ABVP एक राष्ट्रवादी संगठन है, ये सब जेएनयू वालों की गलती है


thequint-2016-02-602550a3-3b20-4e4f-9adf-fa8c4e161feb-JNU ABVP

एबीपीवी एक राष्ट्रवादी पार्टी है, विरोध बर्दाश्त है, विभाजन की बात नहीं. इस देश में फ्रीडम ऑफ स्पीच इतनी ज्यादा है कि आप अपने प्रधानमंत्री को उनका नाम लेकर बुला सकते हैं
केंद्रीय मंत्री वेंकैय्या नायडु जी का ये बयान सुनकर तो मतलब जी खुश हो गया. ये जेएनयू वालों ने नाक में दम कर रखा था. गंगा ढाबे पर इनका आतंक कम था क्या जो ये डीयू तक पहुंच गए. अब एक तो ये अंग्रेजी भी इतनी किटर-पिटर बोलते हैं कि पूछो मत! जाने कौन-कौन से फिरंगियों के नाम गिनाने लगते हैं. पहले तो अंग्रेजी समझ नहीं आती फिर फिरंगी नाम सुनते ही खून अलग से खौल उठता है.
लेकिन नायडु जी ने ठीक बता दिया है. बताओ, मोदी जी को उनका नाम लेकर बुला सकते हैं. ये नहीं कि ऐजी-ओजी करके बुलाएं. सीधे नरेंद्र मोदी कहकर बुलाते हैं. और तो और ‘उनकी’ तुलना गधे से करते हैं. बताइये, ये भी कोई बात हुई. देवी कालरात्रि का वाहन है गधा. ये जान-बूझकर हमारी भावनाएं आहत करते हैं. लेकिन हम कुछ नहीं कहते.

दूध मांगोगे तो चॉकलेट देंगे-कश्मीर मांगोगे तो…

ये अफजल प्रेमी गैंग के सदस्यों ने कश्मीर का राग अलाप-अलाप कर नाक में दम कर दिया है. पहले बोलते थे कि कश्मीर मांगोगे तो खीर देंगे लेकिन इन्होंने इतनी आफत कर दी है कि अब तो मन करता है कि सिल्क चॉकलेट ही दे दें. महंगी तो है लेकिन क्या करें, देश बदल रहा है. मोदी जी बोले हैं प्रोग्रेस हो रही है तो दिखाना तो पड़ेगा न.
नायडु जी बिलकुल ठीक बोले हैं विभाजन की बात बर्दाश्त नहीं की जाएगी. कतई नहीं की जाएगी. अरे, विरोध करिए. राहुल गांधी भी तो कर रहे हैं. आप भी कर लो.

लेकिन मास्टर स्ट्रोक तो रिजिजू जी ने मारा है…

इसमें दो राय नहीं हैं कि नायडु जी ने एबीवीपी की इज्जत रख ली है. लेकिन खेल की दिशा तो रिजिजू जी ने 24 फरवरी को ही पलट दी थी. वो एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें दिल्ली पुलिस लड़कियों को पीट रही थी और एबीवीपी पर गाली-गलौच करने के आरोप लग रहे थे. पुलिस और एबीवीपी वाले लड़कों की भद्द पिट रही थी लेकिन रिजिजू जी ने शानदार अंदाज में गेंद उनके पाले में ही डाल दी. कैंपस में गुंडा-गर्दी के खिलाफ लड़ाई को एक ट्वीट से राष्ट्रवादियों और अति-वामपंथियों के बीच लड़ाई है. मतलब ‘जेएनयू वर्सेज ऑल इंडिया’.
अब रेप की धमकियां, मारपीट और गुंडागर्दी वाले सब आरोप गायब. अब अफजल प्रेमी गैंग के सदस्य पिछले साल की तरह नेशनलिज्म पर क्लासेज चलाकर सिद्ध करें अपना देशप्रेम.
रिजिजू जी ने बिलकुल आखिरी बॉल पर छक्का मारकर मैच अपने पाले में कर लिया है.

