आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बताते हैं गोरक्षकों की मनस्थिति


hazariधार्मिक अतार्किकता से भरे जिस तथ्यविहीन देश काल में हम जी रहे हैं उसमें दो बातें अहम हैं – पहली स्वयं के इतिहास और भविष्य के संबंध में पूर्ण अरुचि, दूसरा भौतिक उपभोग का उत्तरोत्तर महिमामंडन. यहां मैंने अतार्किकता से पहले धार्मिक और देशकाल से पहले तथ्यविहीन विशेषण का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि धर्म को छोड़ दें तो हमारे समाज का एक बड़ा तबका तर्क और तथ्य आधारित हर विधान और वस्तु को सहर्ष स्वीकृति देता है.

इसमें 70 के दशक के बाद से पश्चिमी देशों में विकसित घरेलू उपयोग के साधनों से लेकर मौसम, युद्ध और आपसी संवाद से जुड़े फेसबुक जैसे माध्यम शामिल हैं. इसके बावजूद इसी समाज का आधुनिक युवा गो मांस, पवित्र ग्रंथों के अपमान, मस्जिद और मंदिरों में भौंपू और मांस के टुकड़ें फेंके जाने के बाद बर्बर जातियों की माफिक सैकड़ों की जमात में असहायों को मौत के घाट उतारने में जरा भी नहीं झिझकता.

ऐसे में प्रश्न उठता है कि कैसे इस जमाने का युवा तार्किकता से भरे समाज में जीते हुए भी बनिस्बत अपने पापों पर शर्मिंदा होने के बजाए स्वयं को भगत सिंह से प्रेरित बताता है और भारत माता के चरणों में समर्पित बताता है. क्यों एक हिंदू ह्रदय सम्राट को गोरक्षकों की निंदा करने पर अगले चुनाव में अंजाम भुगतने की धमकी मिलती है. ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध घर जोड़ने की माया में दिए हैं.

पढ़िए क्या कहते हैं द्विवेदी जी –

वह कौन सी वस्तु है जो अनुयायियों को अपने गुरु के उपदेशों के प्रतिकूल चलने को बाध्य करती है? यह कहना अनुचित है कि अनुयायी जानबूझकर अपने धर्मगुरु के वचनों की अवमानना करते हैं, वस्तुत: अनुयायी धर्मगुरु की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ही बहुधा गलत मार्ग ग्रहण करने लगते हैं. जो लक्ष्य के साथ मेल खाते और बहुधा उसके विरोधी होते हैं. हजरत, ईसा मसीह अहिंसा मार्ग के प्रवर्तक थे; परंतु उनकी महिमा संसार में प्रतिष्ठित करने के लिए सौ-सौ वर्षों तक रक्त की नदियां बहती रही हैं. हमें इतिहास को ठंडे दिमाग से समझना चाहिए. सच्चाई का सामना करना चाहिए.

जब किसी महापुरुष के नाम पर कोई संप्रदाय चल पड़ता है तो आगे चलकर उसके सभी अनुयायी कम बुद्धिमान ही होते हैं, ऐसी बात नहीं है. कभी-कभी शिष्य परंपरा में ऐसी भी शिष्य निकल आते हैं जो मूल संप्रदाय प्रवर्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं. फिर भी संप्रदाय स्थापना का अभिशाप ये है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिंतन कम हो जाता है. संप्रदाय की प्रतिष्ठा ही जब सबसे बड़ा लक्ष्य हो जाता है तो सत्य पर से दृष्टि हट जाती है. प्रत्येक बड़े यथार्थ को संप्रदाय के अनुकूल लगाने की चिंता ही बड़ी हो जाती है इसका परिणाम यह होता है कि साधन की शुद्धि की परवाह नहीं की जाती. परंतु यह भी ऊपरी बात है. साधन की शुद्धि की परवाह न करना भी असली कारण नहीं है. वह भी कार्य है; क्योंकि साधन की अशुचिता को सत्य भ्रष्ट होने का कारण मान लेने पर भी यह प्रश्न बना ही रह जाता है कि विद्वान और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी साधन की अशुचिता के शिकार क्यों बन जाते हैं? कोई ऐसा बड़ा कारण होना चाहिए जो बुद्धिमानों की अक्ल पर आसानी से पर्दा डाल देता है. जहां तक कबीरदास का संबंध है उन्होंने अपनी ओर से इस कारण की ओर इशारा किया है.

घर जोड़ने की अभिलाषा ही इस प्रवृत्ति का मूल कारण है. लोग केवल सत्य को पाने के लिए ज्यादा देर तक टिके नहीं रह सकते. उन्हें धन चाहिए, मान चाहिए, यश चाहिए, कीर्ति चाहिए. ये प्रलोभन सत्य कही जाने वाली वस्तु से अधिक बलवान साबित हुए हैं. कबीर दास ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जो उनके मार्ग पर चलना चाहता हो वो अपना घर पहले फूंक दे.

कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना सो चलै हमारे साथ

घर फूंकने का अर्थ है धन और मान का मोह त्याग देना, भूत और भविष्य की चिंता छोड़ देना और सत्य के सामने जो कुछ भी खड़ा हो उसे निर्ममतापूर्वक ध्वंस कर देना. पर सत्यों का सत्य यह है कि लोग कबीरदास के साथ चलने की प्रतिज्ञा करने के बाद भी घर नहीं फूंक सके. मठ बने, मंदिर बने, प्रचार के साधनों के आविष्कार किए गए और उनकी महिमा बताने के लिए अनेक पोथियां रची गईं. इस बात का बराबर प्रयत्न होता रहा और अपने इर्द-गिर्द के समाज में कोई यह न कह सके कि इनका अमुक कार्य सामाजिक दृष्टि से अनुचित है; अथार्त विद्रोही बनने की प्रतिज्ञा भूली गई; आगे चलकर गुरु-पद पाने के लिए हाईकोर्ट की भी शरण ली गई. यह कह देना कि यह सब गलत हुआ, कुछ विशेष काम की बात नहीं हुई. क्यों यह गलती हुई? माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए. यह सत्य है. कबीर पंथ का नाम तो यहां इसलिए आ गया क्योंकि ये सारी बातें कबीरपंथी साहित्य पढ़ते हुए मेरे मन में आईं हैं.नहीं तो सभी महापुरुषों के प्रवर्तित मार्ग की यही कहानी है. माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं. यह इतिहास की चिरोद्घोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है.

कारण साफ और सामने है. जब लोगों को एक तस्वीर दिखा दी जाती है कि अमुक धर्म औऱ संस्कृति संकट में है. पुराने जंग लगे हथियारों को निकालने का वक्त आ गया है तो लोग सोचना छोड़कर उनसे जो कहा जाता है वो करने पर उतारू हो जाते है. उन्हें स्वत: लगता है कि भारत माता, धर्म-संस्कृति और गो माता की रक्षा के लिए अगर किसी की हत्या भी की जाए तो उनके लिए वो हत्या नहीं वध है. शत्रुओं का नाश है.

धर्म और संस्कृति की रक्षा के मार्ग पर बुद्धि किनारे हट जाती है. सर पर एक धुन सवार होती है पंथ बचाने की. ऐसे में आपके विश्वास के प्रतिकूल या उससे जरा सी हटकर उठने वाली हर आावाज आपका खून खौला देती है. इस आवाज को दबाने के लिए सोशल मीडिया से लेकर व्यक्तिगत जीवन में भी आप एक जानवर की भांति रक्षात्मक मुद्रा में प्रहार करने को प्रेरित होते हैं. आपकी ये मुद्रा सोचने की शक्ति छीन कर आपको एक रौ में बहाने लगती है जैसे बरसाती नदियां बहती हैं. रास्ते में आने वाली हर चीज को नष्ट करती हुईं. ऐसे में अगर आपका धार्मिक गुरु या नेता जिसने आपको इस स्थिति में पहुंचाया है, मार्ग परिवर्तन के लिए अगर आपको रुकने का आदेश देगा तो आप उस आदेश की अवहेलना करके उसे कुचलते हुए आगे बढ़ जाएंगे क्योंकि आप सिर्फ भाग रहे हैं कहीं के लिए नहीं बल्कि कहीं से.कहीं पहुंचने के लिए. लेकिन कहां ये आपको पता नहीं क्योंकि आपने कंधों पर घर जोड़ने की जिम्मेदारी ले रखी है. और, इसमें साधन की शुचिता को आप आड़े नहीं आने दे सकते.

What if! Peter Mukarjea played Littlefinger


peter-indrani-mukherjea-lWell, the title of this post struck to me when I saw Peter Mukarajee, constantly changing his stand on Indrani Mukarjea’s arrest across the day. His first ever comment went like this, ‘The police will not make up a case and they would arrest a person only after they have something against her. They told us that she is being taken to a police station in connection with a case. There was nothing amiss in my wife’s conduct and the two share a very normal relationship like any other siblings.’ He gave this statement to Indian Express at about 12:30. As this story was developing constantly, he comes to know about Mikhail Bora’s interview and commented that he has been kept in dark and didn’t aware with any missing person FIR and Raigad farmhouse that Indrani’s family owns. It was little surprising that he couldn’t gauge the relationship between Indrani Mukarajee – his wife and Sheena Bora – passed off as Indrani’s cousin, given his lifelong career as a trader.

This all was happening while Indrani was being grilled by Mumbai police commissioner Rakesh Maria. In a matter of few minutes, social media got hit with the breaking news of Indrani accepting Sheena as her daughter from previous marriage. So at 1:00 PM, he talked to CNN-IBN to improvise his stand and dropped the bomb shell of intimate relationship between step-sibling Sheena and his elder son Rahul. He told the media that he was informed that Sheena left the country for America. Thus, he asked his devastated son Rahul to move on. This was something really disturbing and raises serious questions (that will probably go unanswered). The question is why he asked his son to move on if he wasn’t aware with the actual fate of Sheena. He said that Sheena’s contact number begun going switched off for ‘obvious reasons’. These ‘obvious reasons’ should be defined well because in today’s era youngsters don’t just shut up at the switched off dial tone of their lovers’ contact numbers. They go on searching them on virtual media and get suspicious when they don’t get them there too. So, this theory doesn’t seem working that he didn’t know anything remotely about Sheena’s murder. The more believable tale can go like this – he told his son about the murder of Sheena and asked to move on and his son indeed obeyed his father because he has not any other way out in such a condition.

