Nitish vs Shahabuddin war of words and its possible impact on UP Elections

Nitish vs Shahabuddin war of words and its possible impact on UP Elections

In the war of words between Bihar CM Nitish Kumar and RJD’s Ex-MP Mohammad Shahabuddin, the latter seems to win. It’s because he – a leader with noted criminal history has a close proximity with RJD boss Lalu Yadav.

It goes back to 2005 when Nitish Kumar was gaining strength from his moral positioning. He was trying to make Bihar – a safer place to live. In order to do so, he put criminal-dons of Bihar like Shahbuddin, Prabhunath Singh & Surajbhan Singh behind bars. He ordered to set up trial courts in Siwan jail because Shahabuddin showed himself medically unfit to face trial in courts. He got multiple punishments ranging from one year, two years and ten years in different cases. Yet, he still has to face trial in 37 cases along with a CBI inquiry.

But time has changed. Now, Nitish is heading a coalition government with a support of Lalu Prasad Yadav’s RJD’s upper hand. Yet, he tried to contain Shahabuddeen like before by shifting him from Siwan jail to Bhagalpur Jail in the current government. But he couldn’t further stop his release, possibly due to pressure coming from Lalu Yadav.

And, as it’s openly predicted that Shahabuddin will not let it all go easily, Shahabuddin has started attacking the authority of Nitish Kumar.

Apparently, Nitish Kumar has risen in his political career but for ex-RJD MP, he is just another politician from Bihar who shouldn’t have challenge his authority at the first place. So, now when he is out and will do what he was doing from inside the jail, he is going to attack Nitish over and over again.

Will Nitish act tough against Shahabuddin?

It’s a question worth answering. Seeing the current political scenario, Nitish Kumar can’t do much. As per the news reports, Nitish has had a meeting with senior JDU leaders to discuss the possibility of imposing crime control against Shahabuddin. Reportedly, Nitish is angry with Lalu Prasad Yadav because he’s not stopping the criminal don.

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So, here comes the question – will Nitish impost CCA? The answer to this question is no.

Nitish will not do so by risking the longevity of his coalition government. He doesn’t anymore gain strength from his moral positioning among Bihari population. Many loyal Nitish Kumar fan voters showed displeasure over Nitish joining Lalu Camp before voting begun.

Apparently, RJD gained most from Mahagathbandhan while JDU didn’t perform well in comparison to previous elections.

So, now if in case Nitish breaks ties Lalu over this issue he has nothing to lose but he will lose more.

Can Shahabuddin Impact UP Elections?

It’s another question that’s not being asked now because it might be too early to predict anything for UP elections. But I personally think that this political development can impact UP Elections. This is how it can. If you are watching closely then you must have noticed political developments since 5th of September.

On 5th of September, Shivpal Yadav from Samajwadi Party announced that merger of Mukhtar Ansari’s Kaumi Ekta party with SP is inevitable and happen soon. And, issued the warning of possible riots in UP before elections.

(Mukhar Ansari known for his criminal history and hold in Muslim voters comes from Mau – a region with Muslim majority, fall close to UP-Bihar border.

On 7th of September, bail order of Shahabuddin comes and Bihar’s Deputy CM Tejaswi Yadav gives a statement that Nitish Kumar will be a better PM than PM Modi.

On 10th of September, Shahabuddin gets a grand welcome by RJD leaders and attacks Nitish Kumar.

On 11th of September, Nitish responded back – It doesn’t matter what one person says, I have got people’s mandate.

On 12th of September, Lalu responded on this development – Shahabuddin hasn’t said anything like this, He said Lalu is my leader and Nitish Kumar has no problem on this part.

Apparently, on the same day, JDU has issued a show cause notice to its MLA Girdhari Yadav who went to Bhagalpur Jail to attend Shahabuddin. So…thodi taklif to hai.

Coming back to the question – Will it impact UP elections? I think yes. Shahabuddin’s has influence over Muslim voters of a Bihar’s siwan district that falls adjacent to UP border.

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Siwan is close to UP’s constituencies that have Muslim majorities like Deoria, Balia, Gorakhpur, and Mau.

Now, come back to what Shivpal Yadav has warned of. Riots. He has played the same card that SP has been playing since long to bring in Muslim – Frighten Muslim voters with Riots and get their votes.