हर हर मोदी…घर घर मोदी

कोई कहे कुछ भी लेकिन मोदी जी के भीतर कुछ ऐसा जादू है जो उनकी भक्ति करने पर आपके अंदर आ ही जाता है. देखिए, रिजिजू और नायडु जी का करिश्मा.
ये अफजल प्रेमी गैंग के सदस्य मोदी भक्ति में लीन होते तो क्या पता अब तक इनके कश्मीर और आदिवासियों को आजादी मिल भी गई होती. लेकिन ये गांजा फूंकने वाले वामपंथी सुनें तब न. इन्हें तो वो कार्ल मार्क्स और वो चीन वाला माओ ही पसंद हैं तो झेलें पुलिस के घूंसे और रेप की धमकियां.

#NetNeutrality: जरा समझें आखिर क्‍यों मचा है बवाल


net-neutralityमोबाइल स्पेसिफिकेशंस से पनीर कोरमा तक और हिटलर से मुसोलिनी इंटरनेट ने हमें अकूत जानकारियों का भंडार दिया है. किताबों के दूर होने से पैदा हुए स्‍पेस को इंटरनेट ने काफी हद तक भरने की कोशि‍श की है. लेकिन अब यह इंटरनेट बदलने जा रहा है. जी हां, भारत में इंटरनेट पूरी तरह से बदलने जा रहा है. अब इंटरनेट फ्री में मिलने जा रहा है. टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां आपको ऐसे ऑफर देने जा रही हैं जिनमें आपको आजादी होगी कि आप कौन सी एप यूज करें और कौन सी एप यूज ना करें…जैसे कि अगर आप सिर्फ वॉट्सएप यूज करते हैं तो आप दस-बीस रुपये का प्लान खरीद कर पूरे महीने मजे से वॉट्सएप यूज करें. आपको क्या जरूरत है कि 3 सौ रुपये का 3जी डाटा पैक यूज करें. मैं यह मानकर चल रहा हुं कि ऊपर लिखे ऑफर आपको बहुत पसंद आ रहे होंगे. रीजनेवल भी लग रहे होंगे. लेकिन भारत में नेट न्यूट्रेलिटी का अंत मुगल साम्राज्य के अंत और ब्रिटिश राज के आरंभ की तरह ही साबित होने वाला है. नेट न्युट्रेलिटी समर्थकों और टेलिकॉम सर्विस ऑपरेटर्स की यह लड़ाई समझने के लिए सबसे जरूरी है कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी की एबीसीडी को समझ लें. वरना आप भी उन करोड़ों लोगों में शामिल हो जाएंगे जो प्लासी युद्ध के दौरान मैदान के बाहर खड़े होकर युद्ध परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे जब उनकी जिंदगी की सबसे जरूरी लड़ाई लड़ी जा रही थी. इससे पहले कि समय निकले, आपको यह जानना चाहिए कि आख‍िर यह लड़ाई क्यों लड़ी जा रही है और आप इस लड़ाई में कहां खड़े हैं.

क्या है नेट न्यूट्रेलिटी
हिंदी में नेट न्यूट्रेलि‍टी का शाब्दि‍क अर्थ है: इंटरनेट पर मौजूद सामग्री की रूप मुक्त, उद्देश्य मुक्त, स्त्रोत मुक्त उपलब्धता. फिलहाल इंटनेट पर आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह बाइट्स में मापा जाता है:
मतलब –
विकीपीडिया के 20 किलोबाइट के पेज का मूल्य = x रुपये

