Our Crazy Journey to Dudhwa National Park – Part 2


 

dudhwa national park अगर आप हमारी दुधवा नेशनल पार्क यात्रा के पहले पार्ट को पढ़ चुके हैं तो भाई थेन्क्यू और जो नहीं पढ़़ी तो बधाई हो क्योंकि आपका थोड़ा सा टाइम बच गया है. खैर अब जब आप यहां आ ही गए हैं तो बैठ जाइए हमारी हुंडई एक्स-सेंट आपको दुधवा नेशनल पार्क घुमा कर लाते हैं. अच्छा सुनिए अगर आपको शांत और बिना एडवेंचर की यात्राएं पसंद हैं तो कृपया इस ब्लॉग पोस्ट को कतई ना पढ़़ें क्योंकि आप जो पढ़ने जा रहे हैं उसे पढकर आप हमें क्रेजी और केयरलैस लडकों की संज्ञा दे सकते हैं एंड वी डोंट माइंड देट…बिकॉज दिस इज अ ग्रुप ऑफ रिलेशनशि‍प वॉरियर्स. जो सभी ऑड्स को बर्दाश्त करते हुए भी अपनी नौकरी और रिलेशनशि‍प को बचाने को कोशि‍श करते हैं. ऐेसे में थोड़ा क्रेजी तो बनता है…इस ट्रिप में शामिल हैं…सौरभ – द नीट एक्सपर्ट, सलमान – द पतंगबाज, अरुण – अपना भाई, रवि, अमन – भाइयों का भाई, राहुल भाई – द कर्नल साहिब एंड सम अदर पिपुल…

तो इस तरह हम लोग 25 जनवरी की सुबह 9 बजे हुंडई एक्स-सेंट पर सवार होकर लखनऊ के लिए निकल पड़े थे. अब आप सोच रहे होंगे कि हम लोग तो दुधवा पार्क घूमने जाने वाले थे तो अब ये लखनऊ कहां से आ गया. तो जी बात ये है कि हम लोग निकले तो दुधवा के लिए थे और घड़ी देखकर 74 मिनट में लखनऊ पहुंच भी गए. लेकिन लखनऊ में जो कुछ हुआ वो कतई क्रेजी था क्योंकि हम लोगों ने लखनऊ में हाइवे के किनारे खड़े होकर पूरा का पूरा दिन बिता दिया. दरअसल इवेंट फ्लो के अनुसार इस ट्रिप के लिए ड्रिंक्स वगैरा लखनऊ से खरीदी जानीं थीं और इसके बाद दुधवा में जंगल लोर रिसॉर्ट पहुंचकर ही ड्रिंक्स वगैरा शुरु होनी थीं. लेकिन प्लान के अनुसार कहां कुछ चलने वाला था. जैसे ही बकार्डी की एक पूरी क्रेट गाड़ी में लोड हुई तो हमारी गाड़ि‍यां हाइवे के किनारे पार्क हो गई. एक के बाद ए‍क खाली क्वार्टर बोतलें गाडी़ से बाहर फेंकी जाने लगी. इस ट्रिप की सबसे अच्छी बात यह थी कि ट्रिप पर सौरभ और सलमान नाम के दो बंदे ऐसे थे जो सिर्फ नीट पीते हैं और नीट उन्हें कोई दे नहीं रहा था. ऐसे में गाड़ी में बकार्डी पीकर ढेर हुए शेरों की जान पूरी तरह सुरक्षि‍त थी.