So, now just think for a moment if it happens then who will benefit the most. It’s BJP and SP. Because if the polarization of votes happens, a big part of UP’s 19.3 Muslim vote share will fall in SP’s account and a majority of Hindu votes will go to BJP. And, figures like Shahabuddin and Mukhtar Ansari will be really helpful for SP for re-establish its ages old Muslim-Yadav vote bank political equation for upcoming elections.

So, if this’s not just a coincidence then Nitish has fallen in the great game and great game is terrifying. 

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शहाबुद्दीन की रिहाई के साथ ‘चंदू-जेएनयू’ युग का अंत


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मुझे अपनी छवि बदलने की जरूरत नहीं, जनता ने 26 से मुझे उसी रूप में स्वीकार किया है जैसा मैं हूं, लालू प्रसाद यादव मेरे नेता हैं और नीतीश कुमार परिस्थितियों की वजह से बिहार के सीएम हैं.

ये शब्द थे 11 सालों बाद जेल से रिहा होकर 1300 गाड़ियों के काफिले में सवार होते पूर्व आरजेडी सांसद शहाबुद्दीन के.

बिहार के बाहूबली नेता शहाबुद्दीन पर राजीव शर्मा हत्याकांड समेत पूर्व जेएनयू अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद और उनके साथी श्याम नारायण यादव की हत्या का भी आरोप है.

अक्सर एक ही समय पर दो अलग-अलग स्थानों पर दो घटनाएं घट रही होती हैं जिनका एक-दूसरे से कोई सीधा संबंध नहीं होता. लेकिन अगर समय की पर्तों को खोलकर देखें तो ये पता चलता है कि दोनों घटनाएं किस तरह एक दूसरे से जुड़ी होती हैं.

इन दोनों घटनाओं में यही संबंध है. ये दो घटनाएं हैं – जेएनयू छात्रसंघ चुनाव 2016 और चंदू के हत्यारे शहाबुद्दीन की रिहाई.

जेएनयू स्टूडेंट्स में कॉमरेड चंदू के नाम से चर्चित चंद्रशेखर प्रसाद ने अपनी स्पीच में कहा था – 

हमारी आने वाली पीढ़ियां सवाल करेंगी, वे हमसे पूछेंगी कि जब नई सामाजिक ताकतें उभर रही थीं तो आप कहां थे, वे पूछेंगी कि जब लोग जो हर दिन जीते मरते हैं, अपने हकों के लिए संघर्ष कर रहे थे, आप कहां थे जब दबे-कुचले लोग अपनी आवाज उठा रहे थे, वे हम सबसे सवाल करेंगीं.

 

ये स्पीच एंटी-बुलिज्म, एंटी-पेसिविज्म और अवेकनिंग है. आप जेएनयू को जानते हों या न जानते हों, वहां की हवा में तैरते वाद-विवाद और नारों से आपका ताल्लुक हो या न हो लेकिन अगर आपने जिंदगी में कभी भी बुलिज्म को बर्दाश्त किया है तो आप इस जेएनयू के विचार से सहमत हुए बिना नहीं रह सकते.

जेएनयू सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं बल्कि एक आइडिया है…आइडिया एक ऐसे शिक्षण संस्थान को रचने का जहां से निकले छात्र देशभर में सुनने, संवाद करने और समस्याओं के क्रिएटिव सॉल्यूशन निकालने में विश्वास रखें.

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इस स्पीच के हर शब्द को हम क्लियरली सुन सके क्योंकि कॉमरेड चंदू के दौर का जेएनयू कहने-सुनने में यकीन रखता था. संवाद के जरिए दूसरे पक्ष को खुद से सहमत करने में यकीन में रखता था.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में खुद चंद्रशेखर की बनाई पार्टी अॉल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन ने तमाम विरोधों के बावजूद खुद के वजूद को बचाने के लिए सीपीआई (एमएल) से जुड़ी पार्टी स्टूडेंट फेडरेशन अॉफ इंडिया के साथ गठबंधन कर लिया. तर्क दिया गया कि ये गठबंधन जेएनयू की फासिस्ट ताकतों से रक्षा के लिए किया गया है.

लेकिन चंद्रशेखर प्रसाद ने खुद कहा है कि जहां तक हमारे जैसे लोगों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बात है तो वो ये है कि हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी जिसको डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं और इसीलिए अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की होगी न कि जेएनयूएसयू चुनाव में गांठ जोड़कर जीतने या हारने की महत्वाकांक्षा होगी

आज से 20 साल बाद अगर आप आज के जेएनयू की प्रेसीडेंशियल डिबेट्स को यूट्यूब पर सुनने की कोशिश करेंगे तो आपको हाईडेफिनेशन स्पीच वाले वीडियो मिलेंगे लेकिन अनफॉर्चूनेटली आप आज की स्पीचों के एक शब्द को ठीक से नहीं सुन पाएंगे.

