Film Review: ‘Masaan’ जिंदगी जैसी एक फ‍िल्म


Masaan film review
Masaan film review

मसान पर कुछ लिखने से पहले जरूरी है कि इस फिल्म को ठीक ढंग से समझा जाए, इसकी प्र‍कृति की विवेचना की जाए। यह बताया जाये कि आखिर यह फिल्म किन मायनों में खास है और किस तरह मसान फिल्म-दर-फिल्म बदलते भारतीय सिनेमा के बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरती है। भारत और खासकर बॉलीवुड में सिनेमा को सिद्धांतता: भारतीय जनमानस का अक्स दिखाने वाला आईना कहा जाता है। लेकिन बॉलीवुड की जमीन पर उगने वाली वाली बहुसंख्यक फिल्मों ने इसे एक ऐसे जादुई आईने में परिवर्तित कर दिया है जिसमें वह दिखाई पड़ता है जो हमारा जनमानस देखना चाहता है। इसमें चकाचौंध है, फुंके हुए सपने हैं, फार्मूले हैं और रेस भी। लेकिन इसके ठीक उलट साहित्य शब्दों के जरिए अपने पाठकों को उनकी जिंदगी का एक्सरे दिखाने का प्रयास करता नजर आता है। फिर बारी आती है कविता की तो यह एक इंजेक्शन की तरह पाठक को उस जगह पहुंचा देती हैं जहां उसमें थोड़ी बहुत संवेदना बची रह गई है।

अब बात करते हैं कि आखिर मसान है क्या। नीरज घ्यावन और वरुण ग्रोवर की फिल्म ‘मसान’ फिल्म, गद्य और काव्य विधाओं का एक ऐसा संगम है जो भारतीय सिनेमा के लिए किसी कुंभ से कम नहीं हैं। यह वह मोड़ है जहां से एक नया दौर शुरु होने की प्रबल संभावना दिखाई पड़ती है। फिल्म का पहला फ्रेम ‘बृज नारायण चकबस्त’ की नज्म “ज़िन्दगी क्या है, अनासिर में ज़हूर-ए-तरतीब, मौत क्या है, इनीं अज़ा का परेशाँ होना।” से शुरु होती है। दूसरे फ्रेम से ही फिल्म आपको उस जिंदगी में ले जाती है जहां एक सेल्फ डिपेंड लड़की पहली बार सैक्स का अनुभव ठीक से लेने के लिए कंप्यूटर पर ब्लूफिल्म देख रही है। ठीक! यहीं से आप फिल्म में उतर जाते हैं। कहीं जाति, न्याय और प्रशासन की चोट खाते इन युवाओं के टूटते चेहरों में आप खुद को देखते हैं। तो कहीं पहली बारिश की तरह ताजे इश्क में पड़ते हुए चेहरों को गुलाब होते हुए भी देखते हैं। असल बात यह है कि फिल्म में नायक नहीं है। फिल्म का परिवेश ही नायक है जो कि एक अक्स है हमारी आपकी जिंदगी का। कथानक की बात करें तो यह उस दौर की फिल्म है जब भारतीय युवा तकनीक के संमदर में गोते लगाता हुआ सामाजिक कुरितियों और बंधनों को तोड़कर एक स्वछंद पक्षी की तरह उड़ जाने को आतुर है। वह हर धारा, प्रवाह और उसके मूल को समझने की कोशि‍श में है। वह जानना चाहता है कि आखि‍र ऐसा है तो क्यों है और नहीं है तो क्यों नहीं। लेकिन कुछ पंख फड़फड़ाने पर ही वह जाति व्यवस्था, न्याय और प्रशासन के अदृश्य पिंजर में कैद हो जाता है। इससे उसकी मासूमियत तो मरती है लेकिन जिंदगी के प्रति उसका नजरिया वही रहता है।