और फेसबुक के x किलोबाइट के पेज का मूल्य भी = x रुपये
यानी कंटेंट कुछ भी हो आपको पैसे बाइट्स के हिसाब से ही देने होंगे. अब जैसे-जैसे आपका यूसेज बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे आपका इंटरनेट खर्चा बढ़ता जाएगा. चाहें अपना 2 गीगा बाइट के डाटा पैक से पोर्न वीडियो देख लें या हिस्ट्री चैनल की डॉक्यूमेंट्री, आपको पैसे 2 गीगा बाइट के हिसाब से ही देने होंगे. यह कुछ-कुछ पंसारी की दुकान से आटा खरीदने जैसा है. जब आप आटा खरीदने जाते हैं तो क्या आपका पंसारी आपसे यह पूछता है कि आपको आटे से रोटी बनानी है या परांठे, रोटी बनानी हो तो ये वाला आटा ले जाओ और परांठे बनाने हों तो ये वाला आटा. नहीं ना! आप तो बस पंसारी को आटे के पैसे किलो के हिसाब से देते हैं ना कि उससे बनने वाले भोजन के हिसाब से.

क्या हैं वर्तमान व्यवस्था के फायदे
अगर आप इस व्यवस्था के फायदे जानना चाहते हैं तो आपको इंटरनेट की लाइफ साइकिल को समझना होगा. इंटरनेट दो लोगों को टेलिफोन के तारों से जोड़ने की व्यवस्था से जोड़ने का नाम है. इस प्रोसेस के तहत दो लोग अपने कंटेंट को आसानी से इंटरनेट के माध्यम से एक दूसरे के साथ शेयर कर सकते हैं. आप अपनी बात को, बिजनेस आइडिया को और व्यापार को दुनियाभर में मुक्त रूप से इंटरनेट यूज कर रहे लोगों तक पहुंचा सकते हैं. वर्तमान व्यवस्था आपको चुनाव का अधि‍कार देती है कि आप इंटरनेट को कैसे, कितना एवं कब यूज करें. इंटरनेट एक ताकत है जिसके माध्यम से आप अपने जीवन को बदल सकते हैं. अपने सपने पूरे कर सकते हैं. यह पूरी दुनिया में समानता का आाखि‍री मोहल्ला है जहां सब तकनीकी आधार पर सामान्य हैं. यहां सिर्फ कंटेंट बिकता है स्त्रोत या ब्रांड नहीं. net-neutrality-what-you-need-know-now-infographicरेगुलेटेड इंटरनेट – एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना

इंटरनेट को रेगुलेट करके दरअसल एक नई असमान वर्चुअल दुनिया की रचना करने की साजिश की जा रही है जिसमें महंगा पैक खरीदने वाले काफी तेज इंटरनेट यूज कर पाएंगे और कम पैसे खर्च करने वालों को स्लो इंटरनेट यूज करना होगा. देखें इमेज net-neutrality-1-620x400 लेकिन कंपनियों को हो रहा है नुकसान अब आपने एक पक्ष सुन लिया है तो इस महामुकाबले का दूसरा पक्ष भी सुन लें. दरअसल इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स का तर्क है कि जैसे जैसे भारत में स्मार्टफोन यूजर्स बढ़ रहे हैं, इंटरनेट के भार को संभालना मुश्कि‍ल हो रहा है. ऐसे में उनके लिए इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर मैंटेन करना संभव नही है. इसलिए वह इंटरनेट को सेक्शन में बांटना चाहते हैं जिससे डाटा को सही तरीके से डिस्ट्रीब्यूट किया जा सके. लेकिन असल बात यह है कि ओवर द टॉप प्लेयर्स यानी वॉट्सएप, इंस्टाग्राम, वाइबर, स्काइप आदि‍ आदि की इन्नोवेटिव सेवाओं के चलते लोगों ने टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स की कॉल एवं एसएमएस सुविधाओं को यूज करना बंद कर दिया है.