आप सुन पाएंगे उन खोखली आवाजों को जो चंदू की सोच के विपरीत जेएनयूएसयू चुनाव जीतने के लिए गठबंधन करके चुनावी विरोधी एवीबीपी के खिलाफ बोलती नजर आएंगी. आवाजें जो गैर-सामाजिक विचारों के खिलाफ नहीं चंद संस्थाओं और नेताओं के खिलाफ बोलती नजर आएंगी. क्योंकि शहाबुद्दीन की रिहाई के साथ जेएनयू-चंदू युग का भी अंत हो गया है.

 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बताते हैं गोरक्षकों की मनस्थिति


hazariधार्मिक अतार्किकता से भरे जिस तथ्यविहीन देश काल में हम जी रहे हैं उसमें दो बातें अहम हैं – पहली स्वयं के इतिहास और भविष्य के संबंध में पूर्ण अरुचि, दूसरा भौतिक उपभोग का उत्तरोत्तर महिमामंडन. यहां मैंने अतार्किकता से पहले धार्मिक और देशकाल से पहले तथ्यविहीन विशेषण का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि धर्म को छोड़ दें तो हमारे समाज का एक बड़ा तबका तर्क और तथ्य आधारित हर विधान और वस्तु को सहर्ष स्वीकृति देता है.

इसमें 70 के दशक के बाद से पश्चिमी देशों में विकसित घरेलू उपयोग के साधनों से लेकर मौसम, युद्ध और आपसी संवाद से जुड़े फेसबुक जैसे माध्यम शामिल हैं. इसके बावजूद इसी समाज का आधुनिक युवा गो मांस, पवित्र ग्रंथों के अपमान, मस्जिद और मंदिरों में भौंपू और मांस के टुकड़ें फेंके जाने के बाद बर्बर जातियों की माफिक सैकड़ों की जमात में असहायों को मौत के घाट उतारने में जरा भी नहीं झिझकता.

ऐसे में प्रश्न उठता है कि कैसे इस जमाने का युवा तार्किकता से भरे समाज में जीते हुए भी बनिस्बत अपने पापों पर शर्मिंदा होने के बजाए स्वयं को भगत सिंह से प्रेरित बताता है और भारत माता के चरणों में समर्पित बताता है. क्यों एक हिंदू ह्रदय सम्राट को गोरक्षकों की निंदा करने पर अगले चुनाव में अंजाम भुगतने की धमकी मिलती है. ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध घर जोड़ने की माया में दिए हैं.

पढ़िए क्या कहते हैं द्विवेदी जी –

वह कौन सी वस्तु है जो अनुयायियों को अपने गुरु के उपदेशों के प्रतिकूल चलने को बाध्य करती है? यह कहना अनुचित है कि अनुयायी जानबूझकर अपने धर्मगुरु के वचनों की अवमानना करते हैं, वस्तुत: अनुयायी धर्मगुरु की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ही बहुधा गलत मार्ग ग्रहण करने लगते हैं. जो लक्ष्य के साथ मेल खाते और बहुधा उसके विरोधी होते हैं. हजरत, ईसा मसीह अहिंसा मार्ग के प्रवर्तक थे; परंतु उनकी महिमा संसार में प्रतिष्ठित करने के लिए सौ-सौ वर्षों तक रक्त की नदियां बहती रही हैं. हमें इतिहास को ठंडे दिमाग से समझना चाहिए. सच्चाई का सामना करना चाहिए.