इसके बाद दोपहर के दो-ढाई बजे हमने फिर से गाड़ी शुरु करवाने की कोशि‍श की तो गाड़ी में रखे बल्लों, हॉकियों को डिक्की में से निकाल कर आगे रख लिया गया. यह सब हो ही रहा था कि तभी रवि ने एक छोटा से फल काटने का चाकू निकाल कर दिखाया. यह चाकु देखते ही मैनें संजय दत्त वाली स्टाइल में चाकू घुमाने की कोशि‍श की. लेकिन जैसे ही चाकु घूमा वैसे ही मेरी जैकेट में एक लंबा सा कट हो गया. वो तो अच्छी बात थी कि यह जैकेट टू-इन-वन थी नहीं तो इस ट्रिप में मेरी लग जाने वाली थी. इसके बाद हम हौले-हौले चलते हुए शाम 6 बजे तक लखीमपुर खीरी तक पहुंचे गए. अब दुधवा नेशनल पार्क सिर्फ 80 किलोमीटर दूर था. कि तभी हमारे आगे चल रही कासिम भाई की गाड़ी एक बताशे वाले की दुकान पर रुक गई. अच्छा इस ट्रिप में सिग्नल पर चलने की हो रही थी. अगर दोनों में से एक भी गाड़़ी रुकी है तो दूसरी रुकना जरूरी है. इसके बाद हम 11 लोगों ने बताशे खाना शुरु किए और बताशे वाले के कांच वाले केंटर में बताशे खत्म होने तक खाते रहे. उस दिन हर एक ने कम से कम 30-30 बताशे तो खाए ही होंगे. लेकिन यहां तक तो सब ठीक था क्योंकि बताशे खाने के बाद कासिम भाई की गाड़ी की स्टेयरिंग पर अरुण सवार हो गया और उसने गाड़ी 180 डिग्री पर मोड़ दी और लगा गाड़ी दौड़ाने. यह देखकर हम लोग तो सन्न रह गए क्योंकि हमारी गाड़़ी के शेर पूरी तरह होश में थे. लेकिन कासिम भाई की गाड़ी के शेर तो पहले ही मोजिटो के नशे में ढेर थे तो अरुण को रोकता तो रोकता कौन. इसलिए हमने कासिम भाई की गाड़ी का पीछा करना शुरु कर दिया. जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी हमें लग रहा था कि कहीं अरुण का पीछा करते-करते हम वापस लखनऊ ना पहुंच जाएं. क्योंकि अरुण बताशे खाने के बाद वास्कोडिगामा हो लिया था. तो हम बस फॉलो कर रहे थे. लेकिन कुछ किलोमीटर तक लखनऊ की ओर गाड़ी दौड़़ाने के बाद अरुण ने गाड़ी एक झटके में 90 डिग्री पर मोड़ दी. ऐसा लगा कि हम लोग फास्ट एंड फ्यूरियस देख रहे हैं. हम अब भी पीछा कर रहे थे. गाड़ी के अंदर का माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण था.  बता दें कि इस रास्ते पर आकर हमारे गूगल मैप और हाइफाई नेविगेशन एप्स धराशाई हो चुके थे क्योंकि यहां नेटवर्क तो छोड़ो उसका वंश भी नहीं दिखाई पड़ रहा थी. अब हम लोगों को अयोध्या 47 किलोमीटर वाला साइन बोर्ड दिखाई पड़ा तो मैंने सोचा चलो कोई नहीं राम लला के दर्शन कर लिए जाएंगे. पर फिर अरुण ने 90 डिग्री लेफ्ट पर गाड़ी मोड़़ कर नहर के साथ वाले छोटे से कच्चे रास्ते पर गाड़ी उतार दी. इस रास्ते पर गाड़ी उतारते ही अमन की चोक ले गई. बोला कोई तो भइया को रोक लो. एक्स-सेंट में बैठे लोगों ने लगभग चिल्लाते और गरियाते हुए कहा…कोई तो रोको अरुण को. इसके बाद हम लोग किसी तरह हिलते-हिलाते रात के नौ बजे 12 घंटे का सफर तय करके हम दुधवा नेशनल पार्क के सामने बने जंगल लोर पहुंच गए. जहां शुरू हुआ गालियों का वो दौर कि रघु और राजीव भी शर्मिंदा हो जाएं…खैर इस बारे में अगले अंक में…आइएगा, मजा आएगा.

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