नोकिया फोन पर चुटीली-मजेदार बातों का दौर
अगर किसी को याद हो तो जरा उस दौर में जाएं जब एयरटेल, हच और अन्य जीएसएम कंपनियों ने सिम सर्विसेज के नाम पर ज्योतिष, ट्रेवल और चुटीली बातों की सर्विसेज शुरु की थीं. इन सर्विसेज के दौर में लोगों के पास फ्लोरोसेंट लाइट वाले नोकिया 3315 और 1100 फोन आते थे. ऐसी किसी सर्विस को यूज करते ही लोगों के मेन बैलेंस से 100 से 150 रुपये कट जाया करते थे. शुरुआती फोन यूजर्स के बीच पांच अंकों के एसएमएस नंबर आतंक के रूप में व्याप्त हो गए थे. गलत प्रस्तुतिकरण और ग्राहकों की दोहन मानसिकता से इन सर्विसेज का अंत हो गया. लेकिन इसके बाद स्मार्टफोन एप्स का दौर आया. इन एप्स ने बिना पैसे लिए आपको बेहतर तरीके से जानकारी उपलब्ध कराई. हालांकि एप्स ने अपने भर का खर्चा निकालने के लिए एड्स का सहारा लिया. बेहतर जानकारी उपलब्ध कराकर इन एप्स ने एड के सहारे वह पैसा कमाना शुरु कर दिया जिसे इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियां अपना मान रही थीं. यह प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नमक पर कर लगाने जैसा है. कि ब्रिटि‍श राज के समुद्री क्षेत्र रूपी टेलिफोन लाइनों से जो भी रेत रूपी डाटा उपलब्ध हो रहा है उस पर प्रथम अधि‍कार राज का है.

इसके विपरीत अगर आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो प्रति तीन महीनों में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनियों के डाटा शुल्क और खपत में बेतरतीब बढ़त देखी गई है. ऐसे में कंपनियों को जो नुकसान एसएमएस और कॉलिंग सर्विसेज के खत्म होने के नुकसान से उठाना पड़ रहा है उससे कहीं ज्यादा वे इंटरनेट प्रोवाइडिंग सर्विस से कमा रही हैं. देखें इमेज. airtel-data-table-q3-fy13-495x284 फर्ज किजिए कि ट्राई ने भारतीय टेलिकॉम ऑपरेटर्स की शर्ते मानकर इंटरनेट को इन कंपनियों के अधीन कर दिया तो इस कंडीशन में आपको हर सर्विस यूज करने के लिए एक नया पैक खरीदना पड़ेगा. इसके अलावा नई एप कंपनियों के लिए आप तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाएगा. नई जानकारियों का आप तक पहुंचना नामुमकिन होगा क्योंकि आप तक वही जानकारी पहुंच पाएगी जो आप तक पहुंचने के लिए आपके टेलिकॉम ऑपरेटर को शुल्क अदा कर पाएंगे और आप वही जानकारी प्राप्त कर पाएंगे जिसके लिए आप पैसे दे पाएंगे. इसलिए आज ही अगर मुक्त इंटरनेट चाहिए हो तो Change.org पर अपनी पेटिशन दाखि‍ल करें और ट्राई को मेल करें कि आप इंटरनेट न्यूट्रेलिटी के पक्ष में हैं क्योंकि अब नहीं चेते तो अगला मौका बहुत देर में आएगा…

इस विषय पर ज्यादा पढ़ने के लिए कृप्या इस लिंक को खोलें:
http://www.medianama.com
https://docs.google.com/document/d/1DNXgJRKUMk4Tqefzybab7HzsV6EeYmnciPqMQG91EN0/edit

मीडियानामा और अन्य सभी साथि‍यों को इस बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सधन्यवाद. पिक्चर्स गूगल से ली गई हैं एवं बिना किसी छेड़़छाड़ के पब्लिश की गई हैं. किसी को क्रेडिट दिया जाना जरूरी हो तो कृप्या बताएं.