Later on, he added to CNN-IBN reporter that Indrani didn’t approve Sheena’s affair with his son Rahul. It is an immature effort of framing Indrani as the murderer mother because Sheena and Rahul were not siblings with blood. They were indeed connected with the marriages of their parents. Rahul wasn’t the blood son of Indrani and so he could be an ‘OKAY GUY’ for Sheena if Indrani & Peter have not married. It cannot certainly be the case of honor killing because Indrani herself has married thrice and couldn’t possibly fuss over so called step-sibling love affair between Sheena & Rahul. Later on, it is being reported that police team is officially quizzing Peter Mukarajee.

The Twitter Factor

Like every other popular murder mystery in India, people start speaking (on Twitter & sometimes on TV) and media run their gibberish as credible inputs relevant to the reporting of the murder mystery. So, in this case too. People started tweeting and releasing personal histories related to Indrani & Sheena. Some tweeted with overt sense of pride that they studied together in some high school of Guwahati. While some came forward to say that this is the case of honor killing for scandalizing the matter in Lalit Modi way. The moment tweets started hitting with honor killing word, it alarmed newsrooms in Delhi to Mumbai. Everyone (reporters & social media reporters) started speculating and following the people close to the matter for more details. Soon after this, the news broke out that Indrani has accepted Sheena as her daughter. This was the moment when tweets of incest started coming in. It simply served what it should do to make Indrani look like Nupur Talwar in Aarushi Murder Case. But later on things started going amiss because honor killing trend died its natural death and Indrani started trending as a desperate social climber while the official execution is still on the go.

The LittleFinger Factor

It’s important that I remain true to what I have written in the title of this piece. It’s about seeing Peter in the shoes of LittleFinger (People who are not aware with LittleFinger aka Lord Baelish should google his name to know how he killed King Joffrey and put the blame on Tyrion Lannister and returned back to Kingslanding). Now, I like to add Avirook Sen’s comment where he has mentioned that Indrani was the half power at NewsX and she was inclined to increase her stake in the company. Moreover, her behaviour has been problematic and dominating for Peter Mukarjea. This was a possible reason to see Peter Mukarajee as suspicious because Sheena’s serious relations with his son can emerge as a problem of property dispute so he simply removed both from his path. It is a kind of saying that goes like this if you want to remove big people then purpose won’t be solved just by toppling them from power, you need to steal their right to speak as well.

Post Script: My post is not intended to see Peter as the accused like we are seeing Indrani as one. Instead of this, we must keep patience for the official press releases of official interrogators. Hope this will serve the purpose of this post.

Film Review: ‘Masaan’ जिंदगी जैसी एक फ‍िल्म


Masaan film review
Masaan film review

मसान पर कुछ लिखने से पहले जरूरी है कि इस फिल्म को ठीक ढंग से समझा जाए, इसकी प्र‍कृति की विवेचना की जाए। यह बताया जाये कि आखिर यह फिल्म किन मायनों में खास है और किस तरह मसान फिल्म-दर-फिल्म बदलते भारतीय सिनेमा के बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरती है। भारत और खासकर बॉलीवुड में सिनेमा को सिद्धांतता: भारतीय जनमानस का अक्स दिखाने वाला आईना कहा जाता है। लेकिन बॉलीवुड की जमीन पर उगने वाली वाली बहुसंख्यक फिल्मों ने इसे एक ऐसे जादुई आईने में परिवर्तित कर दिया है जिसमें वह दिखाई पड़ता है जो हमारा जनमानस देखना चाहता है। इसमें चकाचौंध है, फुंके हुए सपने हैं, फार्मूले हैं और रेस भी। लेकिन इसके ठीक उलट साहित्य शब्दों के जरिए अपने पाठकों को उनकी जिंदगी का एक्सरे दिखाने का प्रयास करता नजर आता है। फिर बारी आती है कविता की तो यह एक इंजेक्शन की तरह पाठक को उस जगह पहुंचा देती हैं जहां उसमें थोड़ी बहुत संवेदना बची रह गई है।

अब बात करते हैं कि आखिर मसान है क्या। नीरज घ्यावन और वरुण ग्रोवर की फिल्म ‘मसान’ फिल्म, गद्य और काव्य विधाओं का एक ऐसा संगम है जो भारतीय सिनेमा के लिए किसी कुंभ से कम नहीं हैं। यह वह मोड़ है जहां से एक नया दौर शुरु होने की प्रबल संभावना दिखाई पड़ती है। फिल्म का पहला फ्रेम ‘बृज नारायण चकबस्त’ की नज्म “ज़िन्दगी क्या है, अनासिर में ज़हूर-ए-तरतीब, मौत क्या है, इनीं अज़ा का परेशाँ होना।” से शुरु होती है। दूसरे फ्रेम से ही फिल्म आपको उस जिंदगी में ले जाती है जहां एक सेल्फ डिपेंड लड़की पहली बार सैक्स का अनुभव ठीक से लेने के लिए कंप्यूटर पर ब्लूफिल्म देख रही है। ठीक! यहीं से आप फिल्म में उतर जाते हैं। कहीं जाति, न्याय और प्रशासन की चोट खाते इन युवाओं के टूटते चेहरों में आप खुद को देखते हैं। तो कहीं पहली बारिश की तरह ताजे इश्क में पड़ते हुए चेहरों को गुलाब होते हुए भी देखते हैं। असल बात यह है कि फिल्म में नायक नहीं है। फिल्म का परिवेश ही नायक है जो कि एक अक्स है हमारी आपकी जिंदगी का। कथानक की बात करें तो यह उस दौर की फिल्म है जब भारतीय युवा तकनीक के संमदर में गोते लगाता हुआ सामाजिक कुरितियों और बंधनों को तोड़कर एक स्वछंद पक्षी की तरह उड़ जाने को आतुर है। वह हर धारा, प्रवाह और उसके मूल को समझने की कोशि‍श में है। वह जानना चाहता है कि आखि‍र ऐसा है तो क्यों है और नहीं है तो क्यों नहीं। लेकिन कुछ पंख फड़फड़ाने पर ही वह जाति व्यवस्था, न्याय और प्रशासन के अदृश्य पिंजर में कैद हो जाता है। इससे उसकी मासूमियत तो मरती है लेकिन जिंदगी के प्रति उसका नजरिया वही रहता है।

