जरा कश्‍मीर के कुछ खाली घरों में झांकें…


Protests-Demonstrations-62कश्‍मीरी पंडितों के दर्द, विछोह और भयाक्रांतता को समझने के लिए आपको कश्‍मीर जाने या कोई किताब पढ़ने की जरूरत नहीं है। सरल मानवीय स्पन्दन और संवेदना इस दर्द के एक अंश को समझा जा सकता है। ऐसे दर्द और अन्‍याय के प्रति दबे हुए गुस्‍से के अहसास सालों बीतने के बाद भी ऐसे जीवंत रहते हैँ जैसे सुई या कांटा चुभने से होने वाला दर्द। आप कितने भी बड़े हो जाएं सुई चुभने पर होने वाली शारीरिक अनुभति को चाहकर भी नहीं बदल पाएंगे। इस प्राकृत सचेतना की तरह ही पैतृक जमीं से बिछुड़ने के दर्द को भी कितनी ही सफलताओं से कम नहीं किया जा सकता। जब भी कोई आपको सुई के दर्द से बचाने की राजनीति करता दिखाई पड़ता है तो आप मन ही मन तिलमिला उठते हैं। सुई चुभोए जाने वाले सभी पुराने संस्मरण आँखों के सामने फ़िल्म की मानिंद तैर उठते हैं। उस वक़्त आप मन ही मन कह उठते हैं की अब बस भी करें।

जहाँ घर हमारा था वो जमीं धस गई।
लंबे देवदार के पेड़ अब सब फर्नीचर चौखट हो गए,
वो घर के पास वाली झील अब पहले सी नहीं रही,
जहां घर हमारा था वो जमीं धस गई।

अगर आप अब भी इस दर्द को महसूस ना कर पाए हों तो स्वयं को इस कहानी का पात्र बना कर देखिए। फ़र्ज़ कीजिये की आप एक एमएनसी में काम करते हैं और इस नौकरी को आपने अथक मेहनत के बाद हासिल की है। इससे जुड़े पदलाभ आपकी ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए अत्यंत जरूरी हों। फिर एक दिन आपको पता चलता है की आपकी कंपनी में आपके देश के लोग धीरे धीरे कहीं और नौकरी खोज रहे हैं। लेकिन आप पहले की तरह सब सामान्य मानकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने men लगे रहते हैं। फिर एक दिन आप रोज की तरह दफ्तर पहुंचते हैं और आपको सुनने को मिलता है कि कुछ लोग पीठ पीछे आपको नौकरी से निकालने की साजिश रच रहे हैं। ऐसी खबरों को अफवाह मानकर आप अपना काम फिर शुरु कर देते हैं, लेकिन पाते हैं कि कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो हो रहा है जो डरावना है। इन डरों के बावजूद आप नौकरी बचाए रखने के लिए साथियों से पहले की तरह व्‍यवहार करते रहते हैं। दोस्तों पे भरोसा करते हैं की दुसरे मुल्क के सही लेकिन हैं तो ये आपके दोस्त ही।  कुछ दिनों बाद आप पाते हैं कि ऑफिस की महिलाकर्मियों ने आपसे बात करना बंद कर दिया है। और ऑफिस लन्च के दौरान बातचीत की भाषा अंग्रेजी की जगह विदेशी हो गयी है। अनौपचारिक संवाद अनजानी भाषा में होने लगे।  इसके बाद भी आप सभी से ऐसे बात करने की कोशिश करें कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

कुछ दिन बाद आपके कुछ दोस्‍त आपके प्रति चिंता जताते हुए दूसरी नौकरी ढूढ़ने का सुझाव देने लगें। और फिर एक दिन आपके साथ लंच शेयर करने वाले, सिगरेट के कश लगाने वाले, लिफ्ट लेने-देने वाले दोस्‍त आपको कॉलर से उठा कर अनर्गल आरोपों और लात घूंसों से सुशोभित करते हुए ऑफिस से बाहर कर दें।

अगले दिन चोटों को बैंडेज के पीछे और शर्म को पलकों के नीचे छुपाकर आप ऑफिस आ जाते हैं। लेकिन आपको पता चलता है कि ऑफिस के बाद आपको जान से मारने की साजिश की जा रही है। इसके बाद शाम को आपका सबसे जिगरी यार ऑफिस छूटने पर कुछ अंजान लोगों के साथ आपको जान से मारने की धमकी देता है। धमकी को असली प्रभाव देने के लिए आपको कुछ घाव भी देकर जाए। इसके बाद आप उसी रात अपनी बची हुई सेलेरी और ऑफिस ड्रॉअर में बीबी-बच्‍चों की तस्‍वीरें छोड़कर जान बचाने के लिए उस शहर से बहुत दूर भाग जाते हैं।

Kashmiri government employees scuffle with police during a prote
यह बात सोचने में थोड़ी डरावनी लग सकती है लेकिन अगर आपने इस दुखदाई कल्‍पना में खुद के असम्‍मान और डर के भाव को महसूस किया है तो आपको उन दो से तीन लाख कश्‍मीरियों के दर्द को समझने में मदद मिल सकती है जो सर्द रातों में जान बचाने के लिए अंतिम सांस तक भागे थे।

इस दर्द को महसूस करने के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य की उन पार्टियों के बयानों पर नजर डालिए जो कहते हैं कि अगर कश्‍मीरी पंडितों को घाटी में वापस आना है तो जैसे बुला रहे हैं वैसे ही आना होगा। 1989 से पहले की तरह कश्‍मीरी मुस्लिमों के साथ मिल-जुलकर रहना होगा। ये ऐसा होगा कि आपसे कहा जाए कि जाइए उसी दोस्‍त के जूनियर बनकर काम करिए जो आपको लात मारकर बॉस बना हो।

हद तो तब होती है जब आपको बिना पूर्व सूचना के कम्पनी छोड़ने के लिए माफ़ी मांगने को कहा जाये।

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