जरा कश्‍मीर के कुछ खाली घरों में झांकें…


Protests-Demonstrations-62कश्‍मीरी पंडितों के दर्द, विछोह और भयाक्रांतता को समझने के लिए आपको कश्‍मीर जाने या कोई किताब पढ़ने की जरूरत नहीं है। सरल मानवीय स्पन्दन और संवेदना इस दर्द के एक अंश को समझा जा सकता है। ऐसे दर्द और अन्‍याय के प्रति दबे हुए गुस्‍से के अहसास सालों बीतने के बाद भी ऐसे जीवंत रहते हैँ जैसे सुई या कांटा चुभने से होने वाला दर्द। आप कितने भी बड़े हो जाएं सुई चुभने पर होने वाली शारीरिक अनुभति को चाहकर भी नहीं बदल पाएंगे। इस प्राकृत सचेतना की तरह ही पैतृक जमीं से बिछुड़ने के दर्द को भी कितनी ही सफलताओं से कम नहीं किया जा सकता। जब भी कोई आपको सुई के दर्द से बचाने की राजनीति करता दिखाई पड़ता है तो आप मन ही मन तिलमिला उठते हैं। सुई चुभोए जाने वाले सभी पुराने संस्मरण आँखों के सामने फ़िल्म की मानिंद तैर उठते हैं। उस वक़्त आप मन ही मन कह उठते हैं की अब बस भी करें।

जहाँ घर हमारा था वो जमीं धस गई।
लंबे देवदार के पेड़ अब सब फर्नीचर चौखट हो गए,
वो घर के पास वाली झील अब पहले सी नहीं रही,
जहां घर हमारा था वो जमीं धस गई।

अगर आप अब भी इस दर्द को महसूस ना कर पाए हों तो स्वयं को इस कहानी का पात्र बना कर देखिए। फ़र्ज़ कीजिये की आप एक एमएनसी में काम करते हैं और इस नौकरी को आपने अथक मेहनत के बाद हासिल की है। इससे जुड़े पदलाभ आपकी ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए अत्यंत जरूरी हों। फिर एक दिन आपको पता चलता है की आपकी कंपनी में आपके देश के लोग धीरे धीरे कहीं और नौकरी खोज रहे हैं। लेकिन आप पहले की तरह सब सामान्य मानकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने men लगे रहते हैं। फिर एक दिन आप रोज की तरह दफ्तर पहुंचते हैं और आपको सुनने को मिलता है कि कुछ लोग पीठ पीछे आपको नौकरी से निकालने की साजिश रच रहे हैं। ऐसी खबरों को अफवाह मानकर आप अपना काम फिर शुरु कर देते हैं, लेकिन पाते हैं कि कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो हो रहा है जो डरावना है। इन डरों के बावजूद आप नौकरी बचाए रखने के लिए साथियों से पहले की तरह व्‍यवहार करते रहते हैं। दोस्तों पे भरोसा करते हैं की दुसरे मुल्क के सही लेकिन हैं तो ये आपके दोस्त ही।  कुछ दिनों बाद आप पाते हैं कि ऑफिस की महिलाकर्मियों ने आपसे बात करना बंद कर दिया है। और ऑफिस लन्च के दौरान बातचीत की भाषा अंग्रेजी की जगह विदेशी हो गयी है। अनौपचारिक संवाद अनजानी भाषा में होने लगे।  इसके बाद भी आप सभी से ऐसे बात करने की कोशिश करें कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

कुछ दिन बाद आपके कुछ दोस्‍त आपके प्रति चिंता जताते हुए दूसरी नौकरी ढूढ़ने का सुझाव देने लगें। और फिर एक दिन आपके साथ लंच शेयर करने वाले, सिगरेट के कश लगाने वाले, लिफ्ट लेने-देने वाले दोस्‍त आपको कॉलर से उठा कर अनर्गल आरोपों और लात घूंसों से सुशोभित करते हुए ऑफिस से बाहर कर दें।

अगले दिन चोटों को बैंडेज के पीछे और शर्म को पलकों के नीचे छुपाकर आप ऑफिस आ जाते हैं। लेकिन आपको पता चलता है कि ऑफिस के बाद आपको जान से मारने की साजिश की जा रही है। इसके बाद शाम को आपका सबसे जिगरी यार ऑफिस छूटने पर कुछ अंजान लोगों के साथ आपको जान से मारने की धमकी देता है। धमकी को असली प्रभाव देने के लिए आपको कुछ घाव भी देकर जाए। इसके बाद आप उसी रात अपनी बची हुई सेलेरी और ऑफिस ड्रॉअर में बीबी-बच्‍चों की तस्‍वीरें छोड़कर जान बचाने के लिए उस शहर से बहुत दूर भाग जाते हैं।