अभिनय की बात करें तो दीपक चौधरी के रोल में विकी कौशल, देवी पाठक के रोल में रिचा चढ्ढा और शालू गुप्ता के रोल में श्वेता त्रिपाठी ने बिलकुल अपनी टीनऐज को एक बार फिर से जी डाला है। जिस तरह अपनी छत पर टहलते हुए शालू फोन पर अपने नए-नए बने दोस्त दीपक को सितारों को आंखों में महफूज रख लो… जैसे जाने पहचाने शेर सुनाती हैं वह सच्चाई के काफी करीब नजर आती हैं। यह दोस्ती शालू को वह स्पेस देती है जिसमें वह खुद को चाहने वाले शख्स से उस जुबां में बात कर सकती है जिसे वह पसंद करती हैं। वह शायरी कह सकती हैं और निदा फाजली एवं बशीर बद्र के प्रति अपने प्रेम का इजिहार कर सकती हैं। इसी तरह जब फोन पर दूसरी ओर शेर और नज्मों से दूर दूर तक नाता ना रखने वाले दीपक मुस्कुराकर बोलते हैं कि समझ नहीं आया, पर बहुत अच्छा था, अपनी दोस्त को अपनी बात पर यकीन दिलाने के लिए वह स्वाभाविक रूप से कहते हैं ‘कसम से बहुत ही अच्छा है।’ यह सीन देखकर सिनेमाहॉल में बैठे छोटे शहरों के मिडिल क्लास युवा जरूर मुस्कुरा देते हैं। वह दौर याद आ जाता है जब नोकिया 3315 पर एसएमएस में शायरी भेज भेजकर प्यार का इजहार होता था और लड़के-लड़कियां बाकायदगी के साथ इन शायरियों की डायरी मैंटेन करते थे। तब वो मोहब्बत भी शायरियों जितनी पाक होती थी। क्योंकि आशिक शायरी भेजने से पहले उसके असर और छुअन को टटोलने का प्रयास जरूर करते थे। संजय मिश्रा की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है क्योंकि उन्होने विद्याधर पाठक के रोल को जीवंत कर दिया है। विद्याधर पाठक की पात्र रचना अपने आप में एक बायोपिक सी जान पड़ती है उस संस्कृत प्रोफेसर के बारे में जो हालातों की मार से प्रोफेसरी छोड़, कर्मकांड और जूआ तक खेल अपने सभी मूल्यों को गंगा में बहाने को मजबूर दिखाई पड़ता है। इंस्पेक्टर के बारे में इतनी सी बात है कि इंस्पेक्टर की बेटी को फिल्म में देखते ही दर्शक के मन में सहज अपेक्षा पैदा होती है कि अब कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे अपनी बेटी के किसी कांड में फंसने पर फिल्म के एकमात्र विलेन को उसके किये का अहसास हो जाएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं क्योंकि आम जिंदगी में भी ऐसा नहीं होता। फिल्म में वह ही दिखता है जो एक सामान्य व्यक्‍त‍ि अपनी सामान्य सी शक्तियों से देख सकता है। फिल्म ईश्वरीय न्याय की प्रामाणिकता स्थापित करने की जगह यर्थाथ दिखाती है।

फिर फिल्म में एक दौर आता है जब अपने हाथों से सबकुछ बिखरता हुआ दिखने लगता है। फिल्म के पात्रों के साथ-साथ सीटों से चिपके हुए दर्शकों की आंखें भी जर्रा-जर्रा आंसुओं में बहती दिखाई देती हैं। यह वह क्षण हैं जब फिल्म साहित्य में घुसकर कविता हो जाती है। कुछ दृश्य इतने पॉवरफुल हैं कि सीट पर बैठे मजबूत से मजबूत आदमी को रोने को मजबूर कर दे। पर्दे पर दर्द से कराहते पात्रों को देखने से आप अंदर तक हिल जाते हैं। फिल्म की यूएसपी यह है कि यह जिंदगी को जस का तस दिखा देती है और फिल्म खत्म होते होते पर्दे से आपके भीतर उतर जाती है।

Ohh! CM Promised? But who cares your land is so valuable


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What do we call ‘development’ in cities like Kanpur; a newly constructed road, freshly painted divider or a mega sized road over bridge? I believe a road over bridge will fit the bill considering the necessity of infrastructural development in the city. But I am aghast to see that how the construction of an ROB can force someone to leave one’s house when that didn’t come under range of houses that needs to be demolished.