जब किसी महापुरुष के नाम पर कोई संप्रदाय चल पड़ता है तो आगे चलकर उसके सभी अनुयायी कम बुद्धिमान ही होते हैं, ऐसी बात नहीं है. कभी-कभी शिष्य परंपरा में ऐसी भी शिष्य निकल आते हैं जो मूल संप्रदाय प्रवर्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं. फिर भी संप्रदाय स्थापना का अभिशाप ये है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिंतन कम हो जाता है. संप्रदाय की प्रतिष्ठा ही जब सबसे बड़ा लक्ष्य हो जाता है तो सत्य पर से दृष्टि हट जाती है. प्रत्येक बड़े यथार्थ को संप्रदाय के अनुकूल लगाने की चिंता ही बड़ी हो जाती है इसका परिणाम यह होता है कि साधन की शुद्धि की परवाह नहीं की जाती. परंतु यह भी ऊपरी बात है. साधन की शुद्धि की परवाह न करना भी असली कारण नहीं है. वह भी कार्य है; क्योंकि साधन की अशुचिता को सत्य भ्रष्ट होने का कारण मान लेने पर भी यह प्रश्न बना ही रह जाता है कि विद्वान और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी साधन की अशुचिता के शिकार क्यों बन जाते हैं? कोई ऐसा बड़ा कारण होना चाहिए जो बुद्धिमानों की अक्ल पर आसानी से पर्दा डाल देता है. जहां तक कबीरदास का संबंध है उन्होंने अपनी ओर से इस कारण की ओर इशारा किया है.

घर जोड़ने की अभिलाषा ही इस प्रवृत्ति का मूल कारण है. लोग केवल सत्य को पाने के लिए ज्यादा देर तक टिके नहीं रह सकते. उन्हें धन चाहिए, मान चाहिए, यश चाहिए, कीर्ति चाहिए. ये प्रलोभन सत्य कही जाने वाली वस्तु से अधिक बलवान साबित हुए हैं. कबीर दास ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जो उनके मार्ग पर चलना चाहता हो वो अपना घर पहले फूंक दे.

कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना सो चलै हमारे साथ

घर फूंकने का अर्थ है धन और मान का मोह त्याग देना, भूत और भविष्य की चिंता छोड़ देना और सत्य के सामने जो कुछ भी खड़ा हो उसे निर्ममतापूर्वक ध्वंस कर देना. पर सत्यों का सत्य यह है कि लोग कबीरदास के साथ चलने की प्रतिज्ञा करने के बाद भी घर नहीं फूंक सके. मठ बने, मंदिर बने, प्रचार के साधनों के आविष्कार किए गए और उनकी महिमा बताने के लिए अनेक पोथियां रची गईं. इस बात का बराबर प्रयत्न होता रहा और अपने इर्द-गिर्द के समाज में कोई यह न कह सके कि इनका अमुक कार्य सामाजिक दृष्टि से अनुचित है; अथार्त विद्रोही बनने की प्रतिज्ञा भूली गई; आगे चलकर गुरु-पद पाने के लिए हाईकोर्ट की भी शरण ली गई. यह कह देना कि यह सब गलत हुआ, कुछ विशेष काम की बात नहीं हुई. क्यों यह गलती हुई? माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए. यह सत्य है. कबीर पंथ का नाम तो यहां इसलिए आ गया क्योंकि ये सारी बातें कबीरपंथी साहित्य पढ़ते हुए मेरे मन में आईं हैं.नहीं तो सभी महापुरुषों के प्रवर्तित मार्ग की यही कहानी है. माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं. यह इतिहास की चिरोद्घोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है.

कारण साफ और सामने है. जब लोगों को एक तस्वीर दिखा दी जाती है कि अमुक धर्म औऱ संस्कृति संकट में है. पुराने जंग लगे हथियारों को निकालने का वक्त आ गया है तो लोग सोचना छोड़कर उनसे जो कहा जाता है वो करने पर उतारू हो जाते है. उन्हें स्वत: लगता है कि भारत माता, धर्म-संस्कृति और गो माता की रक्षा के लिए अगर किसी की हत्या भी की जाए तो उनके लिए वो हत्या नहीं वध है. शत्रुओं का नाश है.

धर्म और संस्कृति की रक्षा के मार्ग पर बुद्धि किनारे हट जाती है. सर पर एक धुन सवार होती है पंथ बचाने की. ऐसे में आपके विश्वास के प्रतिकूल या उससे जरा सी हटकर उठने वाली हर आावाज आपका खून खौला देती है. इस आवाज को दबाने के लिए सोशल मीडिया से लेकर व्यक्तिगत जीवन में भी आप एक जानवर की भांति रक्षात्मक मुद्रा में प्रहार करने को प्रेरित होते हैं. आपकी ये मुद्रा सोचने की शक्ति छीन कर आपको एक रौ में बहाने लगती है जैसे बरसाती नदियां बहती हैं. रास्ते में आने वाली हर चीज को नष्ट करती हुईं. ऐसे में अगर आपका धार्मिक गुरु या नेता जिसने आपको इस स्थिति में पहुंचाया है, मार्ग परिवर्तन के लिए अगर आपको रुकने का आदेश देगा तो आप उस आदेश की अवहेलना करके उसे कुचलते हुए आगे बढ़ जाएंगे क्योंकि आप सिर्फ भाग रहे हैं कहीं के लिए नहीं बल्कि कहीं से.कहीं पहुंचने के लिए. लेकिन कहां ये आपको पता नहीं क्योंकि आपने कंधों पर घर जोड़ने की जिम्मेदारी ले रखी है. और, इसमें साधन की शुचिता को आप आड़े नहीं आने दे सकते.