Kashmiri government employees scuffle with police during a prote
यह बात सोचने में थोड़ी डरावनी लग सकती है लेकिन अगर आपने इस दुखदाई कल्‍पना में खुद के असम्‍मान और डर के भाव को महसूस किया है तो आपको उन दो से तीन लाख कश्‍मीरियों के दर्द को समझने में मदद मिल सकती है जो सर्द रातों में जान बचाने के लिए अंतिम सांस तक भागे थे।

इस दर्द को महसूस करने के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य की उन पार्टियों के बयानों पर नजर डालिए जो कहते हैं कि अगर कश्‍मीरी पंडितों को घाटी में वापस आना है तो जैसे बुला रहे हैं वैसे ही आना होगा। 1989 से पहले की तरह कश्‍मीरी मुस्लिमों के साथ मिल-जुलकर रहना होगा। ये ऐसा होगा कि आपसे कहा जाए कि जाइए उसी दोस्‍त के जूनियर बनकर काम करिए जो आपको लात मारकर बॉस बना हो।

हद तो तब होती है जब आपको बिना पूर्व सूचना के कम्पनी छोड़ने के लिए माफ़ी मांगने को कहा जाये।

Multidimensional Investigation Needed in Sunanda Pushkar Murder Case


On January 17th 2014, Congress leader Shashi Tharur’s wife Sunanda Pushkar found dead in room no. 345 of Hotel ‘The Leela Palace’ in Chankyapuri, New Delhi. In the initial report, the first speculative reason of Pushkar’s death came out was suicide. Close friends of Pushkar immediately tweeted with surprising sentiments like Ohh! Sunanda Killed herself. On contrary to these tweets, Pushkar’s brother reportedly told that he believes that Sunanda can’t harm herself. On the same line, bollywood actress Juhi Chavla tweeted “shocked to hear about Sunanda pushkar … Seems like yesterday She was with us at all kkr matches in kolkatta..cheering and cheerful !!. These contradictory comments play an important role to the murder story, which is still unfolding.

The second speculative reason of Pushkar’s death, pushed forward by the husband of Sunanda Pushkar’s, was her impeding sickness. Shashi Tharur said that his wife was suffering from lupus. Her close friends joined Tharur and said yes she indeed was suffering from lupus. The third speculative reason of Pushkar’s death was drug overdose. In the earlier autopsy report, a psychoactive and sedative drug called Alprazolam was found. Including this, there were multiple bruises and an injection mark was found. However, nothing constituted that the real reason of death was drug overdose. On 20th January 2014, AIIMS’ three member forensic team Chief Doctor Sudhir Gupta labeled Sunanda Pushkar death as ‘sudden unnatural death’. The team asked few days to come back with a definition of sudden natural death.

But after a whole year in its final medical report from Dr. Sudhir Gupta team, the death of the Sunanda Pushkar has been labeled as sudden unnatural death. Although, the final report says that there was some kind of a poison in the body of Sunanda Pushkar. But, this report says that Sunanda was perfectly a healthy individual and was not suffering from lupus or any other diseases. Here, all the stories of illness go wrong. Moreover, the counter tweets from people who met with Pushkar day before her death say that she was a cheerful. So, this report kills all the speculation shared by the close friends and the husband of Sunanda Pushkar.