This is the story of an under construction road over bridge in Kanpur. It will replace the existing 45 years old bridge that connects South Kanpur to North Kanpur. South zone of Kanpur pumps blood in North Kanpur as New Bombay does to Nariman Point. People from all economic classes travel about 30 minutes to get to the heart of the city to work as accountants, managers, parking boys, tea vendors, and child labors. The large amount of vehicles that passes through this over bridge cause regular traffic jams. At times, the jam goes on for 6 hours because the existing bridge is designed, considering the traffic needs of 1970. The population has increased from 1,275,242 in 1971 census to 4,581,268 in 2011 census. And now 92% of total households posses basic means of mobility like two wheeler and cars. Despite such great necessity, this road over bridge was long delayed because there is a slum beneath this old and fragile bridge. There has been a great show of protest, local politics and failure of government machinery collectively. But, this time government acted so fast that the slum dwellers couldn’t get the chance to protest and end up packing their stuffs. The state government has considerably given one room flat as compensation to families whose houses were demolished and compensation to those who didn’t accept the flats.

But here comes a great deal of mismanagement. The government given flats are based out of the city. Women who are working as house maids, baby sitters or clean utensils in nearby colonies will have to travel about two hours to get to their jobs from their new homes. The same goes for men and students who study in make shift schools and government funded colleges. They will have to walk on foot for 5 kilometers to get the bus to enter in the city than it will take some about 45 minutes to reach their workplaces. In morning hours, it is okay to walk for such a long distance but evening hours will cause great security risks to women.

The other depressing features of this compensation scheme is lack of compassion in awarding flats and fishy distribution of cash compensations. There does not seem a visible mechanism of how cash compensations are being distributed. Some slum house owners have got three colonies against one house and some have got single colony. The highest compensation amount rupees 88 lakh goes to a house owner, who in real is a rich businessmen, owns luxury cars and sells premium furniture at a showroom in a market place. Some people has got 18 lakh rupees as compensation for demolition of their one foot long balcony.

While working on this report, I met a 50 year old lady who lost her husband few days after demolition of her home. This old lady can’t take stairs due to backache problem. The lady told me that UP CM Akhilesh Yadav promised her individually that she will get a ground floor flat but now she is being denied. There is another lady who is a mother to married sons. Her three story home was enough for 13 family members but now she is compulsive to accommodate her big family in government-provided 7*10 feet flat. She got a colony because her house was going to be demolished but later it didn’t. The houses that were less than 10 feet close to the pillars were destined to be demolished. This lady’s house were certainly not 10 feet close so his sons refused to leave the house. But here came the local police who thrashed him up for not leaving his home. They brought him to nearest police station for threatening. The word ‘thana’ threatens these guys.

So, sanctioning this road over bridge is indeed a service to the people of this city. But the big question still looms high that why some people has to suffer for the comfort of others.

#NetNeutrality: जरा समझें आखिर क्‍यों मचा है बवाल


net-neutralityमोबाइल स्पेसिफिकेशंस से पनीर कोरमा तक और हिटलर से मुसोलिनी इंटरनेट ने हमें अकूत जानकारियों का भंडार दिया है. किताबों के दूर होने से पैदा हुए स्‍पेस को इंटरनेट ने काफी हद तक भरने की कोशि‍श की है. लेकिन अब यह इंटरनेट बदलने जा रहा है. जी हां, भारत में इंटरनेट पूरी तरह से बदलने जा रहा है. अब इंटरनेट फ्री में मिलने जा रहा है. टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां आपको ऐसे ऑफर देने जा रही हैं जिनमें आपको आजादी होगी कि आप कौन सी एप यूज करें और कौन सी एप यूज ना करें…जैसे कि अगर आप सिर्फ वॉट्सएप यूज करते हैं तो आप दस-बीस रुपये का प्लान खरीद कर पूरे महीने मजे से वॉट्सएप यूज करें. आपको क्या जरूरत है कि 3 सौ रुपये का 3जी डाटा पैक यूज करें. मैं यह मानकर चल रहा हुं कि ऊपर लिखे ऑफर आपको बहुत पसंद आ रहे होंगे. रीजनेवल भी लग रहे होंगे. लेकिन भारत में नेट न्यूट्रेलिटी का अंत मुगल साम्राज्य के अंत और ब्रिटिश राज के आरंभ की तरह ही साबित होने वाला है. नेट न्युट्रेलिटी समर्थकों और टेलिकॉम सर्विस ऑपरेटर्स की यह लड़ाई समझने के लिए सबसे जरूरी है कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी की एबीसीडी को समझ लें. वरना आप भी उन करोड़ों लोगों में शामिल हो जाएंगे जो प्लासी युद्ध के दौरान मैदान के बाहर खड़े होकर युद्ध परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे जब उनकी जिंदगी की सबसे जरूरी लड़ाई लड़ी जा रही थी. इससे पहले कि समय निकले, आपको यह जानना चाहिए कि आख‍िर यह लड़ाई क्यों लड़ी जा रही है और आप इस लड़ाई में कहां खड़े हैं.

