देखो! कानपुर में ऐसे आती है एंबुलैंस…


samajwadi-ambulance-53f822bअपनी कंट्री में जनता की भरपूर मात्रा देखते हुए पूरे ब्रह्मांड की कंपनियों ने अपने अपने घौसले बना लिए हैं। पिज्‍जा से लेकर कंडोम तक सब फोन पर मिलेगा।  कस्‍सम से कभी ट्राई तो कीजिए अपनी दिल्‍ली में बहुतेरी ऐसी कंपनियां भी हैं जो आधी रात में सुट्टा तक बेच रही हैं. और तो और घर आके दे रही हैं. लेकिन सरकारी एंबुलेंस के केस में ऐसा नहीं है दोस्‍त। अभी कुछ दिन हुए ऑ‍फिस से पूरा दिन टाइपिंग करके बाहर निकला ही था कि तभी एक चौराहे पर दो-तीन लोगों को गुंडे फिल्‍म के रणवीर ओर अर्जुन कपूर की तरह लड़ते देखा। गाड़ी चलाते-चलाते ऐसा लगा कि साला एक ना एक तो जाएगा। फिर भी गाड़ी की स्‍पीड स्‍लो करके आगे बढ़ा जा रहा था और नजरें लड़ाई पे थीं। कानपुर में लड़ाई किसी की हो देखता पूरा मोहल्‍ला है, मोहल्‍ला तो मोहल्‍ला, रिश्‍तेदार भी पूरे मामले को चटाके लगा के सुनते हैं। फिर देखते-देखते एक सिरकिटी सा बांस जैसी कदकाठी वाला बंदा जमीन चाट गया। गालियों वाला गुस्‍सा पूरे उफान पर था। आने-जाने वाले लोग भी फ्री का सिनेमा देख रहे थे। किसी को मार खाता देख बदन में एक अजीब सनसनाहट होती है। उसी सनसनाहट का अनुभव करते हुए लोगों का मजमा लगना शुरु हो गया था। लेकिन मेरी नजर जमीन पर पड़े उस बंदे पे थी जो नाक में घूंसा खाने के बाद बेहोश हो गया था। नाक से झल-झल खून बह रहा था। मुझे लगा कि कहीं मर ना जाए बेचारा। एक बार लगा कि साला हीरो की तरह उतरकर इसे हॉस्पिटल पहुंचाया जाए, फिर याद आया कि ऐसे केसेज में अक्‍सर बचाने वाला फंस जाता है। नया-नया पत्रकार हुआ था और पुलिस कचहरी से अभी भी डर ही लगता था। एक बार गाड़ी किनारे लगाई भी फिर सोचा अगर बंदा मर गया होगा तो फालतू की लेथन होगी और कल फिर दफ्तर पहुंचना है। साला ऑफिस से कोई सही गवाही देने भी नहीं आएगा। ऑफिस किंग्‍सलैंडिंग जैसा लगता है। लेकिन बंदे को तो बचाना था ही तो किनारे खड़े होकर एंबुलेंस को फोन मिला दिए। अब आगे देखिए कि यूपी में मरीज तक कैसे पहुंचती है एंबुलेंस।

अनंत प्रकाश – हैलो, मैं मरियमपुर चौराहे, कानपुर से बोल रहा हुं, यहां एक बंदा जमीन पे पड़ा हुआ है, नाक से खून बह रहा है। जितना जल्दी हो सकें पहुचें एंबुलेंस भेजा।

एंबुलेंस कंट्रोल रूम – जी, कहां हुआ है एक्सीडेंट?

