शहाबुद्दीन की रिहाई के साथ ‘चंदू-जेएनयू’ युग का अंत


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मुझे अपनी छवि बदलने की जरूरत नहीं, जनता ने 26 से मुझे उसी रूप में स्वीकार किया है जैसा मैं हूं, लालू प्रसाद यादव मेरे नेता हैं और नीतीश कुमार परिस्थितियों की वजह से बिहार के सीएम हैं.

ये शब्द थे 11 सालों बाद जेल से रिहा होकर 1300 गाड़ियों के काफिले में सवार होते पूर्व आरजेडी सांसद शहाबुद्दीन के.

बिहार के बाहूबली नेता शहाबुद्दीन पर राजीव शर्मा हत्याकांड समेत पूर्व जेएनयू अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद और उनके साथी श्याम नारायण यादव की हत्या का भी आरोप है.

अक्सर एक ही समय पर दो अलग-अलग स्थानों पर दो घटनाएं घट रही होती हैं जिनका एक-दूसरे से कोई सीधा संबंध नहीं होता. लेकिन अगर समय की पर्तों को खोलकर देखें तो ये पता चलता है कि दोनों घटनाएं किस तरह एक दूसरे से जुड़ी होती हैं.

इन दोनों घटनाओं में यही संबंध है. ये दो घटनाएं हैं – जेएनयू छात्रसंघ चुनाव 2016 और चंदू के हत्यारे शहाबुद्दीन की रिहाई.

जेएनयू स्टूडेंट्स में कॉमरेड चंदू के नाम से चर्चित चंद्रशेखर प्रसाद ने अपनी स्पीच में कहा था – 

हमारी आने वाली पीढ़ियां सवाल करेंगी, वे हमसे पूछेंगी कि जब नई सामाजिक ताकतें उभर रही थीं तो आप कहां थे, वे पूछेंगी कि जब लोग जो हर दिन जीते मरते हैं, अपने हकों के लिए संघर्ष कर रहे थे, आप कहां थे जब दबे-कुचले लोग अपनी आवाज उठा रहे थे, वे हम सबसे सवाल करेंगीं.

 

ये स्पीच एंटी-बुलिज्म, एंटी-पेसिविज्म और अवेकनिंग है. आप जेएनयू को जानते हों या न जानते हों, वहां की हवा में तैरते वाद-विवाद और नारों से आपका ताल्लुक हो या न हो लेकिन अगर आपने जिंदगी में कभी भी बुलिज्म को बर्दाश्त किया है तो आप इस जेएनयू के विचार से सहमत हुए बिना नहीं रह सकते.

जेएनयू सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं बल्कि एक आइडिया है…आइडिया एक ऐसे शिक्षण संस्थान को रचने का जहां से निकले छात्र देशभर में सुनने, संवाद करने और समस्याओं के क्रिएटिव सॉल्यूशन निकालने में विश्वास रखें.

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इस स्पीच के हर शब्द को हम क्लियरली सुन सके क्योंकि कॉमरेड चंदू के दौर का जेएनयू कहने-सुनने में यकीन रखता था. संवाद के जरिए दूसरे पक्ष को खुद से सहमत करने में यकीन में रखता था.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में खुद चंद्रशेखर की बनाई पार्टी अॉल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन ने तमाम विरोधों के बावजूद खुद के वजूद को बचाने के लिए सीपीआई (एमएल) से जुड़ी पार्टी स्टूडेंट फेडरेशन अॉफ इंडिया के साथ गठबंधन कर लिया. तर्क दिया गया कि ये गठबंधन जेएनयू की फासिस्ट ताकतों से रक्षा के लिए किया गया है.

लेकिन चंद्रशेखर प्रसाद ने खुद कहा है कि जहां तक हमारे जैसे लोगों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बात है तो वो ये है कि हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी जिसको डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं और इसीलिए अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की होगी न कि जेएनयूएसयू चुनाव में गांठ जोड़कर जीतने या हारने की महत्वाकांक्षा होगी

आज से 20 साल बाद अगर आप आज के जेएनयू की प्रेसीडेंशियल डिबेट्स को यूट्यूब पर सुनने की कोशिश करेंगे तो आपको हाईडेफिनेशन स्पीच वाले वीडियो मिलेंगे लेकिन अनफॉर्चूनेटली आप आज की स्पीचों के एक शब्द को ठीक से नहीं सुन पाएंगे.

आप सुन पाएंगे उन खोखली आवाजों को जो चंदू की सोच के विपरीत जेएनयूएसयू चुनाव जीतने के लिए गठबंधन करके चुनावी विरोधी एवीबीपी के खिलाफ बोलती नजर आएंगी. आवाजें जो गैर-सामाजिक विचारों के खिलाफ नहीं चंद संस्थाओं और नेताओं के खिलाफ बोलती नजर आएंगी. क्योंकि शहाबुद्दीन की रिहाई के साथ जेएनयू-चंदू युग का भी अंत हो गया है.

 

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