क्या है नेट न्यूट्रेलिटी
हिंदी में नेट न्यूट्रेलि‍टी का शाब्दि‍क अर्थ है: इंटरनेट पर मौजूद सामग्री की रूप मुक्त, उद्देश्य मुक्त, स्त्रोत मुक्त उपलब्धता. फिलहाल इंटनेट पर आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह बाइट्स में मापा जाता है:
मतलब –
विकीपीडिया के 20 किलोबाइट के पेज का मूल्य = x रुपये

और फेसबुक के x किलोबाइट के पेज का मूल्य भी = x रुपये
यानी कंटेंट कुछ भी हो आपको पैसे बाइट्स के हिसाब से ही देने होंगे. अब जैसे-जैसे आपका यूसेज बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे आपका इंटरनेट खर्चा बढ़ता जाएगा. चाहें अपना 2 गीगा बाइट के डाटा पैक से पोर्न वीडियो देख लें या हिस्ट्री चैनल की डॉक्यूमेंट्री, आपको पैसे 2 गीगा बाइट के हिसाब से ही देने होंगे. यह कुछ-कुछ पंसारी की दुकान से आटा खरीदने जैसा है. जब आप आटा खरीदने जाते हैं तो क्या आपका पंसारी आपसे यह पूछता है कि आपको आटे से रोटी बनानी है या परांठे, रोटी बनानी हो तो ये वाला आटा ले जाओ और परांठे बनाने हों तो ये वाला आटा. नहीं ना! आप तो बस पंसारी को आटे के पैसे किलो के हिसाब से देते हैं ना कि उससे बनने वाले भोजन के हिसाब से.

क्या हैं वर्तमान व्यवस्था के फायदे
अगर आप इस व्यवस्था के फायदे जानना चाहते हैं तो आपको इंटरनेट की लाइफ साइकिल को समझना होगा. इंटरनेट दो लोगों को टेलिफोन के तारों से जोड़ने की व्यवस्था से जोड़ने का नाम है. इस प्रोसेस के तहत दो लोग अपने कंटेंट को आसानी से इंटरनेट के माध्यम से एक दूसरे के साथ शेयर कर सकते हैं. आप अपनी बात को, बिजनेस आइडिया को और व्यापार को दुनियाभर में मुक्त रूप से इंटरनेट यूज कर रहे लोगों तक पहुंचा सकते हैं. वर्तमान व्यवस्था आपको चुनाव का अधि‍कार देती है कि आप इंटरनेट को कैसे, कितना एवं कब यूज करें. इंटरनेट एक ताकत है जिसके माध्यम से आप अपने जीवन को बदल सकते हैं. अपने सपने पूरे कर सकते हैं. यह पूरी दुनिया में समानता का आाखि‍री मोहल्ला है जहां सब तकनीकी आधार पर सामान्य हैं. यहां सिर्फ कंटेंट बिकता है स्त्रोत या ब्रांड नहीं. net-neutrality-what-you-need-know-now-infographicरेगुलेटेड इंटरनेट – एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना

इंटरनेट को रेगुलेट करके दरअसल एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना करने की साजिश की जा रही है जिसमें महंगा पैक खरीदने वाले काफी तेज इंटरनेट यूज कर पाएंगे और कम पैसे खर्च करने वालों को स्लो इंटरनेट यूज करना होगा. देखें इमेज net-neutrality-1-620x400 लेकिन कंपनियों को हो रहा है नुकसान अब आपने एक पक्ष सुन लिया है तो इस महामुकाबले का दूसरा पक्ष भी सुन लें. दरअसल इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स का तर्क है कि जैसे जैसे भारत में स्मार्टफोन यूजर्स बढ़ रहे हैं, इंटरनेट के भार को संभालना मुश्कि‍ल हो रहा है. ऐसे में उनके लिए इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर मैंटेन करना संभव नही है. इसलिए वह इंटरनेट को सेक्शन में बांटना चाहते हैं जिससे डाटा को सही तरीके से डिस्ट्रीब्यूट किया जा सके. लेकिन असल बात यह है कि ओवर द टॉप प्लेयर्स यानी वॉट्सएप, इंस्टाग्राम, वाइबर, स्काइप आदि‍ आदि की इन्नोवेटिव सेवाओं के चलते लोगों ने टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स की कॉल एवं एसएमएस सुविधाओं को यूज करना बंद कर दिया है.

नोकिया फोन पर चुटीली-मजेदार बातों का दौर
अगर किसी को याद हो तो जरा उस दौर में जाएं जब एयरटेल, हच और अन्य जीएसएम कंपनियों ने सिम सर्विसेज के नाम पर ज्योतिष, ट्रेवल और चुटीली बातों की सर्विसेज शुरु की थीं. इन सर्विसेज के दौर में लोगों के पास फ्लोरोसेंट लाइट वाले नोकिया 3315 और 1100 फोन आते थे. ऐसी किसी सर्विस को यूज करते ही लोगों के मेन बैलेंस से 100 से 150 रुपये कट जाया करते थे. शुरुआती फोन यूजर्स के बीच पांच अंकों के एसएमएस नंबर आतंक के रूप में व्याप्त हो गए थे. गलत प्रस्तुतिकरण और ग्राहकों की दोहन मानसिकता से इन सर्विसेज का अंत हो गया. लेकिन इसके बाद स्मार्टफोन एप्स का दौर आया. इन एप्स ने बिना पैसे लिए आपको बेहतर तरीके से जानकारी उपलब्ध कराई. हालांकि एप्स ने अपने भर का खर्चा निकालने के लिए एड्स का सहारा लिया. बेहतर जानकारी उपलब्ध कराकर इन एप्स ने एड के सहारे वह पैसा कमाना शुरु कर दिया जिसे इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां अपना मान रही थीं. यह प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नमक पर कर लगाने जैसा है. कि ब्रिटि‍श राज के समुद्री क्षेत्र रूपी टेलिफोन लाइनों से जो भी रेत रूपी डाटा उपलब्ध हो रहा है उस पर प्रथम अधि‍कार राज का है.