आप राजनेता हैं केजरीवाल जी, सेल्समैन न बनिए!


Arvind Kejriwalप्रिय मुख्यमंत्री जी,

आज आपको ये खुला पत्र इस भरोसे के साथ लिख रहा हूं कि आप नहीं तो आपके समर्थक जरूर इस पत्र में जाहिर की गई चिंताओं को समझेंगे. आपके दफ्तर पर कथित सीबीआई रेड के बाद से आप आक्रामक मुद्रा में हैं. आपने पहले प्रधानमंत्री को डरपोक बताया. फिर टीवी पर उन्हें और सीबीआई को उल्टा-सीधा कहा.

किसको कहा डजंट मैटर

खैर, मैं, किसको कहा के मुद्दे से कतई विचलित नहीं हूं. इससे पहले जनता रोबोट से लेकर रबर स्टांप तक न जाने क्या-क्या कह और सुन चुकी है. आपने तो अभी तक सिर्फ डरपोक ही कहा है. और डरपोक होना कोई बुरी बात भी नहीं.

लेकिन, मुद्दे की बात ये है कि आपने ऐसा क्यों कहा. वो भी टीवी पर. कुछेक कार्यकर्ताओं के सामने गुस्सा फूट पड़ना अलग बात है. लेकिन, नेशनल मीडिया के सामने क्यों? ऐसी बयानबाजी चीख-चीखकर कहती है कि आप जानबूझ कर वो भाषा बोल रहे हैं जो आपके वोटबैंक को ये बताए कि आप उनके लिए फैजल खान हुए जा रहे हैं. और, एक-एक करके उनके साथ हुए अन्यायों का बदला लेंगे.

पॉलिटिकल कंज्यूमेरिज्म उर्फ राजनैतिक उपभोक्तावाद

ये राजनैतिक उपभोक्तावाद की अगली कड़ी का विकास है. पहले नेता उत्पादक था और जनता ग्राहक. नेता किसी न किसी विचारधारा में अपने नारे भिगोकर जनता को बेचते थे. और, जनता बाल में लगाने वाले रंगबिरंगे रिबनों जैसे नारों को खरीद लेती थी. लेकिन, अब ऐसा नहीं है. नई कड़ी में नेता उत्पादक न होकर सेल्समैन है. ये नेता विचारधारा की पूंजी में यकीन नहीं रखते. और, रखें भी क्यों? जब हद्द लगे न फिटकरी रंग चोखो आए तो काहे विचार और धारा का सहारा लिया जाए. ऐसे में जनता जैसी भाषा चाहती है नेता वैसी भाषा बोलता है.

तमाम तनावों के तले दबी जनता को बस परफॉर्मर्स चाहिए. न्यूज चैनल पे एंकर जबरदस्त मजा दे, कॉमेडी शो में ‘शर्मा जी’ और पॉलिटिक्स में नेता जी. सो, आप मोदी जी को बादलों का ताऊ बताते रहो. लेकिन, इस नूरा-कुश्ती में आप अपना ही बड़ा नुकसान कर रहे हैं. इट्ज लीडर्स जॉब टू लीड. आपके इस अंदाज से आपकी ही पार्टी के नेताओं में कैसे गुण पैदा होंगे.

किसी भी पेशे में सर्वांगीण उत्कर्ष का रास्ता शिखर की ओर देखने और पूरी श्रद्धा से उसके कदमों का अनुपालन करने से होकर जाता है. ऐसे में आपके पास तो जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी की थाती है.

इन नेताओं ने घोर मतभेद होने के बाद भी कभी अपने विरोधियों के प्रति ऐसी अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं किया. मैं यहां अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की उनकी सरकार के प्रति टीका-टिप्पणी पर दिए गए भाषण को कोट कर रहा हूं. पढ़िए, अगर पढ़ सकें तो.

