आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बताते हैं गोरक्षकों की मनस्थिति


hazariधार्मिक अतार्किकता से भरे जिस तथ्यविहीन देश काल में हम जी रहे हैं उसमें दो बातें अहम हैं – पहली स्वयं के इतिहास और भविष्य के संबंध में पूर्ण अरुचि, दूसरा भौतिक उपभोग का उत्तरोत्तर महिमामंडन. यहां मैंने अतार्किकता से पहले धार्मिक और देशकाल से पहले तथ्यविहीन विशेषण का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि धर्म को छोड़ दें तो हमारे समाज का एक बड़ा तबका तर्क और तथ्य आधारित हर विधान और वस्तु को सहर्ष स्वीकृति देता है.

इसमें 70 के दशक के बाद से पश्चिमी देशों में विकसित घरेलू उपयोग के साधनों से लेकर मौसम, युद्ध और आपसी संवाद से जुड़े फेसबुक जैसे माध्यम शामिल हैं. इसके बावजूद इसी समाज का आधुनिक युवा गो मांस, पवित्र ग्रंथों के अपमान, मस्जिद और मंदिरों में भौंपू और मांस के टुकड़ें फेंके जाने के बाद बर्बर जातियों की माफिक सैकड़ों की जमात में असहायों को मौत के घाट उतारने में जरा भी नहीं झिझकता.

ऐसे में प्रश्न उठता है कि कैसे इस जमाने का युवा तार्किकता से भरे समाज में जीते हुए भी बनिस्बत अपने पापों पर शर्मिंदा होने के बजाए स्वयं को भगत सिंह से प्रेरित बताता है और भारत माता के चरणों में समर्पित बताता है. क्यों एक हिंदू ह्रदय सम्राट को गोरक्षकों की निंदा करने पर अगले चुनाव में अंजाम भुगतने की धमकी मिलती है. ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध घर जोड़ने की माया में दिए हैं.

पढ़िए क्या कहते हैं द्विवेदी जी –

वह कौन सी वस्तु है जो अनुयायियों को अपने गुरु के उपदेशों के प्रतिकूल चलने को बाध्य करती है? यह कहना अनुचित है कि अनुयायी जानबूझकर अपने धर्मगुरु के वचनों की अवमानना करते हैं, वस्तुत: अनुयायी धर्मगुरु की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ही बहुधा गलत मार्ग ग्रहण करने लगते हैं. जो लक्ष्य के साथ मेल खाते और बहुधा उसके विरोधी होते हैं. हजरत, ईसा मसीह अहिंसा मार्ग के प्रवर्तक थे; परंतु उनकी महिमा संसार में प्रतिष्ठित करने के लिए सौ-सौ वर्षों तक रक्त की नदियां बहती रही हैं. हमें इतिहास को ठंडे दिमाग से समझना चाहिए. सच्चाई का सामना करना चाहिए.

जब किसी महापुरुष के नाम पर कोई संप्रदाय चल पड़ता है तो आगे चलकर उसके सभी अनुयायी कम बुद्धिमान ही होते हैं, ऐसी बात नहीं है. कभी-कभी शिष्य परंपरा में ऐसी भी शिष्य निकल आते हैं जो मूल संप्रदाय प्रवर्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं. फिर भी संप्रदाय स्थापना का अभिशाप ये है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिंतन कम हो जाता है. संप्रदाय की प्रतिष्ठा ही जब सबसे बड़ा लक्ष्य हो जाता है तो सत्य पर से दृष्टि हट जाती है. प्रत्येक बड़े यथार्थ को संप्रदाय के अनुकूल लगाने की चिंता ही बड़ी हो जाती है इसका परिणाम यह होता है कि साधन की शुद्धि की परवाह नहीं की जाती. परंतु यह भी ऊपरी बात है. साधन की शुद्धि की परवाह न करना भी असली कारण नहीं है. वह भी कार्य है; क्योंकि साधन की अशुचिता को सत्य भ्रष्ट होने का कारण मान लेने पर भी यह प्रश्न बना ही रह जाता है कि विद्वान और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी साधन की अशुचिता के शिकार क्यों बन जाते हैं? कोई ऐसा बड़ा कारण होना चाहिए जो बुद्धिमानों की अक्ल पर आसानी से पर्दा डाल देता है. जहां तक कबीरदास का संबंध है उन्होंने अपनी ओर से इस कारण की ओर इशारा किया है.

