दुधवा नेशनल पार्क: खुद को खोकर पाने की यात्रा


DUDHWAवो गुरुवार का दिन था जब सुबह-सुबह संडे गार्जियन में छपे एक एंटरव्यू को पढते-पढ़़ते सोचा कि चलो ना कहीं घूम कर आया जाया। संडे गार्जियन की टीम ने एक एडवेंचर लवर और सोलो बाइक राइडर का इंटरव्यू लिया था. यह बंदा अपनी बाइक पर पूरे इंडिया का चक्कर लगा रहा था और साथ ही साथ अपनी इस यात्रा के अनुभवों को अपने ब्लॉग क्लूलैस राइडर पर पब्लिश करता जा रहा था. इस बंदे ने अपनी ट्रिप को रोमेंटिसाइज किए बिना जितनी इमानदारी से अपनी ट्रिप के बारे में बताया तो इंटरव्यू पढ़ते-पढ़़ते ही सोच लिया कि काश मैं भी ऐसी किसी ट्रिप पर जा पाऊं जहां जाने से पहले वहां जाने में कोई मकसद ना छूपा हो. इसके साथ ही सोचा कि अगर अब‍की बार किसी ट्रिप पर गया तो खुद को खोकर पाने की कोशि‍श करूंगा. जैसे किसी अंजान रोड पर चलते जाना और उस रोड पर बने घरों और किनारे बने पार्को की जालियों को पहली बार देखने का अनुभव प्राप्त करना. पिछली बार जब जिमकॉर्बेट पार्क घूमने गया था तो पूरा टाइम फेसबुक के लिए पिक्चर्स खींचने और सेल्फी खींचने में ही चला गया था. नदी के बलुआ पत्थरों पर ठीक से बैठना तो दूर एक बार ढंग से छू भी नहीं पाया था. इसलिए इस बार पहले से ही सोच लिया था कि कुछ भी हो जाए इस ट्रिप पर फेसबुक को हाथ नहीं लगाऊंगा. यह सोचते-सोचते मैने अपने ऑफिस के दोस्तों वाले वॉट्सअप ग्रुप पर अपने ‘काश’ वाले ट्रिप आइडिया को शेयर कर दिया. मैने अंग्रेजी में पूछा ‘हाऊ अबाउट अ बाइक ट्रिप टू समवेअर विफोर राहुल भाई मैरिज, इट विल बी अ वेरी लिबरेटिंग जर्नी’. वहां से राहुल भाई का ही जवाब आया ‘वेरी नाइस, हम कर सकते हैं.’ इस मैसेज को सेंड करते टाइम मैंने सोचा भी नहीं था कि ग्रुप के सभी लोग ऐसी किसी ट्रिप का कितनी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. लेकिन मैसेज में लिबरेटिंग जर्नी वाली बात मैने अपने लिए ही लिखी थी. पिछले कई महीनों से कहीं घूम कर आने के बारे में सोच रहा था जहां मैं मैं ना रहुं और उस जगह का एक हिस्सा हो जाऊं. लेकिन अखबार की नौकरी में छुटि्टयों मांगना जैसे अपराध माना जाता है वो भी तब जब आप डेस्क पर काम कर रहे हों. इसलिए क्लूलैस राइडर जैसी किसी ट्रिप पर जाने की सोच को भी कई महीनों तक सोच के कमरे में ही बंद रहना पड़ता है. लेकिन मुंआ ये गूगल भी बिहेबियर टारगेटेड एडवरटाइजिंग से मेरी कंप्यूटर स्क्रीन पर पिछले कई दिनों से टूरिज्म वेबसाइट्स के एड ऐसे रन कर रहा था जैसे कोई आइसक्रीम वाला किसी ‘बच्चों वाले घर’ के सामने से गुजरते हुए जोर से अपनी घंटी बजाता है जिससे घर के अंदर के बच्चे आइसक्रीम वाले की घंटी की आवाज सुनकर बाहर आ जाएं और उसकी आइसक्रीम खरीद लें. कंप्यूटर स्क्रीन पर बरबस शुरू हो जाने वाले इन विज्ञापनों को देखकर घूमने जाने को आतुर मन ऐसे छटपटाता है जैसे किसी सात साल की बच्ची को कमरे में बंद कर दिया जाए हो और वह दरवाजे की सांस से आईसक्रीम बेचने वाले को निराश आंखों से देख रही हो. इसलिए ऐसेी किसी जगह पर जाने के बारे में सोचना ही काफी लिब्रेटिंग थॉट था.

वॉट्सअप ग्रुप पर ट्रिप के बारे में बोलकर मैं ग्रुप से लगभग गायब हो गया था क्योंकि राहुल भाई और अरुन भाई ने शुरूआती दौर में ही हामी भर दी थी. लेकिन मुझे फिर भी लग रहा था कि हो ना हो यह ट्रिप पॉसिबल नहीं है क्योंकि राहुल भाई की शादी को सिर्फ दस दिन ही बचे थे. ऐसे में उनके लिए ऐसी किसी ट्रिप पर जाना संभव नहीं लग रहा था. लेकिन वॉट्सएप पर ट्रिप के बारे में बातचीत शुरू हो चुकी थी. लेकिन मैंने किसी भी कनर्वेजेशन में पार्टिसिपेट नहीं किया क्योंकि मैं मन बनाकर तोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए मैं आखि‍र तक कहता रहा कि मैं नही चल पाऊंगा क्योंकि मुझे एग्जाम देने जाना है, पैसे नहीं है आदि आदि. परंतु जब मैने देखा कि अरुण और राहुल भाई लोग ट्रिप को लेकर सीरियस हैं तो मैने भी हां कह दी. हालांकि मन में डर था कि कहीं यह ट्रिप भी पिछली कई ट्रिप्स की तरह फेसबुक और इंस्टाग्राम की शि‍कार ना हो जाएं. लेकिन मैंने रिस्क लिया और तय किया कि जो भी हो जाए पर इस ट्रिप पर खुद से इस वर्चुअल दुनिया का शि‍कार नहीं बनूंगा. मन ही मन डर तो लग रहा था कि कहीं छुट्टियां खराब ना हो जाएं लेकिन रिस्क लेने का भी अपना मजा होता था. इसलिए पूरे दिल से रिस्क लेने को तैयार को हो गया. फिर वो दिन भी आ गया जब हमें सुबह-सुबह दुधवा नेशनल पार्क के लिए निकलना था. दुधवा जाने के लिए हमने 26 जनवरी की छुट्टियों पर निकलने का प्रोग्राम बनाया था. हमने ट्रिप के लिए बैट बॉल और पतंगबाजी जैसे इंतजाम भी किए थे. इन इंतजामों के साथ हम सब निकल पड़े.

जानना चाहेंगे इस खास ट्रिप पर आगे क्या हुआ तो थोड़ा इंतजार करिए. वैसे बता दुं कि ट्रिप के शुरू होते ही हैंगओवर मूवी टाइप एक किस्सा हुआ था. अब अगले अंक में.

Thanks housing.com for giving me the opportunity to tell about about a journey which renewed my understanding of life and its virtues. I got the power of hope and positivity and calmness.

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