After all this, the thing that stands apart is the action taken by Delhi Police. A year back, Delhi police didn’t file this case with IPC 302. Now, the case has been filed against an anonymous whereas the medical report by AIIMS still says the same. The big question coming out of this murder mystery is that on what grounds Delhi police is capable of naming the poison responsible for death as polonium 210. Apart from this, there should be a separate investigation on how a leak medical report, prepared by Kerala Institute of Medical Sciences (KIMS) said that Pushkar was suffering from various diseases including heightened photo-sensitivity, arthritis and lupus. This leaked medical reportedly supported the story of Shashi Tharur about Pushkar’s illness. Moreover, the twitter accounts of both Shashi Tharur and Sunanda Pushkar should be duly investigated because in one tweet she herself has accepted that she has been diagnosed with multiple issues. On the other hand, the KIMS has said that she was perfectly fine and was only prescribed simple medication.

This murder mystery is required to be investigated from multiple angles to understand the factors which were used to support the fiction and bury the facts. Such multidimensional investigation will improve the future course of investigations in this changed digitized world.

What is Article 370 Case?


When Narendra Modi asked the nation to discuss the positive and negative outcomes of the Article 370 during his Lalkar rally in Jammu, all the news channels begin short listing the names of panelists according to the time of broadcasting of debate shows. The prominent panelists came in real prime time shows at esteemed news channels and the budding ones got placement during evenings shows that broadcast since 3 PM up to 8 PM in evening and 10 PM to 12 PM in night. After watching multiple debate shows English as well as Hindi, it seemed troublesome to figure out the real picture behind this controversy. It seemed troublesome to get to the bone of these debate and event understand the political stand of BJP prime-ministerial candidate. Moreover, I came across some questions of youngsters who write long status messages over Facebook in support and protest of repealing this act without even knowing the core of this constitutional arrangement. Therefore, I decided to collect the facts and theories from all possible sources to explain this matter in simple words. I hope it will work.

There are three key questions that pop up in the mind of a non-political citizen of India, especially if he or she is not living in J & K. The questions are: why this article came in existence, why this issue is so controversial, and why Indian government do not repeal article 370? These questions confuse us, don’t they? So, let’s try to figure out the answers of these questions. Before answering our first question, we should understand the basic structure and origin of this act.

What is Article 370?

This article originated in 1949 during integration of J & K into Republic of India, to provide a special autonomous status to Jammu & Kashmir. However, the matters related to defence, Foreign Affairs, finance and communications are under central government. It gives the power to state assembly to take decision on the revocation and permanency of this legal instrument. This arrangement allows the citizens of this state to live under separate set of laws such as citizenship, ownership of property, and fundamental rights.

Why it came in existence?

It is a rational question. This article came in existence due to multiple reasons. In opinion of a great politician, Gopalaswami Ayyangar, the state of J & K was not yet ready for the proper integration into Republic of India. The then rulers were afraid of losing their identity by integrating themselves into Indian republic. Hence, Indian government negotiated with the local leaders of J & K and the instrument came in existence to empower the state government to govern in the favor of local citizens.

Why there is so much controversy?

The controversy originates due to unclear information in public domain. Technically, the legal instrument uses the phrase “Temporary Provisions” in the title of the article. It makes people believe that the eventual repealing of this instrument is possible and should take place. However, the real meaning of this phrase lies in the hope of drafting team. While inserting the article 370, the drafting team assumes that in near future the rest of India will win the confidence of people at J & K and convince them to vote against this discriminatory article. The basis of all controversy regarding article 370 is the less understanding of this act in public domain. The receiving ends are not aware with the legal technicalities of this arrangement.

Can it be revoked?

All arguments aiming at abolishing this arrangement are futile because the central government cannot unilaterally repeal this article. The power of revoking this instrument lies in the hands of assembly of the state government instead of parliament. Technically, parliament can amend to change this act but it will break the basic bridge between the state and rest of India.

Apart from these things, there is one more thing to know that this arrangement is not gender biased in any manner. However, the definition of permanent residency as per the state constitution was thought to be discriminatory.

Please add the facts via comments to make this post more simple and inclusive.