घर जोड़ने की अभिलाषा ही इस प्रवृत्ति का मूल कारण है. लोग केवल सत्य को पाने के लिए ज्यादा देर तक टिके नहीं रह सकते. उन्हें धन चाहिए, मान चाहिए, यश चाहिए, कीर्ति चाहिए. ये प्रलोभन सत्य कही जाने वाली वस्तु से अधिक बलवान साबित हुए हैं. कबीर दास ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जो उनके मार्ग पर चलना चाहता हो वो अपना घर पहले फूंक दे.

कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना सो चलै हमारे साथ

घर फूंकने का अर्थ है धन और मान का मोह त्याग देना, भूत और भविष्य की चिंता छोड़ देना और सत्य के सामने जो कुछ भी खड़ा हो उसे निर्ममतापूर्वक ध्वंस कर देना. पर सत्यों का सत्य यह है कि लोग कबीरदास के साथ चलने की प्रतिज्ञा करने के बाद भी घर नहीं फूंक सके. मठ बने, मंदिर बने, प्रचार के साधनों के आविष्कार किए गए और उनकी महिमा बताने के लिए अनेक पोथियां रची गईं. इस बात का बराबर प्रयत्न होता रहा और अपने इर्द-गिर्द के समाज में कोई यह न कह सके कि इनका अमुक कार्य सामाजिक दृष्टि से अनुचित है; अथार्त विद्रोही बनने की प्रतिज्ञा भूली गई; आगे चलकर गुरु-पद पाने के लिए हाईकोर्ट की भी शरण ली गई. यह कह देना कि यह सब गलत हुआ, कुछ विशेष काम की बात नहीं हुई. क्यों यह गलती हुई? माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए. यह सत्य है. कबीर पंथ का नाम तो यहां इसलिए आ गया क्योंकि ये सारी बातें कबीरपंथी साहित्य पढ़ते हुए मेरे मन में आईं हैं.नहीं तो सभी महापुरुषों के प्रवर्तित मार्ग की यही कहानी है. माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं. यह इतिहास की चिरोद्घोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है.

कारण साफ और सामने है. जब लोगों को एक तस्वीर दिखा दी जाती है कि अमुक धर्म औऱ संस्कृति संकट में है. पुराने जंग लगे हथियारों को निकालने का वक्त आ गया है तो लोग सोचना छोड़कर उनसे जो कहा जाता है वो करने पर उतारू हो जाते है. उन्हें स्वत: लगता है कि भारत माता, धर्म-संस्कृति और गो माता की रक्षा के लिए अगर किसी की हत्या भी की जाए तो उनके लिए वो हत्या नहीं वध है. शत्रुओं का नाश है.

धर्म और संस्कृति की रक्षा के मार्ग पर बुद्धि किनारे हट जाती है. सर पर एक धुन सवार होती है पंथ बचाने की. ऐसे में आपके विश्वास के प्रतिकूल या उससे जरा सी हटकर उठने वाली हर आावाज आपका खून खौला देती है. इस आवाज को दबाने के लिए सोशल मीडिया से लेकर व्यक्तिगत जीवन में भी आप एक जानवर की भांति रक्षात्मक मुद्रा में प्रहार करने को प्रेरित होते हैं. आपकी ये मुद्रा सोचने की शक्ति छीन कर आपको एक रौ में बहाने लगती है जैसे बरसाती नदियां बहती हैं. रास्ते में आने वाली हर चीज को नष्ट करती हुईं. ऐसे में अगर आपका धार्मिक गुरु या नेता जिसने आपको इस स्थिति में पहुंचाया है, मार्ग परिवर्तन के लिए अगर आपको रुकने का आदेश देगा तो आप उस आदेश की अवहेलना करके उसे कुचलते हुए आगे बढ़ जाएंगे क्योंकि आप सिर्फ भाग रहे हैं कहीं के लिए नहीं बल्कि कहीं से.कहीं पहुंचने के लिए. लेकिन कहां ये आपको पता नहीं क्योंकि आपने कंधों पर घर जोड़ने की जिम्मेदारी ले रखी है. और, इसमें साधन की शुचिता को आप आड़े नहीं आने दे सकते.

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