Book Review: Banaras Talkies By Satya Vyas


banaras-talkiesकॉलेज लाइफ को जिंदगी का गोल्डन फेज कहा जाता है। कहने वाले ने हॉस्टल लाइफ पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अगर की होती तो शायद इसकी तुलना डायमंड या उससे भी ज्यादा बहुमूल्य चीज से की जाती। हॉस्टल की जिंदगी से भी ज्यादा रोचक होती हैं इसकी कहानियां, जिनको सुनाने वाले अपनी आपबीती बयां करते-करते पुरानी यादों में ऐसे खो जाते हैं जैसे कोई शहर के सबसे एलीट रेस्‍टोरेंट में अपनी गर्लफ्रेंड को प्रपोज करने के बाद हॉस्टल का रास्ता भूल जाता है। कुछ ऐसी होती हैं हॉस्‍टल की कहानियां।

इसलिए अक्‍सर लोगों को कॉलेज और कोर्स से ज्‍यादा हॉस्‍टल के लिए परेशान होते देखा जाता है। कई बार लोग हॉस्‍टल के लिए सब्‍जेक्‍ट से भी कंप्रोमाइज कर जाते हैं। लेकिन कमबख्त हॉस्टल में भी ना एकॉमोडेशन सीमित होता है। कई नए-नए हॉस्टलर्स की तो सरकार से अपेक्षा रहती है कि हॉस्टल को यूनिवर्सिटी परिसर से भी बड़ा बनाया जाए। और हां फ्री वाईफाई और अच्छे खाने की डिमांड मौ‍लिक अधि‍कारों की तरह की जाती है। धीरे-धीरे हॉस्टलर्स अपनी नई जिंदगी और दोस्तों में मशगूल हो जाते हैं। फिर खाने और वाई-फाई का भी ध्यान नहीं रह जाता।

लेकिन हॉस्टल लाइफ सबके हिस्से में नहीं आती जैसे स्‍कॉलरशिप नहीं आती। कुछ स्टूडेंट्स को अच्छी रैंक मिलने के बावजूद हॉस्टल नहीं मिल पाता तो वहीं कुछ के लिए यह दूर की कौड़ी की तरह होती है। चार सेमेस्‍टरों की फीस के साथ हॉस्टल की एकमुश्त फीस कई बार घरवालों के बस से बाहर हो जाती है। अब हर महीने रूम रेंट की तरह लिया जाए तो कुछ बच्चे मैनेज भी कर लें। लेकिन एकमुश्त इंस्‍टॉलमेंट बात बिगड़ जाती है। सामान्य आर्थि‍क हालातों वाले घरों में हॉस्टल वाली पढ़ाई की मांग करना ऐसे होता है जैसे लव मैरिज की मांग करना। घर वालों से लेकर रिश्‍तेदार तक बच्चों को हॉस्टल के चक्कर में ना पड़़ने के लिए ठीक उसी तरह समझाते हैं जैसे लड़के ने दूसरी कास्ट की लड़की से शादी करने की जिद पकड़ ली हो। हॉस्टल ना जाने के विरोध में जारी दलीलों के बीच कॉलेज कैंपस ऐसे दिखाई पड़ता है जैसे लव मैरिज करने को तैयार लड़के को कुछ ऐसे ही इमोशनल अत्याचार के दौरान अपनी लवर दिखाई पड़ती है। कानों में सबकी दलीलें सुनाई पड़ती हैं लेकिन आंखों को सिर्फ वही नजर आ रही होती है। हां धीरे-धीरे जैसे-जैसे ब्रेनवॉश होने लगता है तो लवर की आंखो की तरह कॉलेज कैंपस भी धुंधला होता जाता है।