अटल बिहारी वाजपेयी कहते हैं –

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Hey Little Sparrow! Stop coming to my dreams


Hues of a Soul Love Story Once upon a time, there was a writer in south town of London. Living in utter solitude, he was trying to figure out his relationship with a little sparrow bird that comes every morning to land up on his writing table. Every night he thought about people who goes through lost love trauma. He thinks why people go after love, knowing that it’s the thing that leave everyone emotionally robbed and wounded but every morning when he goes to write, the little bird comes over. He kind of started liking her spurious presence. One day, the bird turns into a beautiful girl and started coming over for morning coffee. The writer somehow could not gauge the abstract creation of the girl. He just started spending great time with the girl. They go together for buying groceries, have morning coffee and say goodbye to eachother as the sun sets. Now every morning, when the writer goes on writing his study on lost love, he instead writes about the beauty of love. And one day, the beautiful girl turned into a bird again without saying goodbye to the writer whom she loved. Now, the writer dreams of saving her girl from goons, buying groceries together and in morning he wakes up screaming at the little sparrow, ‘Hey Little Sparrow, stop coming to my dreams’. The little sparrow smiles as ever before…

Book Review: Nusrat Fateh Ali Khan – The Musical Alchemy


Nusrat Fateh ALi Khan Biography

We know musicians with their music and Nusrat Fateh Ali Khan is no exception to this basic rule. But when we read the biographies of such artists, it enriches our understanding with art and artists. Pierre Alain Baud’s paean to the legend of Qawwali is one such interesting read. The writer has travelled and spent a great deal of time with the legend Qawwal and it reflects in tiny details of NFAK’s life. It fosters my belief in the thought that creating music is like doing alchemy. You add lots of efforts to get a right tune out of your vocal chords and percussion instruments and only a few shot to fame the way NFAK has done. I still remember when I came across the soulful music of Nusrat. It was my exam’s day and Nusrat’s song was being played loud in the auto I was taking to college. On being distracted, I asked the auto driver to slow down or just stop the music and he did. But till then Nusrat’s music was all over my head. Exam went well but I was still humming the tone. It irritated me and pushed to listen the whole song. In those days, Google required a keyword to give any results so I tried hard to recall any word from the tone. But I got only Gorakh Dhandha and after 20 minutes of extensive research, I could find “Tum Ek Gorakh Dhandha Ho”. Since then I am in love with NFAKs music.

Pierre Alain Baud has painstakingly researched and soulfully written on the great Qawwal’s life. He has brought the details about the art form and resourceful information on the evolution of Qawwali. He has talked about the Qawwali in detail. As the date goes back to eight century when Sufi saints first came to south Asia as Muslim missionaries from Iran, Afghanistan and Syria to propagate Prophet Mohammad’s message. This was the group of secular wanderers, who took the esoteric path to reveal the batin; the thing behind the Zahir. They believed in worshipping god with their excellence of music and spread Prophet Mohammad’s message through humanitarian verses and poetries. It dots the time of famous poets Rumi, Sufi Saint Bulle Shah, Baba Faird and Nizamuddin Aulia etcetera. In Sufi culture, there is a tradition of music & Qawwali. The kids get their initiation from Pir then they go on learning and practising the art for years before going live.

Inclusion of instruments – specific to Qawwali is really appreciating. It fills the half empty glass. The book says that before 18th century, Qawwali sessions were adorned with indigenous percussion instruments like Sarangi, Dholak and Shahnai. These big sized instruments were a pain for musicians as they took time for readjustment to the changing pitches of vocalists. Right then a Bengali instrument maker Dwarkanath Ghosh transformed an English harmonium into a hand-held instrument. It set the stage for Qawwals like Fateh Ali Khan and Mubarak Ali Khan brothers and later for Nusrat’s journey to planetary fame.

The first half of the book talks about art, Chistiya brotherhood, Nusrat’s lineages and some less known tombs like Alauddin Sabir Kaliyar in Rurkee, Uttarakhand (closely associated with Nusrat’s family). The narration covers nine generations of NFAKs genealogy. The close associations with Qawwal bachha Gharana, which was founded by Sufi saint Nizamuddin Aulia and political allegiances of Nusrat’s forefathers. It includes political allegiance of Fateh Ali Khan and Mubaraq Ali Khan brothers as they propagated two-nation theory with poet Iqbal’s verses. Unlike his guardians, NFAK adopted Bulle Shah, Baba Farid and Rumi’s verses, which talks about the god and his beloved. Such verses were beyond any communal allegiance and thus earned love from all corners of the divided India & Pakistan. Including this, Nusrat sang shabad of Punjabi tradition and Saanvre tore bin of Hindu tradition. It shows him a bit secular but the book doesn’t tell about Nusrat’s stand on Hindu-Muslim conflicts. It doesn’t say if he was secular or adjust himself with changing political tides of south East Asia.