अनंत प्रकाश – जी मैं मरियमपुर चौराहे से बोल रहा हुं, यहां एक मेडिकल स्टोर है और लड़का जमीन पर पड़ा हुआ है। प्लीज आइए!
एंबुलेंस कंट्रोल रूम – जी, प्लीज बताएं कि आप कानपुर नगर या देहात किस जिले से बोल रहे है?
अनंत प्रकाश – मुझे नहीं पता है कि ये जगह कौन जिले में आती है लेकिन आप प्लीज किसी नजदीकी अस्पताल से एंबुलेंस भेजिए।
कंट्रोल रूम – देखि‍ए! आसपास खड़े लोगों से पता करो कि आप कहां खड़े हो, किस जिले में हुई है। इसके बाद दुबारा कॉल करो। यह कहकर फोन काट दिया गया। इसके बाद मैने आसपास खड़े लोगों से जानकारी इकठ्ठी करके दुबारा फोन लगाया।
अनंत प्रकाश – हैलो, मरियमपुर चौराहा कानपुर नगर में आता है और अब प्लीज एंबुलेंस भेजो। (मन से तो कसम से गालियां निकल रही थीं)
कंट्रोल रूम – धन्यवाद महोदय, लेकिन कृप्या बताएं कि घटनास्थल के सबसे नजदीक में कौन सा अस्पताल है-
अनंत प्रकाश – जी, मरियमपुर अस्पताल- (मैने पूरे आत्‍मविश्‍वास से कहा)
कंट्रोल रूम – (लगभग चिल्लाते हुए अंदाज में) कृप्या सरकारी अस्पताल बताएं। (ऐसे बोला जैसे उसने गलत एड्रेस पे एंबुलेंस भेज दी हो-)
अनंत प्रकाश – जी, हैलट- लाला लाजपत राय…
कंट्रोल रूम– यह घटनास्थल से कितना दूर है?
अनंत प्रकाश – जी, कुछ तीन किलोमीटर-
कंट्रोल रूम – होल्ड पर रहो, हम आपकी बात एंबुलेंस वाले से करा रहे हैं।
अनंत प्रकाश – (सरप्राइज्ड होते हुए) जी, जरूर,
कंट्रोल रूम – हैलो, हैलट एंबुलेंस कर्मी सपोर्ट स्टाफ, मरियमपुर के पास एक मरीज है जरा बात करो।
हैलट एंबुलेंस कर्मी – जी, बताएं,
अनंत प्रकाश –जी, मरियमपुर चौराहे, कानपुर से बोल रहा हुं, यहां एक बंदा जमीन पे पड़ा हुआ है, नाक से बहुत जोर खून बह रहा है। जित्ता जल्दी हो सकें पहुचो। (अब मैं पूरी तरह से गुस्‍से में बोल रहा था क्‍योंकि एंबुलेंस भेजने की जगह ड्रामे कर रहा था कंट्रोल रूम वाला-)
हैलट एंबुलेंस कर्मी – (चिल्लाते हुए) तुम्हे पता नहीं है कि मरियमपुर चौराहे के बगल में फजलगंज सरकारी अस्पताल है। हमें काहे काल करवा रहे हो।
अनंत प्रकाश – अब एंबुलेंस भेजोगे या‍ बस बात करोगे।
कंट्रोल रूम (शुद्ध हिंदी में थोड़ा कड़क आवाज में) – महोदय आप थोड़ा पेशेंस रखें फजलगंज से आपकी बात करा रहे हैं।
कंट्रोल रूम– हैलो, फजलगंज एंबुलेंस कर्मी सपोर्ट स्टाफ, मरियमपुर में एक मरीज है जरा बात कीजिए।
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी– जी, बताइए-
अनंत प्रकाश – जी, मरियमपुर चौराहे, कानपुर से बोल रहा हुं, यहां एक बंदा जमीन पे पड़ा है, नाक से खून बह रहा है। बहुत खून बह रहा है- प्लीज जितना जल्दी हो सकें, आ जाइए- (इस बार में शायद चौथी बार एक ही बात कह रहा था लेकिन एंबुलेंस का नामौनिशान नहीं था-)
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी- जी, आप वहीं रुकिए, एंबुलेंस पहुंच रही है।
अनंत प्रकाश – पर मेरा, यहां रहना क्‍यों जरूरी है- मुझे ऑफिस पहुंचना है। (मैनें चौंकते हुए पूछा-)
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी – जी, आप इतना महान काम कर रहे हो, थोड़ा रुक जाओ, पूरा कर लो- जिससे एंबुलेंस पहुंच सके।
अनंत प्रकाश – समझो ना यार- ऑफिस ना पहुंचा तो नौकरी जाती रहेगी-
फजलगंज एंबुलेंस कर्मी – जी, ऐसे में एंबुलेंस नहीं पहुंच पाएगी क्योंकि घटनास्थल पर इनफॉर्मर को अवेलेबल रहना जरूरी है।

फोन कट…

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