इसके विपरीत अगर आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो प्रति तीन महीनों में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियों के डाटा शुल्क और खपत में बेतरतीब बढ़त देखी गई है. ऐसे में कंपनियों को जो नुकसान एसएमएस और कॉलिंग सर्विसेज के खत्म होने के नुकसान से उठाना पड़ रहा है उससे कहीं ज्यादा वे इंटरनेट प्रोवाइडिंग सर्विस से कमा रही हैं. देखें इमेज. airtel-data-table-q3-fy13-495x284 फर्ज किजिए कि ट्राई ने भारतीय टेलिकॉम ऑपरेटर्स की शर्ते मानकर इंटरनेट को इन कंपनियों के अधीन कर दिया तो इस कंडीशन में आपको हर सर्विस यूज करने के लिए एक नया पैक खरीदना पड़ेगा. इसके अलावा नई एप कंपनियों के लिए आप तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाएगा. नई जानकारियों का आप तक पहुंचना नामुमकिन होगा क्योंकि आप तक वही जानकारी पहुंच पाएगी जो आप तक पहुंचने के लिए आपके टेलिकॉम ऑपरेटर को शुल्क अदा कर पाएंगे और आप वही जानकारी प्राप्त कर पाएंगे जिसके लिए आप पैसे दे पाएंगे. इसलिए आज ही अगर मुक्त इंटरनेट चाहिए हो तो Change.org पर अपनी पेटिशन दाखि‍ल करें और ट्राई को मेल करें कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी के पक्ष में हैं क्योंकि अब नहीं चेते तो अगला मौका बहुत देर में आएगा…

इस विषय पर ज्यादा पढ़ने के लिए कृप्या इस लिंक को खोलें:
http://www.medianama.com
https://docs.google.com/document/d/1DNXgJRKUMk4Tqefzybab7HzsV6EeYmnciPqMQG91EN0/edit

मीडियानामा और अन्य सभी साथि‍यों को इस बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सधन्यवाद. पिक्चर्स गूगल से ली गई हैं एवं बिना किसी छेड़़छाड़ के पब्लिश की गई हैं. किसी को क्रेडिट दिया जाना जरूरी हो तो कृप्या बताएं.

जरा कश्‍मीर के कुछ खाली घरों में झांकें…


Protests-Demonstrations-62कश्‍मीरी पंडितों के दर्द, विछोह और भयाक्रांतता को समझने के लिए आपको कश्‍मीर जाने या कोई किताब पढ़ने की जरूरत नहीं है। सरल मानवीय स्पन्दन और संवेदना इस दर्द के एक अंश को समझा जा सकता है। ऐसे दर्द और अन्‍याय के प्रति दबे हुए गुस्‍से के अहसास सालों बीतने के बाद भी ऐसे जीवंत रहते हैँ जैसे सुई या कांटा चुभने से होने वाला दर्द। आप कितने भी बड़े हो जाएं सुई चुभने पर होने वाली शारीरिक अनुभति को चाहकर भी नहीं बदल पाएंगे। इस प्राकृत सचेतना की तरह ही पैतृक जमीं से बिछुड़ने के दर्द को भी कितनी ही सफलताओं से कम नहीं किया जा सकता। जब भी कोई आपको सुई के दर्द से बचाने की राजनीति करता दिखाई पड़ता है तो आप मन ही मन तिलमिला उठते हैं। सुई चुभोए जाने वाले सभी पुराने संस्मरण आँखों के सामने फ़िल्म की मानिंद तैर उठते हैं। उस वक़्त आप मन ही मन कह उठते हैं की अब बस भी करें।

जहाँ घर हमारा था वो जमीं धस गई।
लंबे देवदार के पेड़ अब सब फर्नीचर चौखट हो गए,
वो घर के पास वाली झील अब पहले सी नहीं रही,
जहां घर हमारा था वो जमीं धस गई।

अगर आप अब भी इस दर्द को महसूस ना कर पाए हों तो स्वयं को इस कहानी का पात्र बना कर देखिए। फ़र्ज़ कीजिये की आप एक एमएनसी में काम करते हैं और इस नौकरी को आपने अथक मेहनत के बाद हासिल की है। इससे जुड़े पदलाभ आपकी ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए अत्यंत जरूरी हों। फिर एक दिन आपको पता चलता है की आपकी कंपनी में आपके देश के लोग धीरे धीरे कहीं और नौकरी खोज रहे हैं। लेकिन आप पहले की तरह सब सामान्य मानकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने men लगे रहते हैं। फिर एक दिन आप रोज की तरह दफ्तर पहुंचते हैं और आपको सुनने को मिलता है कि कुछ लोग पीठ पीछे आपको नौकरी से निकालने की साजिश रच रहे हैं। ऐसी खबरों को अफवाह मानकर आप अपना काम फिर शुरु कर देते हैं, लेकिन पाते हैं कि कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो हो रहा है जो डरावना है। इन डरों के बावजूद आप नौकरी बचाए रखने के लिए साथियों से पहले की तरह व्‍यवहार करते रहते हैं। दोस्तों पे भरोसा करते हैं की दुसरे मुल्क के सही लेकिन हैं तो ये आपके दोस्त ही।  कुछ दिनों बाद आप पाते हैं कि ऑफिस की महिलाकर्मियों ने आपसे बात करना बंद कर दिया है। और ऑफिस लन्च के दौरान बातचीत की भाषा अंग्रेजी की जगह विदेशी हो गयी है। अनौपचारिक संवाद अनजानी भाषा में होने लगे।  इसके बाद भी आप सभी से ऐसे बात करने की कोशिश करें कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

