाजी की उम्र भी साठ बरस की हो चली थी और उन्हें दाएं कान से कम सुनाई पड़ता था. अब इस बूढ़े बुजुर्ग की उम्र ही इतनी थी कि लोगों को ना चाहते हुए भी लालाजी के ना सुनाई देने की बात पर यकीन करना पड़ता था. आम इंसानी सलीका तो यही कहता है कि अगर कोई बूढ़ा बुजुर्ग आपसे कहे कि उसे यह समस्या है तो आप उस पर विश्वास करते हैं जब तक कि आप उस मर्ज की ठीक प्रकार से जांच करने में सक्षम ना हों. इसलिए लोग उनके आंशि‍क बहरेपन को किसी तरह से बर्दाश्त कर रहे थे. लेकिन लालाजी के बहरेपन के साथ एक समस्या यह थी कि यह अपने मतलब की तो सारी बातें सुन लेते थे लेकिन ग्राहक के मतलब की बात सुनाई नहीं देती थी. मसलन अगर कोई ग्राहक कहे कि लालाजी चीनी पचास ग्राम कम तुली है तो लालाजी को सुनाई नहीं देता था वहीं अगर कोई कहे कि लालाजी आपने तो ज्यादा पैसे दे दिए तो वे यह बात वे फट से सुन लेते थे. अब ऐसी कंडीशन में उच्च मध्यवर्ग के ग्राहकों को तो एक किलो में पचास ग्राम चीनी कम तुलने से कोई फर्क नहीं पड़ता था और वे लालाजी को उनके बहरेपन के साथ छोड़कर आगे बढ़ लेते थे. लेकिन जब बारी आती आर्थि‍क रूप से पिछड़े तबकों की तो लालाजी की दुकान पर बवाल खड़ा हो जाता. ऐसे ग्राहक पचास ग्राम चीनी के लिए घंटों तक लालाजी के बहरों कानों में अपनी बात डालने के लिए चिल्लाते रहते. इसके बाद लालाजी का मुनीम उन्हें डांटकर भगा देता था. लेकिन मुनीम इसके पीछे की सच्चाई जानता था.

लालाजी का मुनीम एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पेशेवर मुनीम था जिसके अनुसार ग्राहकों के साथ छल करके लालाजी अपनी दुकान में ही छोत लगा रहे थे. इसलिए वह लालाजी को जब तब समझाने की कोशि‍श करता कि ग्राहकों के साथ छल करके उनका भरोसा दुकान पर से उठ सकता है. मुनीम के कई बार कहने पर लालाजी के दिमाग में यह बात घर कर गई कि यह शारीरिक बहरापन ज्यादा दिनों तक काम नहीं देने वाला इसलिए छल का दूसरा रास्ता खोजना पड़ेगा. इसलिए लालाजी अपनी दुकान मुनीम के हवाले सौंपकर विदेश यात्रा पर निकल पड़े ताकि देखा जा सके कि विदेशों में किराने की दुकानें कैसे चलाई जा रही हैं. लालाजी ने अपनी लंबी यात्रा के दौरान विदेशों में कई तरह के आधुनिक तरीके देखे जिनसे ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता था और ग्राहक को भी छलने की जरूरत नहीं थी. अपनी बहुदेशीय यात्रा के दौरान लालाजी अमेरिका भी पहुंचे जहां उन्होंने ई-कामर्स नामक अत्याधुनिक विधा के बारे में सुना. लालाजी को जैसे ही पता चला कि इस विधा में तो कस्टमरों से बात किए बिना ही प्रॉडक्ट सेल किया जा सकता है और पैसे की हाय-हाय झिक-झिक नहीं. इसके साथ ही ग्राहकों को वेबकूफ भी बनाया जा सकता है लेकिन जुगाड़ से. इसके बाद लालाजी ने दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी और मुनीम को मिलने का संदेशा दे भेजा.