hostelब्रेनवॉश मिशन के शि‍कार लड़के अचानक से यूजीसी से लेकर सिक्कि‍म मनीपाल तक हर डिस्टेंस लर्निंग कोर्स की तरफदारी करना शुरु कर देते हैं। लेकिन दोस्तों का क्या किया जाए वो तो हॉस्टल जाएंगे ही। और जब जाएंगे तो हॉस्टल की कहानियां भी साथ लेकर आएंगे। अब ना तो दोस्तों से किनारा किया जा सकता है ना वो दिल को छूने वाली कहानियों से। अगर आप भी ऐसी ही कहानियों को सुनकर मन ही मन कह उठते हैं काश साला, हम भी हॉस्टल वाली पढाई करते तो जिदंगी कुछ और ही होती। कुछ कहानियां और अच्छी यादें हमारे पास भी होती तो आप सत्यव्यास की किताब बनारस टॉकीज को हॉस्टल की मानिद मिस ना करें।

यह कहानी है बनारस हिंदु यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल भगवानदास में रहने वाले तीन दोस्तों सूरज उर्फ बाबा, अनुराग डे उर्फ दादा और जयबर्धन शर्मा के हॉस्टल में बिताए उन खास दिनों की जब वह रॉलिंग स्टोन से माउंटेन बन गए।

अच्छा दादा, एक बात बताओ तुम कभी किसी लड़की को प्रपोज किए हो?” मैने दादा के हाथ से चाय लेते हुए कहा।

“B।Com में एगो को बोले थे, I Love You” दादा ने कहा।

“फिर?”, मैने पूछा।

“फिर लड़की बोली OK। साला! हमको आज तक समझ नहीं आया कि I Love You का जवाब OK कैसे हुआ। यस नो, कुत्ता, कमीना, जानू, पागल कुछ भी बोलती; आइने में शक्ल या पांव का चप्पल दिखाती; लेकिन OK का क्या मतलब?” दादा ने चाय पीते हुए कहा।

“अबे हंसाओ मत, मर जाएंगे।“ चाय मेरे नाक तक चली गई थी।

“हां। हंस लो साले। अभी तुम्हारा फंसा है ना। अब हम हंसेंगे। पूरा भगवानदास हंसेगा।“ दादा ने चास का कुल्हड़ फेंकते हुए कहा।“

यह किस्सा बीएचयू के भगवानदास हॉस्टल लाइफ में दिन रात चलने वाले इश्क, रोमांच और जीवन बदलने वाले अनुभव की एक बानगी भर है। बनारस टॉकीज आपको ऐसे-ऐसे मोड़़ों से लेकर गुजरेगी जहां पर आप कभी खुद को खुल कर हंसने से रोक नहीं पाएंगे तो कहीं पर बाबा और दादा के तनाव का हिस्सा बनते नजर आएंगे। कहीं सुना था कि किताबें भी ट्रेन की तरह होती हैं जो आपको आपकी मंजिल के बींच आने वाले हर मोड़ से रुबरू कराते हुए आगे बढ़ती हैं। बनारस टॉकीज भी एक जीवंत ट्रेन की तरह है जो आपको हंसाती है रुलाती है और कभी-कभी आंखे नम भी कर देती है। तो पढ़ें क्‍यों‍कि पढ़ना जरूरी है।।।

अंत में अश्वि‍नी भाई को अनन्‍य धन्‍यवाद क्‍योंकि उन्‍होंने ही मुझे भगवानदास हॉस्‍टल की यात्रा करने की सलाह दी।

One thought on “Book Review: Banaras Talkies By Satya Vyas

  1. Kitabon ki bhi apni ek duniya hoti hai… vo humse baatein karti hai… humare unsuljhe sawalon ke jawab deti hai…kabhi gudgudati hai to kabhi rula kar jati hai…to kabhi hume apne sath us duniya me le jati hai jaha humara antarman humesha se jana chahta hai…jab bhi milti hai bahut kuch sikha kar jati hai…
    Hostel bhi ek aisi hi jagah hai jaha life me ek baar zaroor jana chahiye…hostel nahi ja skte to ghar se door akele doston ke sath rahne ka experience to zaroor lena chahiye… vo kya hai na, budhape me yahi to kisse kahani banaker sunane ke kaam aate hai…😉

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s