कुछ दिन बाद आपके कुछ दोस्‍त आपके प्रति चिंता जताते हुए दूसरी नौकरी ढूढ़ने का सुझाव देने लगें। और फिर एक दिन आपके साथ लंच शेयर करने वाले, सिगरेट के कश लगाने वाले, लिफ्ट लेने-देने वाले दोस्‍त आपको कॉलर से उठा कर अनर्गल आरोपों और लात घूंसों से सुशोभित करते हुए ऑफिस से बाहर कर दें।

अगले दिन चोटों को बैंडेज के पीछे और शर्म को पलकों के नीचे छुपाकर आप ऑफिस आ जाते हैं। लेकिन आपको पता चलता है कि ऑफिस के बाद आपको जान से मारने की साजिश की जा रही है। इसके बाद शाम को आपका सबसे जिगरी यार ऑफिस छूटने पर कुछ अंजान लोगों के साथ आपको जान से मारने की धमकी देता है। धमकी को असली प्रभाव देने के लिए आपको कुछ घाव भी देकर जाए। इसके बाद आप उसी रात अपनी बची हुई सेलेरी और ऑफिस ड्रॉअर में बीबी-बच्‍चों की तस्‍वीरें छोड़कर जान बचाने के लिए उस शहर से बहुत दूर भाग जाते हैं।

Kashmiri government employees scuffle with police during a prote
यह बात सोचने में थोड़ी डरावनी लग सकती है लेकिन अगर आपने इस दुखदाई कल्‍पना में खुद के असम्‍मान और डर के भाव को महसूस किया है तो आपको उन दो से तीन लाख कश्‍मीरियों के दर्द को समझने में मदद मिल सकती है जो सर्द रातों में जान बचाने के लिए अंतिम सांस तक भागे थे।

इस दर्द को महसूस करने के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य की उन पार्टियों के बयानों पर नजर डालिए जो कहते हैं कि अगर कश्‍मीरी पंडितों को घाटी में वापस आना है तो जैसे बुला रहे हैं वैसे ही आना होगा। 1989 से पहले की तरह कश्‍मीरी मुस्लिमों के साथ मिल-जुलकर रहना होगा। ये ऐसा होगा कि आपसे कहा जाए कि जाइए उसी दोस्‍त के जूनियर बनकर काम करिए जो आपको लात मारकर बॉस बना हो।

हद तो तब होती है जब आपको बिना पूर्व सूचना के कम्पनी छोड़ने के लिए माफ़ी मांगने को कहा जाये।

An Evening at Painter’s Universe


google

Some days back, I was with a girl, whose name I wish to be coined with mine. It was a calm and normal day. Everything was settling at a normal pace. I woke up early and tried understanding one of my dream. In my dream, I saw a painter splashing colors at his canvas. Such vivid dreams were not new to me. I have even seen people discussing concepts of horror and sex in my dreams. But this painter’s dream was little more engrossing as he was splashing colors at his canvas hysterically. The whole room was being splattered with different shades of prussian blue, crimson red and mustered yellow. But I could not gauge the abstract creation of ‘the painter’. After spending about an hour in search of the meaning of this dream over web, I ended up feeling frustrated. The mystery of the ‘creation in process’ remain unsolved. But I somehow managed to transport myself back into the real life where I was to go the office.

This day, I was to meet the girl I liked. But that was a very small section of the day. The meeting was about to happen at 7 o’ clock in evening and 10 hours long working day was ahead of me. The painter’s dream was perturbing me hard. I again spent about thirty minutes in office to find the meaning of the dream. But nothing happened. Restlessness was growing with each failed effort. Somehow I managed to complete the day’s work without any blunder. And left my workplace at 6:30 evening to meet my girl.

Clad in creamy white cardigan with pink flowers, she looked like the goddess of pink color. Every time I saw her such analogies came to my mind. She’s waiting for me at the check-in counter. We weren’t in love but we liked eachother’s company. We were fellow travelers. It was the first time we were into a movie hall. Opportunity makes people greedy for things that they can’t avail. But they also give the courage people to stand and show their guts by fighting hard for someone you love. In the movie hall, we were able to see each other to our heart contents. But we were watching the movie. Each fight scene was being consumed with bigger amount of popcorn. I sipped from her soft-drink after quickly finishing mine. We were sharing cold-drink in a manner as if we were together for years. Such familiarity and comfort in sharing glasses were seemed magical to me. But we didn’t say a word. The search for popcorn was making our fingers crash unknowingly. Heart was pounding so hard that I felt like being in a dream again. Her presence looked dreamy as we didn’t talk. But the moment was so overwhelming that I couldn’t tell her if I liked the movie or not. I was so speechless and stunned that I could only experiencing the presence of my girl in a sacred way. I didn’t touch her because she touched me with her overwhelming presence. Each time, my fingers crashed with hers she went more silent. This unknown touch was bringing emotional thunderstorms for her. It brought me more close to her for support. But she was not looking for support. She was herself an ocean of happiness. This day, she opened her ocean of love for me. In this ocean I will have to sail using my own Skills. After the movie, the painter’s dream was not anymore a mystery. The ‘creation in process’ was nothing but my growing love for the girl of my life.

Thanks housing.com for giving us the opportunity to write about a memorable even though signifying positivity and optimism of love.