Source:

http://www.thehindu.com/opinion/lead/understanding-article-370/article5426473.ece
http://www.india272.com/2014/01/27/article-370-temporary-provision-arun-jaitley/
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-12-03/india/44709033_1_article-370-provision-sheikh-abdullah
http://www.frontline.in/static/html/fl1719/17190890.htm

The Devyani-Sangeeta Richard Case


Devyani Khobragade Case

The recent dispute between Indo-American diplomatic ties has caused due to the arrest of “Ms. Devyani Khobragade”, who is a mid-ranking Indian IFS officer. The Indian diplomat was arrested and treated like usual criminals. The strip search practice was done with the Indian diplomat and later on she got placed in a cell with drug addicts. In response, Indian government has taken off all major privileges it provides to American diplomats. On the other hand, the US state department’s spokesperson “Marie Harf” has called the issue sensitive but an isolated chapter, which will not harm the diplomatic relations of both countries.

The Conflict: The Indian diplomat has been arrested for supplying false information to US visa authorities while bringing her domestic help to the USA. As per the complaint of “Sangeeta Richard” filed in a US court, “Ms. Devyani Khobragade” made two distinct employment contracts: verbal and written for hiring the Mrs. Richard as a babysitter and domestic help. According the verbal contract, this job makes Mrs. Sangeeta Richard earn INR 25000 a month including sick leave, weekly holiday, medical care, boarding – lodging, and INR 5000 for overtime. On the other hand, the written contract uses the figure $4500 including all facilities to employee, applicable in the USA. The core of the conflict lies right here; the minimum wages in US is $7.25 per hour whereas Sangeeta was getting paid $416 per month, which is one tenth of her lawful salary. In her complaint, Sangeeta Richard has said that Ms. Khobragade stopped her to reveal her real salary during visa interview, which made the way of the arrest of Ms. Devyani Khobragade. Hence, US state police department has arrested Ms. Khobragade for providing wrong information to visa officials.

The Reason: It is tough to find political and international reasons behind arrest and wrong treatment with a diplomat, as the case is still unfolding. From broader point of view, we can see Ms. Khobragade as culprit for exploiting her domestic help but there is a bitter truth. The Indian diplomats, appointed on foreign missions and embassies get the salary as per the Indian standards. Therefore, they cannot pay a whopping salary $4500 to their babysitters as they themselves get about $4800 per month. In order to get the things done, the visa officials has been keeping such dual contracts out of sight. It was undeniably denial to the local wages issues.

Different Factors:

Given the outrage in India, erupted over the mishandling of a woman DCG (Deputy Consul General), the different segments of Indian politics & media have called this incident deliberate and provocative. There are multiple factors, which are seeking ground on Indian and international media.

The Preetinder Bharara’s Factor: It has been believed across Indian and international media channels that Preet Bharara, the US attorney of New York southern district, is trying to portray himself unbiased towards Indians for paving his path to presidential elections like Rudy Giuliani, a former mayor of New York City.

The Easy Indian Attitude: As India has not shown any hard actions on events like mishandling of former defense minister “George Fernandez”, Former Indian President “A.P.J. Abdul Kalaam”, and “Shahrukh Khan” so the US state depart did not think twice before giving arrest orders for “Ms. Devyani Khobragade”.

The Super-Power Factor:  The “Vienna convention on diplomatic relations” helped US when its citizen Raymond Allen Davis, a CIA contractor killed two Pakistani citizens. The USA claimed diplomatic immunity on this issue as the murderer was the diplomat of American government. However, the same convention does not apply in Ms. Khobragade case even when the nature of crime is not serious. So, the powerful enjoys the fruits of such conventions whereas developing countries get rotten part.

The US Law Enforcement Factor: From a broad viewpoint, the US court cannot avoid the complaint of Ms. Sangeeta Richard as she was working on the US soil. Hence, she is entitled to get the wages as per the US laws. Therefore, the arrest order was essential. However, the nature of arrest can be discussed because the Indian diplomat enjoys diplomatic immunity.

In case, the law takes its own course then the future of Indian diplomat in US is bleak. However, the diplomat can enjoy full diplomatic immunity. Therefore, the government should make some arrangements for future so that any such cases don’t cause harm to officers representing India across the world.