Everyone expects some sort of miraculous stories from the biographies of legends. It holds many. The one is about a dream when NFAK still a child sees his late father who brought Nusrat to Ajmer Sharif and asked to sing. In real, Nusrat instantly recognized the place and set to sing when he first visited Ajmer Sharif. It also opens up thing that shows legends are normal human being. They just try little hard for what they believe in. Nusrat used to have a habit of listening TV shows and advertisements whenever he goes on his foreign tours. It lets him understand the music of foreign soil before his concerts. And when he applies the local music notes in his performances, it got him huge success in places like Japan and Sudan.
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Pierre Alain Baud’s work is in French and English Translation has done by Renuka Ghosh. Ghosh’s translation is not devoid of the personal touch that should be felt in Baud’s personal account. Though, I strongly believe that the verses, written in Urdu, English and roman hindi. The latter should be written in devnagri lipi to add the life to verses of Baba Bulleshah. These are beautifully embedded like a special notes of NFAK. Freancis Vernhet has carved the book cover out of gold sand and have scattered all over the book cover. On the jacket, there are prints of NFAK audio tapes. On the second cover, there are news clips that echoes with larger than life stature of Nusrat Fateh Ali Khan, who has is living immortally with his soothing voice.

Chopra opens the Flood Gates With a Scrapbook of Memories


ashok-chopra-book-scrapbook-memoriesHow do we get to know the real self of our favorite authors? How do they think, write and go on publishing their notes, scribbled sometimes on matchboxes, paper napkins or on the back covers of their favorite books. Sometimes a single paragraph or even a line of wisdom can turn a reader loyal to the author. We then go on churning internet for hours to know the publishing process of the works we love, the hardships that our author has gone through with and about the hidden inspirations. This is the next degree of being a loyal reader. We often notice such loyalty in movie buffs; they know the names of directors, actors, writers, lyricists and even production team members before even entering in the movie hall. But seeking all such details is pretty tough in case of books. On googling author’s name or the book, you get numerous links leading you to buy the book or a fine 300 word piece written by PR people for marketing of the title. The Ace publisher Ashok Chopra has opened the flood gates by publishing ‘The Scrapebook of Memories’. Now, others publishers can follow. The beauty of this book is like a good movie. You can not put it down after start reading even opening pages randomly. Each page is written with such a simple and lucid tone that you keep on reading the book. Curiosity goes on and on with each passing paragraph. Though, the hard cover edition makes it difficult to carry this 383 pages long book. It encompasses Chopra’s frequent interactions with publishing legends like Khushwant Singh, M. F. Husain, Dev Anand, J. N. Dixit, Shobha De, Dilip Kumar, Zail Singh and Satish Gujral. In the second part of the book, Chopra has shared his memoirs with cities like Shimla, the Gaiety Theater, and about historical novels. In one chapter, the publisher talks about Gita Mehta’s Raj and Salman Rushdi’s Midnight Children. He marks the evolution of Indian non-fiction and historical fiction genres with Khushwant Singh’s Train to Pakistan and Rushdi’s Midnight Children’s. In a country like India, where people generally don’t talk about books, authors and long form writing, this book tells you before print stories about famous books like Khushwant Singh’s autobiography. While writing about Khushwant Singh and Dileep Kumar, the author recalls his memorable liaisons with legends. He shares a private incident when 99 year old Khushwant Singh asks Chopra if he had any lover in his life. On getting the negative response, Khushwant goes on asking him to have one by reciting a Persian couplet. It shows what Khushwant was at the age 99; the person who at the age of 99 can take care of his associates as a good old grand pa while being as friendly as classmates. He shares one incident when Bollywood legend Dilip Kumar tenderly asks him to visit him often as his visits gets solace to him. Now after a career of 40 years, Ashok Chopra has written about all such memories that usually don’t come in public space. Indian publishing professional don’t talk about such things public and we don’t get to know what happens before publishing of books.