अभिनय की बात करें तो दीपक चौधरी के रोल में विकी कौशल, देवी पाठक के रोल में रिचा चढ्ढा और शालू गुप्ता के रोल में श्वेता त्रिपाठी ने बिलकुल अपनी टीनऐज को एक बार फिर से जी डाला है। जिस तरह अपनी छत पर टहलते हुए शालू फोन पर अपने नए-नए बने दोस्त दीपक को सितारों को आंखों में महफूज रख लो… जैसे जाने पहचाने शेर सुनाती हैं वह सच्चाई के काफी करीब नजर आती हैं। यह दोस्ती शालू को वह स्पेस देती है जिसमें वह खुद को चाहने वाले शख्स से उस जुबां में बात कर सकती है जिसे वह पसंद करती हैं। वह शायरी कह सकती हैं और निदा फाजली एवं बशीर बद्र के प्रति अपने प्रेम का इजिहार कर सकती हैं। इसी तरह जब फोन पर दूसरी ओर शेर और नज्मों से दूर दूर तक नाता ना रखने वाले दीपक मुस्कुराकर बोलते हैं कि समझ नहीं आया, पर बहुत अच्छा था, अपनी दोस्त को अपनी बात पर यकीन दिलाने के लिए वह स्वाभाविक रूप से कहते हैं ‘कसम से बहुत ही अच्छा है।’ यह सीन देखकर सिनेमाहॉल में बैठे छोटे शहरों के मिडिल क्लास युवा जरूर मुस्कुरा देते हैं। वह दौर याद आ जाता है जब नोकिया 3315 पर एसएमएस में शायरी भेज भेजकर प्यार का इजहार होता था और लड़के-लड़कियां बाकायदगी के साथ इन शायरियों की डायरी मैंटेन करते थे। तब वो मोहब्बत भी शायरियों जितनी पाक होती थी। क्योंकि आशिक शायरी भेजने से पहले उसके असर और छुअन को टटोलने का प्रयास जरूर करते थे। संजय मिश्रा की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है क्योंकि उन्होने विद्याधर पाठक के रोल को जीवंत कर दिया है। विद्याधर पाठक की पात्र रचना अपने आप में एक बायोपिक सी जान पड़ती है उस संस्कृत प्रोफेसर के बारे में जो हालातों की मार से प्रोफेसरी छोड़, कर्मकांड और जूआ तक खेल अपने सभी मूल्यों को गंगा में बहाने को मजबूर दिखाई पड़ता है। इंस्पेक्टर के बारे में इतनी सी बात है कि इंस्पेक्टर की बेटी को फिल्म में देखते ही दर्शक के मन में सहज अपेक्षा पैदा होती है कि अब कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे अपनी बेटी के किसी कांड में फंसने पर फिल्म के एकमात्र विलेन को उसके किये का अहसास हो जाएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं क्योंकि आम जिंदगी में भी ऐसा नहीं होता। फिल्म में वह ही दिखता है जो एक सामान्य व्यक्‍त‍ि अपनी सामान्य सी शक्तियों से देख सकता है। फिल्म ईश्वरीय न्याय की प्रामाणिकता स्थापित करने की जगह यर्थाथ दिखाती है।

फिर फिल्म में एक दौर आता है जब अपने हाथों से सबकुछ बिखरता हुआ दिखने लगता है। फिल्म के पात्रों के साथ-साथ सीटों से चिपके हुए दर्शकों की आंखें भी जर्रा-जर्रा आंसुओं में बहती दिखाई देती हैं। यह वह क्षण हैं जब फिल्म साहित्य में घुसकर कविता हो जाती है। कुछ दृश्य इतने पॉवरफुल हैं कि सीट पर बैठे मजबूत से मजबूत आदमी को रोने को मजबूर कर दे। पर्दे पर दर्द से कराहते पात्रों को देखने से आप अंदर तक हिल जाते हैं। फिल्म की यूएसपी यह है कि यह जिंदगी को जस का तस दिखा देती है और फिल्म खत्म होते होते पर्दे से आपके भीतर उतर जाती है।

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