लालाजी की घरवापसी का संदेश सुनकर मुनीम दौड़ता-हांफता उनके घर पहुंचा तो देखा लालाजी बड़े मजे से जलेबि‍यां खा रहे थे और बगल में दही का कटोरा भी रखा था. लालाजी को मजे से जलेबियां खाते देख मुनीम ने मन ही मन सोचा कि हो ना हो लालाजी ने घर लौटकर खाता-बही नहीं देखी है क्योंकि अगर देखी होती तो जरूर मुझे खरीखोटी सुना रहे होते. क्योंकि मुनीम ने लालाजी की गैरमौजुदगी में दुकान पूरी ईमानदारी से चलाई थी इसलिए खाताबही में अंतर आना तो स्वाभाविक ही था. मुनीम यह सब सोच ही रहा था कि तभी लालाजी ने मुनीम को देखकर कहा, ‘आओ, मुनीम जी, जलेबियां खाओ.’ लालाजी के मुंह से इतनी मीठी बातें सुनकर तो मुनीम के होश ही उड़ गए. तभी लालाजी ने ऐलानी अंदाज में कहा मुनीम तुम कहते थे ना कि ग्राहकों के साथ छल करके कभी दुकान की तरक्की नहीं हो सकती. इसलिए हमने तय कर लिया है कि अब अपने सामान को ऑनलाइन बेचेंगे. मुनीम ने सर खुजाते हुए कहा, ‘ऑनलाइन, हैं लालाजी, यह क्या होता है.’ लालाजी ने मुनीम की अज्ञानता पर लगभग हंसते हुए कहा कि मुनीम जी फुटकर विक्रय की इस विधा में ग्रा‍हकों के पास कभी भी, कहीं भी और कितना भी खरीदने की आजादी होती है. जैसे अगर किसी को तीन किलो चीनी खरीदनी हो तो वो उसे बस अपने घर या ऑफिस में रखे कंप्यूटर से हमारी ऑनलाइन साइट पर ऑर्डर करना होगा. फिर हम ग्राहक के घर पर तीन किलो चीनी डिलीवर करा देंगे और इसमें किसी प्रकार का छल या धोखा नहीं होगा.

यह सब सुनकर मुनीम की आंखों में आंसू आ गए और उसने लालाजी के पैर पकड़ लिए और पूछा कि आखि‍र कब से शुरू करना है अपना ई-कॉमर्स स्टोर. यह सुनकर लालाजी बोले कि पहले तुम जाओ अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, जर्मनी और आस्ट्रेलिया के ई-कॉमर्स स्टोर्स में लिखी नियम और शर्तों को स्टडी करके आओ और देखो कि इन स्टोर्स के टर्म्स एंड कंडीशंस में कौन-कौन सी अच्छी बातें हैं जो हम अपने स्टोर में डाल सकते हैं. इसके कुछ दिनों बाद लालाजी की दुकान ई-कॉमर्स स्टोर में तब्दील हो गई और लोग अब धड़ाधड़ शॉपिंग करने लगे. कभी-कभार कुछ ग्राहकों को उनको डिलीवर हुए समान से असंतुष्टी होती तो लालाजी मुनीम को समझा लेते कि अब बताईए अपन ने तो पहले ही साफ-साफ लि‍ख रखा है कि ना समझ में आए तो ना लें और टर्म्स एंड कंडीशन पढ़ लें. अब ये ग्रा‍हक निरे मूरख हैं तो इसके लिए हम कहां से जिम्मेदार हैं. इसके बाद मुनीम के पास कोई प्रश्न ही नहीं बचता और वह असंतुष्ट ग्राहकों को यही ईमेल ठोक देता कि जी आपकी गलती थी. इसके बाद लालाजी ने हर पांच सालों में एक मेगासेल और कई प्रकार की मंथली और वार्षि‍क सेलें रखने का ऐलान कर दिया. इन सेलों से पहले लालाजी की कंपनी टीवी से लेकर, रेडियो तक हर जगह प्रचार करवाती कि पांच साल में सबसे सस्ता सामान, अब नहीं खरीदा तो कभी नहीं खरीद पाओगे. ऐसे विज्ञापन और हॉर्डिंग देखकर लोग इच्छा ना होते हुए भी कुछ ना कुछ तो खरीद ही लेते थे. अब कुछ लोगों को उनके मनमाफिक चीज मिलती तो कुछ लोगों को मोबाइल के डिब्बों में साबुन की टिकिया मिलती. इसके बाद असंतुष्ट लोग सिर्फ ईमेल के सहारे अपना रोना रोते रह गए और ईकॉमर्स स्टोर की मेगासेलों और टर्म्स एंड कंडीशंस में उलझ कर रह गए.

ऐसे ही कुछ लोग आज भी झुग्गी बस्त‍ियों में रह रहे हैं और फ्री बिजली और पानी देने एवं झोपड़ी की जगह मकान देने वाली मेगा सेलों की टर्म्स एंड कंडीशन पढ़े बिना बाय नाओ बटन पर क्लिक कर रहे हैं.

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